2006 Malegaon Blasts: मालेगांव में सितंबर 2006 में शुक्रवार की दोपहर को चार धमाकों में 31 लोगों की मौत हो गई और 300 से ज्यादा घायल हो गए। इस घटना के लगभग दो दशक बाद भी यह मामला एक अजीबोगरीब अधर में लटका हुआ है। कई सालों के अंतराल पर हुई दो अलग-अलग जांचों में आरोपियों के दो बिल्कुल अलग-अलग समूह सामने आए। आज, दोनों समूहों के 13 आरोपियों को बरी कर दिया गया है। अब किसी पर भी मुकदमा चलना बाकी नहीं है। फिर भी, यह मामला अभी पूरी तरह से सुलझा नहीं है।
दो जांचों में नामजद सात लोग सालों से लापता हैं। देश की शीर्ष जांच एजेंसियों की संलिप्तता के बावजूद उनका पता नहीं चल पाया है, जिससे कई सवाल पीछे रह गए हैं।
एटीएस और सीबीआई की जांच: लापता हुए चार लोग
ये धमाके 8 सितंबर 2006 को हुए थे। शुक्रवार की नमाज के कुछ ही पल बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान के परिसर में तीन धमाके हुए। वहीं, चौथा धमाका पास के मुशावरत चौक पर हुआ।
महाराष्ट्र एटीएस ने नौ लोगों को गिरफ्तार किया और कुल 13 व्यक्तियों पर एक साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया, जो जांचकर्ताओं के अनुसार, महीनों पहले एक शादी समारोह में रची गई थी। लेकिन गिरफ्तारियां होने के बावजूद, चार्जशीट में नामित चार लोग कभी नहीं मिले।
उनमें से एक, मुजम्मिल की पहचान पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर हुई। अन्य तीन मुनव्वर अहमद, रियाज अहमद शफी अहमद और इश्तियाक अहमद मोहम्मद इसहाक अक्टूबर 2006 में धमाकों के ठीक एक महीने बाद लापता हो गए।
चार्जशीट में मुनव्वर को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया है। उसने कथित तौर पर मस्जिद और कब्रिस्तान परिसर में धमाका करने का निर्देश दिया था। रियाज पर एक जगह पर देसी बम रखने का आरोप लगाया गया था, जबकि इश्तियाक को षड्यंत्र के हिस्से के रूप में नामित किया गया था।
मुनव्वर के पिता मोहम्मद अमीन मालेगांव के बाहरी इलाके में एक टिन की बनी झोपड़ी में रहते हैं। पूर्व मुअज्जिन रहे मोहम्मद अमीन सालों से अपने बेटे के बारे में कोई जानकारी न मिलने से परेशान हैं। उन्होंने पहले एक इंटरव्यू में कहा था, “लोग कहते हैं कि बच्चे को खोना सबसे बड़ा दुख होता है। हमारे लिए यह उससे भी बदतर है, हमें यह भी नहीं पता कि हमारा बेटा जिंदा है या मृत।”
रियाज के परिवार ने एक चिंताजनक विरोधाभास की ओर इशारा किया है। कथित एसआईएमआई संबंधों के कारण पुलिस की निगरानी में होने के कारण, उन्हें अक्सर पूछताछ के लिए बुलाया जाता था। उन्होंने कहा, “लगातार निगरानी में रहने वाले व्यक्ति के लिए, यह आश्चर्य की बात है कि उसे शुरू में ही आरोपी कैसे बनाया गया। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि निगरानी में होने के बावजूद उसे गायब कैसे होने दिया गया। या तो व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई या फिर कुछ ऐसा है जो हमें नहीं बताया जा रहा है।”
एनआईए जांच: तीन और लोग जिनका पता नहीं चल पाया है
एटीएस की तरफ से जांच खत्म होने के सालों बाद, मामले में एक नाटकीय मोड़ आया। 2011 में मामले की बागडोर संभालने वाली एनआईए ने 2013 में एक अलग ही आरोपी समूह के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया। इस बार विस्फोटों को एक नेटवर्क (right-wing extremist) से जोड़ा गया। एनआईए ने साथ ही साथ मूल आरोपियों को अपने आरोप पत्र से हटा दिया और पहले के नौ लोगों को निर्दोष घोषित कर दिया।
जिन लोगों के नाम हाल ही में सामने आए हैं, उनमें रामचंद्र (रामजी) कलसांगरा, संदीप डांगे और रमेश महालकर शामिल हैं। ये तीनों व्यक्ति, पिछली जांच में शामिल अपने साथियों की तरह, लापता पाए गए थे। एनआईए की आरोपपत्र के अनुसार, कलसांगरा पर बम लगाने का, डांगे पर ऑपरेशन का मार्गदर्शन करने का और महालकर पर इंदौर में विस्फोटक सामग्री इकट्ठा करने का आरोप लगाया गया था।
इंदौर के रहने वाले बिजली ठेकेदार कलसांगरा 2008 के आसपास अचानक लापता हो गए, लेकिन ऐसा लगता था कि उनका जीवन सामान्य और स्थिर था। शहर की बंगाली कॉलोनी में अपने परिवार के साथ रहते हुए, वे एक दिन काम के लिए घर से निकले और फिर कभी वापस नहीं लौटे।
स्वामी असीमानंद के बयानों के बाद जांच में उनका नाम प्रमुखता से सामने आया, जिसमें उन्हें एक बड़े गिरोह से जोड़ा गया था। अधिकारियों ने उनके बारे में जानकारी देने वाले को नकद इनाम की घोषणा की, लेकिन उनका अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। उनके परिवार में उनकी पत्नी लक्ष्मी देवी और तीन बेटे हैं।
इंदौर के रहने वाले संदीप डांगे ने इलेक्ट्रिक्ल इंजीनियर की उपाधि हासिल की थी और वे दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े थे। उनके पिता आरोपों के बाद सार्वजनिक जीवन से लगभग अलग हो गए हैं। नांदेड़ के रहने वाले रमेश महालकर तीनों में सबसे कम चर्चित व्यक्ति हैं।
इन तीनों का नाम देश भर में कई बम विस्फोट मामलों में सामने आया है और वे एनआईए की सबसे वांछित आरोपियों की लिस्ट में शामिल हैं, जिनमें समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामला भी शामिल है।
2009 में निलंबित महाराष्ट्र असिस्टेंट पुलिस इंसपेक्टर महबूब मुजावर ने सोलापुर अदालत में एक हलफनामे में दावा किया था कि कलसांगरा और डांगे की मौत महाराष्ट्र एटीएस की हिरासत में हुई थी और उनके शवों को नवंबर 2008 के आतंकी हमलों के पीड़ितों के रूप में ठिकाने लगा दिया गया था। इस आरोप की कभी भी आधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुई है।
न आरोपी, न जवाब
लापता हुए सात लोग उस मामले की आखिरी कड़ी हैं जो बिना किसी समाधान के ही खत्म हो गया है। एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए नौ लोगों को 2016 में रिहा कर दिया गया था। एनआईए द्वारा आरोपित चार लोगों के आरोपों को इस हफ्ते बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया।
20 साल बाद भी पीड़ित पूछ रहे सवाल
साल 2006 में हुए मालेगांव धमाकों को करीब 19 साल बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवार आज भी एक ही सवाल पूछ रहे हैं – अगर किसी ने यह धमाके नहीं किए, तो उनके अपने कैसे मारे गए? 18 साल के साजिद की एक तस्वीर आज भी उसके परिवार के पास है। यह तस्वीर उसके चीन के वीजा पर लगी थी, जो उसकी मौत के दो दिन बाद आया था। पढ़ें पूरी खबर…
