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कोर्ट से गुहार- अप्राकृतिक सेक्‍स के लिए कहता है पति, धारा 377 के तहत दें कड़ी सजा

महिला की वकील ने बताया कि उसका पति सहमति के बगैर जबरन अप्राकृतिक सेक्स करता है। जो कि महिला धारणा के मुताबिक अप्राकृतिक है।

भादंसं की धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाले पांच न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने केंद्र से कहा कि वह इन सभी मुद्दों पर विचार नहीं कर रहा है।

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 जुलाई, 2018) को आईपीसी की धारा 377 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा है, वहीं एक महिला ने अपने पति के खिलाफ इसी धारा के तहत कार्रवाई करने की मांग की है। महिला का आरोप है कि उसका पति करीब चार सालों से जबरन अप्राकृतिक संबंध बना रहा है। महिला की वकील अपर्णा भट्ट की दलील के बाद जस्टिस एनएन रमन और एमएम शांतनागोदार की बैंच ने आरोपी पति को नोटिस भेजा है। आरोप है कि महिला का पति जबरन ओरल सेक्स के लिए उसे मजबूर करता है। धारा 377 में इसे गैर कानूनी घोषित किया गया है।

मंगलवार को धारा 377 मामले में हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने फैसले को सुरक्षित रखा है। न्यायमूर्ति डी वाई चन्द्रचुद, जो इस खंडपीठ का हिस्सा थे, ने महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि मौखिक सेक्स और एनल सेक्स को अप्राकृतिक यौन संबंध के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है। जानकारी के मुताबिक याचिकाकर्ता ने साल 2014 में गुजरात के सब्रकांता से विवाह किया है। दोनों 2002 सें रिलेशन में थे, तब महिला की उम्र महज 15 साल थी। महिला ने अपने निजी डॉक्टरों को बताया कि पति बार-बार उसे ओरल सेक्स के लिए मजबूर करता है। महिला की वकील ने बताया कि उसका पति सहमति के बगैर जबरन अप्राकृतिक सेक्स करता है। जो कि महिला धारणा के मुताबिक अप्राकृतिक है।

महिला ने आरोपी पति के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है। इसमें पति पर रेप और अप्राकृतिक संबंध बनाने का आरोप लगाया है। हालांकि गुजरात हाईकोर्ट का कहना है कि धारा 375 के तहत वैवाहिक बलात्कार के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा कोर्ट ने धारा 377 के तहत लगाए तर्कों को भी खारिज कर दिया। बता दें कि आईपीसी की धारा के तहत अगर कई शख्स अप्राकृतिक रूप से यौन संबंध बनाता है तो उसे उम्र कैद की सजा हो सकती है। इसके अलावा आरोप साबित होने पर जुर्माने के साथ दस साल तक की कैद भी हो सकती है। आईपीसी की यह धारा करीब 150 साल पुरानी है।

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