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बंगाल ने बागियों और महारथियों को चटाई धूल

बंगाल में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के साथ ही तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने लोगों का दिल जीत लिया।

Bengal electionपार्टी की जीत पर जश्‍न मनाते तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता। फाइल फोटो।

बंगाल में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के साथ ही तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने लोगों का दिल जीत लिया। उनकी पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाले अधिकांश बागी हार गए। चुनौती दे रही भाजपा के सांसदों समेत कई दिग्गज धूल चाटते नजर आए। उन दिग्गजों में अपवाद मुकुल रॉय और शुभेंदु अधिकारी रहे।

मुकुल रॉय तो आसानी से अपनी कृष्णनगर उत्तर सीट जीत गए। लेकिन ममता बनर्जी को 50 हजार वोटों से हराने की कसम खाने वाले शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम से कांटे की टक्कर में मात्र कुछ वोटों से जीत सके। फिर भी, इस जीत के जरिए वे ममता बनर्जी को हराने के बाद ‘जायंट किलर’ का खिताब ले गए। इन दोनों को छोड़ भाजपा के टिकट पर मैदान में उतारे गए तमाम दिग्गज सांसद और उनके साथ पाला बदल करने वाले एक दर्जन से ज्यादा नेता तो चुनौती तक पेश नहीं कर पाए।

अब राजनीतिक तौर पर भाजपा के हारने वाले दिग्गजों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। ऐसे नेताओं को ही भाजपा ने चुनावी मैदान में अपना चेहरा बनाया था। ममता बनर्जी पूरे चुनाव पाला बदल करने वाले नेताओं पर निशाना साधतीं रहीं। उन्हें गद्दार और मीरजाफर कहती रहीं। भाजपा के दिग्गज नेताओं में शुमार सांसद लॉकेट चटर्जी विधानसभा चुनाव में चूंचुड़ा सीट से हार गईं। तृणमूल कांग्रेस ने जब ममता बनर्जी के लिए बंगाल अपनी बेटी को चाहता है वाला नारा दिया था, तब भाजपा ने अपने पोस्टर में लॉकेट को बंगाल की असली बेटी कहा था।

राज्यसभा सांसद रहे स्वपन दासगुप्ता भाजपा के टिकट पर तारकेश्वर सीट नहीं निकाल पाए। भाजपा के आसनसोल से सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को पार्टी अपना मजबूत उम्मीदवार मान रही थी। वे भी टॉलीगंज सीट पर कमाल नहीं कर पाए।
चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस से कई नेताओं ने भाजपा का दामन थामा। भाजपा उन नेताओं को जीतने वाले घोड़े मान रही थी, लेकिन राजनीतिक लड़ाई में ममता बनर्जी ने उन नेताओं को गद्दार और मीरजाफर कहा। उन नेताओं के खिलाफ तृणमूल का यह नारा चल निकला। सिंगूर से भाजपा ने तृणमूल के पूर्व नेता और पूर्व मंत्री रवींद्रनाथ भट्टाचार्य पर दांव लगाया था। लेकिन ‘मास्टर मोशाई’ कहे जाने वाले भट्टाचार्य का हाथ उनके शिष्यों ने ही झटक दिया।

नेताओं ने दल बदला, लेकिन मतदाताओं का दिल नहीं बदला। ममता बनर्जी की पूर्ववर्ती सरकार में मंत्री रहे राजीव बनर्जी पर भाजपा ने हावड़ा के डोमजूड़ सीट के लिए दांव आजमाया था। वे कमाल नहीं कर पाए। इसी तरह पूर्व बीसीसीआइ अध्यक्ष और क्रिकेट प्रशासक जगमोहन डालमिया की बेटी वैशाली डालमिया का बाली से कमल खिलाने का अभियान नाकाम रहा। इसी साल वैशाली तृणमूल छोड़ भाजपा में शामिल हुई थीं। दीपक हलदर को डायमंड हार्बर सीट पर नाकामी हाथ लगी। वे इसी साल फरवरी में तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए।

इसी तरह अरिंदम भट्टाचार्य जगतदल से, विश्वजीत कुंडू कालना सीट से, दुर्गापुर पूर्व से कर्नल दीप्तांशु चौधरी, मुकुल रॉय के बेटे शुभ्रांशु रॉय बीजपुर सीट पर कमाल नहीं कर पाए। नोआ पारा से भाजपा उम्मीदवार सुनील सिंह को भी मुश्किलें आईं। भाजपा सांसद अर्जुन सिंह के रिश्तेदार सुनील दो साल पहले भाजपा में शामिल हुए थे। खड़दा सीट से शीलभद्र दत्ता पीछे रह गए। सन्मय बंदोपाध्याय पानीहाटी सीट से पीछे रहे। वे कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए थे। विधाननगर सीट से सब्यसाची दत्ता पीछे रह गए। जादवपुर सीट से रिंकू नस्कर पीछे रहीं। वह माकपा छोड़ भाजपा में शामिल हुईं थीं।

दूसरी ओर, मुकुल रॉय जैसे कई रहे, जिन्होंने पालाबदल किया था- वे जीते। मुकुल रॉय कृष्णानगर उत्तर सीट से जीत गए। पार्थ चटर्जी को रानाघाट उत्तर पश्चिम सीट पर आगे रहे। मिहिर गोस्वामी नाटाबाड़ी विधानसभा सीट से आगे रहे। वे हाल ही में तृणमूल छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। इसी तरह, पांडवेश्वर सीट पर जीतेंद्र तिवारी रहे, जो ऐन चुनाव के पहले तृणमूल छोड़ भाजपा में आए थे।

बीते करीब दो साल में तृणमूल के करीब छह सांसद और 14 विधायकों ने पार्टी छोड़ी। दल बदलने वाले इन नेताओं में शुभेंदु अधिकारी और शीलभद्र दत्ता आदि दिग्गज नेता शामिल थे, जो भाजपा में चले गए। इनमें सांसद सुनील मंडल के अलावा मिहिर गोस्वामी, अरिंदम भट्टाचार्य, राजीव बनर्जी, तापसी मंडल, सुदीप मुखर्जी, सैकत पांजा, अशोक डिंडा, दीपाली विश्वास, शुक्र मुंडा, श्यामापद मुखर्जी, वनश्री माइति आदि रहे।

बंगाल में तृणमूल के दिग्गज नेताओं के भगवा रंग में रंगने की शुरुआत साल 2019 के लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले शुरू हुई थी। सबसे पहले मुकुल रॉय ने भाजपा का दामन थामा था और उसके बाद अनुपम हाजरा, सौमित्र खान आदि सांसद भाजपा में शामिल हो गए थे। इस बीच, विधायक अर्जुन सिंह भी भाजपाई बने और उसका इनाम लोकसभा चुनाव में बतौर सांसद मिला। पूर्व रेल मंत्री और तृणमूल से राज्यसभा सांसद दिनेश त्रिवेदी ने 12 फरवरी को राज्यसभा में इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा था।

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