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इस बार निगम चुनाव में भाजपा को कुल 36.08 % वोट मिले, जबकि ’2012 में हुए MCD में पार्टी 36.71 फीसद मत मिले थे

दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा को मिले कुल मत प्रतिशत ने उसकी जीत के जश्न को थोड़ा फीका किया है। इस चुनाव में पार्टी को कुल 36.08 प्रतिशत मत मिले हैं।
Author नई दिल्ली | April 28, 2017 01:47 am

दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा को मिले कुल मत प्रतिशत ने उसकी जीत के जश्न को थोड़ा फीका किया है। इस चुनाव में पार्टी को कुल 36.08 प्रतिशत मत मिले हैं। दरअसल, पिछले निगम चुनाव से तुलना करें तो इसमें कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2012 में हुए निगम चुनाव में भाजपा को 36.71 फीसद मत मिले थे। भाजपा के रणनीतिकार भले ही इस पर सार्वजनिक रूप से बोलने से बच रहे हों लेकिन वास्तव में उनकी जीत गैर भाजपा मतों के आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस में विभाजित होने की वजह से हो पाई। नतीजों से सबसे बड़ा सदमा ‘आप’ को लगा जिसे विधानसभा चुनाव में 54.02 फीसद मत मिले थे और इस चुनाव में उसे मात्र 26.23 फीसद मत मिल पाए।
किस बिरादरी ने किस दल को वोट दिया जिसका कोई निश्चित पैमाना नहीं है लेकिन यह तय है कि भाजपा को अपने परंपरागत पंजाबी, वैश्य, सवर्ण और मध्यम वर्ग के अलावा पूर्वांचल (बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड) के प्रवासियों के एक हिस्से का ही वोट मिल पाया। अगर भाजपा के पक्ष में आंधी होती तो पार्टी को मिला मत प्रतिशत 2014 के लोक सभा चुनाव की तरह 40 फीसदी के पार होता।

दिल्ली में विधानसभा बनवाने का आंदोलन भाजपा नेता मदनलाल खुराना की अगुआई में चला और वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को करीब 43 फीसद मतों के साथ सत्ता मिली। उसके बाद भाजपा को लोक सभा चुनाव को छोड़कर किसी भी चुनाव में 37 फीसद से ज्यादा वोट नहीं मिले। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से सीधा मुकाबला होने की वजह से भाजपा वर्ष 1998 के बाद से लगातार दिल्ली सरकार से बाहर रही क्योंकि उसके मत प्रतिशत में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। नगर निगम चुनावों में भी उसे इतने ही वोट मिले लेकिन बसपा और अन्य दलों ने गैर भाजपा मतों का कांग्रेस के साथ विभाजन किया, इसलिए भाजपा लगातार 2007 और 2012 के निगम चुनाव जीत गई। इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले निगम में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त माहौल बना था।

उन चुनावों के नतीजों ने दिल्ली का माहौल बदल दिया। नगर निगम के विधान के हिसाब से इस बार का चुनाव नए परिसीमन पर हुआ। इसलिए अगर भाजपा अपने सभी पूर्व पार्षदों के टिकट न भी काटती तो ज्यादातर के टिकट कट ही जाते। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने माहौल बदलने के लिए सभी निगम पार्षदों के टिकट काटने का निर्णय किया।
पार्टी का वोट बैंक बढ़ाने के लिए बिहार मूल के उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया। चुनावी माहौल बनाने में इसका उन्हें लाभ मिला। भाजपा के 32 पूर्वांचल मूल के उम्मीदवारों में 20 चुनाव जीतने में सफल रहे। बावजूद इसके अगर पंजाब चुनाव ‘आप’ जीत गई होती तो भाजपा की राह कठिन होती। कांग्रेस को पंजाब चुनाव जीत का पूरा फायदा नहीं मिल पाया। बुरी स्थिति में भी कांग्रेस पर गुटबाजी हावी रही लेकिन विपरीत हालात में भी उसे करीब 22 फीसद वोट मिले। ‘आप’ ने वर्ष 2013 में विधानसभा के रूप में पहला चुनाव लड़ा। उसमें ‘आप’ को 28 सीट और करीब 29.50 फीसद मत मिले थे। तब कांग्रेस को 24.50 फीसद मतों के साथ सिर्फ आठ सीटें मिली थीं।

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