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बंगाल: मुस्लिम टीचर ने किया हिंदू साथी का अंतिम संस्‍कार, सिर भी मुंडाया

बंगाल के जलपाईगुड़ी में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपने हिंदू साथ की मौत के बाद रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया। अपने बाल भी मुंडाए और पुजारी को भी बुलाया।

तस्वीर का उपयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के बनरहट में एक मुस्लिम व्यक्ति ने अपने साथी हिंदू शिक्षक की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार किया। रीति-रिवाजों के अनुसार अपने बाल और मूछ भी मुंडाया। मुस्लिम व्यक्ति का नाम अशफाक अहमद है और मृतक का नाम संजन कुमार विश्वास। टीओआई की रिपोर्ट के अनुसार, संजन कुमार विश्वास की तीन बेटिया ही थी। वे बनरहट हाई स्कूल में पढ़ाते थे। वर्ष 2005 में रिटायर हो गए थे। वहीं, अशफाक अभी भी उसी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। अशफाक विश्वास को अपना गुरु मानते है। उनके ही मदद से 1999 में स्कूल में अंग्रेजी विषय के शिक्षक के रूप में अशफाक की नियुक्ति हुई थी। हिंदू रीति-रिवाज से दाह-संस्कार करने के बाद अशफाक अहमद ने 11 दिनों तक शोक भी मनाया। इसके बाद उन्होंने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए पुजारी भी बुलाए।

अशफाक ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया, “स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर विद्यालय अपना स्वर्ण जयंती मना रहा था। मेरी नियुक्ति उसी साल हुई थी। वहां कई ऐसे लोग थे जो धर्म का हवाला देते हुए मेरी नियुक्ति का विरोध कर रहे थे, लेकिन विश्वास मेरे साथ दृढ़ता से खड़े रहे। उन्होंने मुझे इस तरह की बातों को नजरअंदाज करने को कहा। जब तक नया घर नहीं मिला, उन्होंने मुझे अपने घर में रखा। वे धर्म में नहीं, मानवता में विश्वास रखते थे। यह बात मैंने भी उन्हीं से सीखी।” बनरहट हाई स्कूल में पढ़ाने वाले एक सायंस टीचर मुकुल बर्मन कहते हैं, “विश्वास ने कई लोगों के उपर अमिट छाप छोड़ी, लेकिन अशफाक की जिंदगी सबसे अधिक प्रभावित हुई। विश्वास ने उनकी जिंदगी के बाद जो किया, वह इस बात को साफ तौर पर प्रदर्शित कर रहा है।”

अशफाक के पिता अभी जीवित हैं। वे मुर्शिदाबाद के कांडी में रहते हैं। वे भी अपने बेटे के फैसले के बीच में नहीं आए। अशफाक की पत्नी और बेटे ने भी उनका साथ दिया। अशफाक कहते हैं, “मैं एक उदार इंसान हूं और यह सब विश्वास सर की वजह से है। मैं हमेशा कहता था कि मेरे तीन पिता है, एक मेरे जैविक पिता, दूसरे मेरे शिक्षक और तीसरे विश्वास। मैं उदार सोच के लिए सदा उनका अभारी रहूंगा।” अशफाक ने विश्वास का अंतिम संस्कार करने के बाद रविवार को डायना नदी के तट पर अपने बाल और मूछ भी मुंडवाए। उन्हें इसकी फिक्र नहीं है कि लोग क्या कहेंगे। अशफाक का मानना है उन्हें जो करना चाहिए, वो किया।

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