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लोकसभा में हार के बाद ममता की बदली किस्मत

मीडिया में कभी-कभार आने वाले साक्षात्कार को छोड़कर वे आम तौर पर अपने चुनावी ‘वार रूम’ में चुपचाप काम करते हैं या पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के जमावड़े के बीच बैठकर धैर्य के साथ उनकी बातें सुनते हैं।

Author Updated: May 3, 2021 1:03 AM
safologistप्रशांत किशोर।

मीडिया में कभी-कभार आने वाले साक्षात्कार को छोड़कर वे आम तौर पर अपने चुनावी ‘वार रूम’ में चुपचाप काम करते हैं या पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के जमावड़े के बीच बैठकर धैर्य के साथ उनकी बातें सुनते हैं। इसके बावजूद प्रशांत किशोर को अक्सर चुनावी खेल में दलों के अग्रणी नेताओं की जीत में ‘मैन आॅफ द मैच’ का ‘खिताब’ दिया जाता है। पश्चिम बंगाल भी इसका अपवाद नहीं है।

उन्होंने पिछले साल दिसंबर में ट्वीट किया था, ‘वास्तव में बीजेपी पश्चिम बंगाल में दो अंकों को पार करने के लिए संघर्ष करेगी।’ उनकी भविष्यवाणी सच साबित हुई। उन्होंने कहा था, ‘अगर भाजपा इससे बेहतर करती है, तो मैं यह स्थान छोड़ दूंगा।’ राज्य में भाजपा के ऊर्जावान प्रचार अभियान को देखते हुए उनके इस बयान को दुष्साहसिक माना गया। हालांकि रविवार को तृणमूल की भारी जीत के बावजूद, किशोर ने घोषणा की कि वे राजनीतिक दलों के लिए रणनीति बनाना छोड़ देंगे। उन्होंने टीवी चैनलों को बताया, ‘मैं इस स्थान को छोड़ रहा हूं।’

प्रशांत किशोर, जिन्हें उनकी टीम के सदस्य पीके कहते हैं, ने ममता बनर्जी के अनुरोध पर तृणमूल कांग्रेस के लिए उस समय काम करना शुरू किया, जब 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने राज्य की 42 में से 18 सीटें जीत लीं थी और यह साफ दिखाई दे रहा था कि सत्तारूढ़ पार्टी राज्य पर अपनी पकड़ खो रही है।

प्रशांत किशोर ने यह महसूस किया कि निचले स्तर पर कई टीएमसी नेताओं को लेकर लोगों में गुस्सा है और उन पर अक्सर जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं। ऐसे में किशोर ने ‘दीदी के बोलो’ या (दीदी को बताओ) अभियान के तहत नागरिकों से सीधे संपर्क किया, जिसके तहत नागरिक सीधे ममता बनर्जी से शिकायत कर सकते थे।
राजनीतिक विश्लेषक और कलकत्ता शोध समूह के सदस्य रजत रॉय ने कहा, ‘पीके का कार्यक्रम लोकप्रिय हुआ और इसने एक सुरक्षा वाल्व के रूप में काम किया।’ किशोर चुनावी रणनीतियों को सफलतापूर्वक तैयार करने का अनुभव रखते हैं, जिसमें 2014 में नरेंद्र मोदी का पहला प्रधानमंत्री अभियान भी शामिल है, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे।’

किशोर ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 2015 के अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया और इसके बाद पंजाब में कांग्रेस के कैप्टन अमंिरदर ंिसह को चुनाव जिताने में मदद की। इसके बाद उन्होंने साबित किया कि वह चुनावी रणनीति के मास्टर हैं और 2019 में आंध्र प्रदेश की सत्ता में आने के लिए वाइएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी की मदद की। उन्होंने 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान अरंिवद केजरीवाल को भी सलाह दी थी।

मौलाना आजाद इंस्टीट्यूट आॅफ एशियन स्टडीज, कोलकाता के पूर्व प्रमुख रणवीर समददार ने कहा, ‘मुख्यमंत्री महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय थीं। महिलाओं के लिए लाभकारी पहलों ने अपना अच्छा असर दिखाया… उनके अधिक वोट पाने में मदद मिली।’ हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में भाजपा के जोरदार चुनाव अभियान ने किशोर को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने पर मजबूर किया। इस पर उनका जवाब था, ‘‘बांग्ला निजेर मेय के चॉय’’ यानी बंगाल अपनी बेटी को चाहता है। इसके बाद बनर्जी ने बांग्ला बनाम बाहरी की बहस को तेज करते हुए बंगाली उप-राष्ट्रवाद को आगे बढ़ाया। यह किशोर ही थे, जिन्होंने भाजपा की विशाल चुनावी सेना के खिलाफ ममता बनर्जी के अभियान को एक बड़ी सफलता दिलाने का रास्ता तैयार किया।

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