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तकरार के बावजूद इन 7 कारणों से नहीं हो सकता बीजेपी-शिवसेना का तलाक

जानकारों का मानना है कि शिवसेना का यह विरोध महज दिखावा है और वो निकट भविष्‍य में बीजेपी से अलग नहीं होने जा रही।
Author नई दिल्‍ली | July 8, 2016 19:49 pm
ठाकरे शुक्रवार को आयोजित शपथग्रहण कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। (FILE PHOTO)

महाराष्‍ट्र की बीजेपी और शिवसेना की गठबंधन सरकार में शुक्रवार को विस्‍तार हुआ। नए मंत्रियों ने शपथ ली, लेकिन शिवसेना प्रमख उद्धव ठाकरे कार्यक्रम में शमिल नहीं हुए। इस घटनाक्रम में कुछ नया नहीं है। शिवसेना ने बीते काफी वक्‍त से बीजेपी को निशाने पर ले रखा है, लेकिन उनसे रिश्‍ता नहीं खत्‍म कर रही। पार्टी पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर राज्‍य की फडणवीस सरकार की गाहे बगाहे आलोचना करती ही रहती है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि शिवसेना का यह विरोध महज दिखावा है और वो निकट भविष्‍य में बीजेपी से अलग नहीं होने जा रही। जानें इसकी क्‍या बड़ी वजहें हैं

पुराना सिद्धांत, सत्‍ता में रहकर विपक्ष जैसा बर्ताव
जानकार मानते हैं कि बाल ठाकरे के वक्‍त से ही शिवसेना की यह पॉलिसी रही है कि वे सरकार में रहकर भी विपक्ष वाला बर्ताव करते हैं। पार्टी अपने सहयोगी पर हमेशा हमलावर रहती है। शिवसेना के नेता से लेकर उसके मुखपत्र हालिया वक्‍त में बीजेपी पर हमलावर रहे हैं।

नगर निगमों पर कब्‍जे के लिए गठबंधन जरूरी
जानकार मानते हैं कि मुंबई नगर निगम पर शासन शिवसेना के लिए ऑक्‍सीजन सरीखा है। बीजेपी के साथ गठबंधन में ठाणे, कल्‍याण और कुछ अन्‍य नगर निगमों पर भी उसका कब्‍जा है। हाल ही में खबरें आईं कि बीजेपी की नजर भी अब इन नगर निगमों में खुद को मजबूत करने की है। अगर शिवसेना बीजेपी के साथ नाता तोड़ती है तो उसके लिए स्‍थानीय निकायों में अपने दम पर बने रहना मुश्‍क‍िल होगा।

एमएनएस से ‘सौतिया डाह’
पीएम नरेंद्र मोदी और एमएनएस चीफ राज ठाकरे में अच्‍छे रिश्‍ते माने जाते हैं। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी भी राज के नजदीकी माने जाते हैं। शिवसेना जानती है कि अगर उन्‍होंने बीजेपी से नाता तोड़ा तो उसका एमएनएस से गठबंधन हो सकता है। हालांकि, राज ठाकरे की राजनीतिक जमीन फिलहाल कमजोर है, लेकिन फिर भी शिवसेना ऐसा कभी नहीं चाहेगी कि एमएनएस और बीजेपी एक साथ आएं। अगर ऐसा हुआ तो कम से कम नगर निगम चुनावों में तो शिवसेना को थोड़ा बहुत नुकसान जरूर होगा।

बीजेपी की जरूरत
राज्‍य में 2009 में हुए विधानसभा चुनाव हों या 2012 में मुंबई, नासिक और पुणे में हुए नगर निगम चुनाव, दोनों में शिवसेना को झटका लगा। इसके बावजूद बीजेपी उसके साथ खड़ी रही। बीजेपी जानती है कि शिवसेना के पास जमीनी स्‍तर पर जुड़े कार्यकर्ता हैं। राज्‍य में उन्‍हें किसी अन्‍य पार्टी के मुकाबले शिवसेना की ज्‍यादा जरूरत है।

शिवसेना की मजबूरी
कभी राज्‍य में बड़े भाई की भूमिका में रहने वाली शिवसेना अब छोटे भाई की भूमिका में है। हालिया महाराष्‍ट्र चुनाव में जब उसने बीजेपी को अपने दम पर बहुमत हासिल करने से रोक लिया तो उसे लगा कि अब वो अपनी शर्तों पर आगे बढ़ सकती है। शरद पवार ने उद्धव का प्‍लान फेल कर दिया और बीजेपी को बिना शर्त समर्थन दे दिया। शिवसेना के पास कोई चारा न बचा और उसे बीजेपी के साथ ही जाना पड़ा। शिवसेना कांग्रेस के साथ नहीं बैठना चाहेगी क्‍योंकि बाल ठाकरे के लिए कांग्रेस कभी दुश्‍मन नंबर वन थी।

शिवसेना को फूट का डर
शिवसेना आलाकमान को इस बात का डर था कि उनकी पार्टी में फूट पड़ सकती है। 15 साल विपक्ष में रहने के बाद शिवसेना के अधिकतर नेता सत्‍ता का हिस्‍सा बनना चाहते थे। ऐसी भनक मिलते ही उद्धव ने बीजेपी का ऑफर कबूल कर लिया। बीजेपी ने भी मौके का फायदा उठाया और उपमुख्‍यमंत्री पद या कोई बड़ा विभाग शिवसेना को नहीं दिया। नए मंत्रीमंडल विस्‍तार में भी शिवसेना को दो राज्‍यमंत्री की सीटें मिली हैं।

शिवसेना को चाहिए आर्थिक मजबूती
राज्‍य के शासन से काफी वक्‍त से दूर रही शिवसेना जानती है कि सत्‍ता आमदनी का भी बड़ा जरिया है। आने वाले नगर निगम चुनावों और निकट भविष्‍य में राज्‍य चुनावों में अगर उसे बीजेपी से मुकाबला करना है तो शिवसेना जैसी क्षेत्रीय पार्टी को आर्थिक तौर पर बेहद मजबूत होना होगा। इसलिए सत्‍ता में बने रहना उसकी मजबूरी है।

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  1. M
    madan gupta
    Jul 8, 2016 at 7:08 pm
    शिव सेना कुर्सी की भूखी है. इस को हर समय अधिक से अधिक मंत्री चाहियें. उद्व बिना चुनाव लड़े माह. का मुख्या मंत्री बनना चाहता है या मुलायम और लालू की तरह अपने लड़के को आगे लाना चाहता है. जबकि पार्टी में पुराने लीडर मोजूद हैं.
    (0)(0)
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