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पश्चिमी दिल्ली : भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर

परिसीमन के बाद 2009 में जब पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर पहली बार चुनाव हुए तो कांग्रेस के महाबल मिश्रा बड़ी आसानी से जीत गए थे लेकिन 2014 में चली मोदी लहर में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।

पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर भाजपा के प्रवेश वर्मा और कांग्रेस के महाबल मिश्रा के बीच कांटे की टक्कर होने के आसार हैं।

अजय पांडेय

दिल्ली में लोकसभा चुनाव के मतदान की तारीख जैसे-जैसे करीब जा रही है, वैसे-वैसे यहां के सियासी मुकाबले की तस्वीर भी साफ होती जा रही है। पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर भाजपा के प्रवेश वर्मा और कांग्रेस के महाबल मिश्रा के बीच कांटे की टक्कर होने के आसार हैं। हालांकि आम आदमी पार्टी (आप) के बलबीर जाखड़ भी कांग्रेस-भाजपा की इस भिड़ंत को त्रिकोणीय बनाने की पूरीकोशिश कर रहे हैं। परिसीमन के बाद 2009 में जब पश्चिमी दिल्ली संसदीय सीट पर पहली बार चुनाव हुए तो कांग्रेस के महाबल मिश्रा बड़ी आसानी से जीत गए थे लेकिन 2014 में चली मोदी लहर में उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा ने महाबल को इस सीट पर शिकस्त दी थी। भाजपा और कांग्रेस की ओर से एक बार फिर से ये दोनों नेता अपनी किस्मत आजमाने चुनाव मैदान में उतरे हैं।

प्रवेश वर्मा अपने चुनाव प्रचार के दौरान पांच साल में किए अपने कार्यों का हवाला तो जरूर दे रहे हैं लेकिन इस दौरान वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी अगुआई वाली सरकार की उपलब्धियों का जिक्र भी बार-बार कर रहे हैं। इस बार क्षेत्र में मोदी लहर भले नहीं दिख रही हो लेकिन भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि बहुत बड़ी संख्या में मतदाता प्रधानमंत्री के नाम पर ही मतदान करेंगे। जाहिर तौर पर यहां भी चुनाव में प्रधानमंत्री का नाम भाजपा का बड़ा चुनावी औजार मालूम पड़ रहा है लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पांच साल तक सत्ता में रहने के अपने फायदे हैं तो नुकसान भी हैं और भाजपा सांसद वर्मा भी इस मामले में अपवाद नहीं हैं।

कांग्रेस के महाबल मिश्रा के लिए एक अच्छी स्थिति यह है कि कांग्रेस न तो केंद्र में, न दिल्ली में और न ही नगर निगम की सत्ता पर काबिज है। लिहाजा, उनके लिए तमाम समस्याओं का ठीकरा भाजपा पर और आम आदमी पार्टी पर फोड़ना आसान है। हालांकि उनके पास गिनाने के लिए खास उपलब्धियां नहीं हैं। वे अपने कार्यकाल की याद क्षेत्र के लोगों को दिला रहे हैं। उन्होंने इस चुनाव में दिल्ली विश्वविद्यालय का पश्चिमी परिसर अपने इलाके में बनवाने का नारा दिया है। वे लोगों से बार-बार यह भी कहना नहीं भूलते कि वे सबके सुख-दु:ख में शामिल रहे हैं। ‘आप’ के बलबीर जाखड़ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी अगुआई वाली दिल्ली सरकार की उपलब्धियों और दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के नाम पर जनता से वोट मांग रहे हैं। दिल्ली में स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरी के नाम पर जनता से समर्थन देने की गुहार लगा रहे हैं। उनके सामने चुनौती यह है कि वे बाकी दोनों उम्मीदवारों की अपेक्षा नए हैं और एक मंजे हुए अखाड़ेबाज की तरह सियासी दांव-पेंच नहीं जानते। हालांकि पूरे क्षेत्र में ‘आप’ के ही विधायक हैं और इसका फायदा उन्हें जरूर मिल रहा है। सियासी गणित की बात करें तो भाजपा ओर ‘आप’ दोनों ने जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जबकि महाबल की पहचान मोटे तौर पर पूर्वांचल के नेता के तौर पर रही है। वे यह दावा करना नहीं भूलते कि पूर्वांचल के अलावा भी समाज के हर तबके के लोगों के साथ उनके बेहतर रिश्ते हैं। क्षेत्र में पूर्वांचल के मतदाता बड़ी संख्या में हैं जो अलग-अलग जातियों में बंटे हैं। जानकारों का मानना है कि यदि ‘आप’ मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में कामयाब हो गई तो भाजपा के लिए जीत दर्ज करना आसान होगा, अन्यथा कांग्रेस व भाजपा के बीच आमने-सामने के मुकाबला होने की सूरत में दिलचस्प परिणाम की उम्मीद की जानी चाहिए।

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