अब दो ध्रुवीय मुकाबले की ओर बढ़ा चुनाव

भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की अधिकतर सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नीति में बदलाव किया और सभी शरणार्थी कॉलोनियों को नियमित करके उन्हें भूमि अधिकार दिए। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के क्रियान्वयन में देरी तथा संशय की स्थिति को भी भुनाने का प्रयास किया।

west bengal, prashant kishore, owaisiअसदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि क्लब हाउस में प्रशांत किशोर के दिल की बात जुबान पर आ ही गई। (एक्सप्रेस फोटो/अमित मेहरा/अभिनव साहा)

पश्चिम बंगाल में अभी चार चरणों के लिए मतदान होना बाकी है। जिन क्षेत्रों में मतदान होना है, उन क्षेत्रों में सभी राजनीतिक दल अपना-अपना बहुमत सुनिश्चित करने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं। धार्मिक और जातिगत समीकरण से जुड़े मुद्दे अब गौण होते दिख रहे हैं। विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाने शुरू किए हैं। सीतलकूची हिंसा और उसके बाद तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के खिलाफ कार्रवाई को लेकर विपक्ष पार्टी लाइन से इतर जाकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाने लगा है। केंद्र में सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ लामबंदी तेज हुई है। परोक्ष तौर पर ‘बंगाल की अस्मिता’ और ‘बंगाली अस्मिता’ का मुद्दा उठाने का मौका न सिर्फ ममता बनर्जी को मिल रहा है, बल्कि वाममोर्चा और कांग्रेस भी इस मुद्दे की छांव लेने लगी हैं। बंगाल लाइन ममता बनर्जी की पसंदीदा लीक रही है।

ऐसे में बंगाल में ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे कर लड़ रही भाजपा के बीच दो ध्रुवीय मुकाबले के समीकरण बनने लगे हैं। इससे पहले के चार चरणों में कांग्रेस-वाममोर्चा और नवगठित इंडियन सेक्युलर फ्रंट का गठबंधन भी अपनी खोई जमीन की तलाश करता दिख रहा था। इस गठबंधन के सामने आने के बाद से बंगाल के मुसलिम और महिला मतदाताओं में बिखराव की संभावना जताई जा रही थी। लेकिन पहले तो ममता बनर्जी को लगी चोट के कारण महिला मतदाताओं के वोट एकतरफा जाने लगे और अब सीतलकूची कांड के कारण अल्पसंख्यक वोट बैंक भी एकतरफा मूड बनाता दिख रहा है।

ऐसे में भाजपा ने दलित और पिछड़े वोट बैंक का मुद्दा उछालना शुरू किया है। बंगाल में अब बाकी के चार चरणों की बहुसंख्यक सीटों पर तृणमूल कांग्रेस की खासी पकड़ मानी जाती है। लगभग 164 सीटों में से 110 सीटों पर दलित मतदाताओं को अहम माना जा रहा है। बंगाल के मतदाताओं में से 23.5 फीसद दलित समुदाय से हैं। कूच बिहार और उत्तर बंगाल के अन्य सीमावर्ती जिलों में रहने वाले राजवंशियों व पूर्ववर्ती पाकिस्तान से आए मतुआ शरणार्थियों एवं उनके वंशजों का दक्षिण बंगाल में 30-40 सीटों पर प्रभाव है। ये बंगाल में दो सबसे बड़े दलित समुदाय हैं, जिन्हें लुभाने के लिए तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों लगे हुए हैं। दोनों दल दलितों और अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) के अधिकारों की बात कर रहे हैं। राज्य में 68 सीटें अनुसूचित जातियों के लिए और 16 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही सत्ता में आने पर महिष्य, तेली, तामुल और साहा जैसे समुदायों को मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार ओबीसी की सूची में शामिल करने का वादा किया है।

भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की अधिकतर सुरक्षित सीटों पर जीत हासिल की थी, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने अपनी नीति में बदलाव किया और सभी शरणार्थी कॉलोनियों को नियमित करके उन्हें भूमि अधिकार दिए। इसके साथ ही नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) के क्रियान्वयन में देरी तथा संशय की स्थिति को भी भुनाने का प्रयास किया।

पांचवें चरण में क्या समीकरण
पांचवें चरण में शनिवार को छह जिलों की जिन 45 सीटों के लिए मतदान होना है उनमें सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और अबकी सत्ता की प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। उत्तर बंगाल के तीन जिलों दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और जलपाईगुड़ी जिले की 13 सीटों पर भाजपा मजबूत नजर आ रही है तो दक्षिण बंगाल के तीन जिलों उत्तर 24-परगना, पूर्व बदर्वान और नदिया जिले की 32 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस। इस दौर में चाय बागान मजदूरों के अलावा मतुआ और अल्पसंख्यक समुदाय की भूमिका निर्णायक होगी।

भाजपा और तृणमूल कांग्रेस चाय बागान के मजदूरों को लुभाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। इसी कवायद के तहत केंद्र सरकार ने जहां बजट में बागान मजदूरों के लिए एक हजार करोड़ का प्रावधान किया था, वहीं ममता बनर्जी भी इलाके में पहुंच कर सरकारी योजना के तहत मजदूरों को पक्के मकानों के कागज बांट चुकी हैं।
दार्जिलिंग और कालिम्पोंग की छह सीटों पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और चाय बागान मजदूरों के वोट निर्णायक हैं। जलपाईगुड़ी में भी गोरखा आबादी अच्छी-खासी है। शुरू से ही भाजपा के साथ रहे मोर्चा के दोनों गुट इस बार तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। हालांकि तृणमूल ने विमल गुरुंग गुट के उम्मीदवारों के समर्थन का ही फैसला किया है। दार्जिलिंग की सिलीगुड़ी सीट को माकपा का गढ़ माना जाता है। यहां वर्ष 20121 और 2016 में भी सीपीएम के अशोक भट्टाचार्य चुनाव जीत चुके हैं। जहां तक दक्षिण बंगाल के 32 सीटों की बात है, उत्तर 24-परगना और नदिया जिले की सीटों पर मतुआ और मुसलमान समुदाय के वोट निर्णायक हैं। यही वजह है कि भाजपा ने मतुआ समुदाय के लुभाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। जिन इलाकों में 17 और 22 अप्रैल को मतदान हैं, उनमें मतुआ समुदाय के वोट निर्णायक हैं।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 1.84 करोड़ है और इसमें 50 फीसद मतुआ समुदाय के लोग हैं। करीब 70 विधानसभा सीटों पर यह समुदाय जीत-हार तय करने में अहम भूमिका निभाता है। नमोशूद्रसमाज के लोग भी मतुआ समुदाय को मानते हैं। ऐसे में, राज्य में मतुआ समुदाय को मानने वालों की आबादी लगभग तीन करोड़ है। पांचवें चरण में उत्तर-24 परगना की 16 सीटों पर मतदान होना है। इन इलाकों में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 40 फीसद है। तृणमूल कांग्रेस को अपने इस वोट बैंक के सहारे बेहतर प्रदर्शन का भरोसा है।

सीतलकूची हिंसा को लेकर तेज हुआ ‘बंगाल लाइन’ पर ध्रुवीकरण
बंगाल में ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे कर लड़ रही भाजपा के बीच दो ध्रुवीय मुकाबले के समीकरण बनने लगे हैं। इससे पहले के चार चरणों में कांग्रेस-वाममोर्चा और नवगठित इंडियन सेक्युलर फ्रंट का गठबंधन भी अपनी खोई जमीन की तलाश करता दिख रहा था। इस गठबंधन के सामने आने के बाद से बंगाल के मुसलिम और महिला मतदाताओं में बिखराव की संभावना जताई जा रही थी।

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