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हिंसा और मौत पर गरमाई सियासत

चौथे चरण के मतदान में सीआइएसएफ की गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी। गोलीबारी से पहले दो गुटों के बीच गोलीबारी में 18 साल का एक युवक मारा गया। ममता बनर्जी पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बल का घेराव करने की बात कही और यही वजह है कि कूचबिहार जैसी हिंसा हुई।

west bengal assembly election 2021नादिया के कृष्णगंज में मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस के लिए प्रचार करने पहुंची सांसद व अभिनेत्री जया बच्चन।

पश्चिम बंगाल में चार चरण के मतदान हो चुके हैं। चार चरण बाकी हैं। चिंता की बात यह है कि जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है, हिंसा भी बढ़ती जा रही है। 27 मार्च को पहले चरण का मतदान था, उस दिन हिंसा की घटनाएं तो हुईं, लेकिन किसी की जान नहीं गई। इसके बाद एक अप्रैल को दूसरे दौर का मतदान हुआ, जिसमें एक व्यक्ति की जान गई। छह अप्रैल को तीसरे चरण में दो लोग मारे गए। चौथे चरण में पांच लोग मारे गए। चौथे चरण में सीतलकूची गोलीकांड को लेकर सियासत तेज हो गई है। भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने एक दूसरे पर दोषारोपण किए हैं। नेताओं के विवादित बोल सामने आए हैं और आचार संहिता का हवाला देकर चुनाव आयोग ने कार्रवाई भी की है।

चौथे चरण के मतदान में सीआइएसएफ की गोलीबारी में चार लोगों की मौत हो गई थी। गोलीबारी से पहले दो गुटों के बीच गोलीबारी में 18 साल का एक युवक मारा गया। ममता बनर्जी पर आरोप लग रहा है कि उन्होंने केंद्रीय सुरक्षा बल का घेराव करने की बात कही और यही वजह है कि कूचबिहार जैसी हिंसा हुई। इस हिंसा को लेकर ममता बनर्जी ने गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम भाजपा नेताओं को जिम्मेदार ठहराया और शाह का इस्तीफा मांग लिया। दूसरी ओर, बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष, वरिष्ठ नेता राहुल सिन्हा, सायंतन बसु ने कहना शुरू किया कि गोलीबारी जायज है, और ऐसी कार्रवाई होगी, और लोगों को मारना चाहिए था आदि।

दरअसल, बंगाल में हिंसा की राजनीति और उसके जरिए चुनावी ध्रुवीकरण की कवायद नई नहीं है। बंगाल में हिंसा की राजनीति की शुरुआत साठ के दशक में शुरू हुई। 1967 में वहां पहली बार गठबंधन की सरकार आई। 17 मार्च 1970 को हिंसा की पहली बड़ी घटना बर्दवान में हुई, जिसमें कुछ लोगों की इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर माकपा में शामिल होने से मना कर दिया था। 1971 के फरवरी महीने में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कोलकाता में फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता हिमंता बसु की हत्या हो गई।
जब भी होता है चुनाव, बंगाल में खून खराबा होता है।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान बंगाल में 693 हिंसक घटनाएं हुईं, जिसमें 11 लोगों की जान गई। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2016 में बंगाल में सियासी हिंसा की कुल 91 घटनाएं हुईं। 205 लोग चुनावी हिंसा के शिकार हुए। सियासी रंजिश में 36 लोगों की हत्या हुई। 2015 में कुल 131 घटनाएं दर्ज की गईं। 2013 में सियासी झड़पों में कुल 26 लोगों की जान गई। बंगाल में पंचायत चुनाव का इतिहास भी खूनी रहा है।

2018 में पंचायत चुनाव के दौरान भाजपा ने अपने 1200 से भी ज्यादा कार्यकर्ताओं के घायल होने का दावा किया। 2013 के पंचायत चुनाव में 10 लोगों की मौत का दावा किया गया था। 2008 के पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा में 19 लोगों की मौत का दावा किया गया। 1990 में वाममोर्चा के शासन के दौरान पंचायत चुनाव में 400 लोगों की हत्या का आरोप लगा।

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