ताज़ा खबर
 

‘बाहरी’ और ‘बंगाली अस्मिता’ के मुद्दों ने कर दिया ‘खेला’

बंगाल की सियासत का गणित साफ हो गया। तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार प्रदेश में सरकार बनाने जा रही है। तृणमूल ने बाहरी और बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा अपना वोट बढ़ा लिया।

west Bengalजीत का जश्‍न मनाते तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता। फाइल फोटो।

बंगाल की सियासत का गणित साफ हो गया। तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार प्रदेश में सरकार बनाने जा रही है। तृणमूल ने बाहरी और बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा अपना वोट बढ़ा लिया। मुसलिम, महिला मतदाता एकतरफा तृणमूल के साथ हो गए। दलितों का एक वर्ग भाजपा के साथ नहीं गया। बंगाल अपनी बेटी को चाहता है का नारा क्लिक कर गया। तृणमूल के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के दावे के अनुरूप भाजपा तिहाई के अंक तक भी नहीं पहुंचती दिख रही। शुरुआती रुझानों में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच फासला कम था। लेकिन तसवीर साफ होने पर स्पष्ट हो गया कि अबकी बार, 200 पार का नारा देने वाली भाजपा लक्ष्य से काफी पीछे रह गई।

बाबुल सुप्रियो, स्वप्न दासगुप्ता और लॉकेट चटर्जी जैसे भाजपा के कई दिग्गज पिछड़ गए। भले ही 2016 के मुकाबले भाजपा ने कई गुना बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन सरकार बनाने की उम्मीद पालने वाली पार्टी लक्ष्य से कोसों दूर रह गई। भाजपा ने राज्य में तृणमूल के कई कद्दावर नेताओं को अपने पाले में करने में सफलता पा ली, लेकिन वह वोट दिलाने में सफल नहीं हो सके।
भाजपा ने बंगाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत तमाम केंद्रीय मंत्रियों, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व मप्र के शिवराज सिंह चौहान को भी चुनावी समर में उतारा था, लेकिन नतीजों में इसका ज्यादा असर नहीं दिख रहा। दरअसल, राज्य में कोई मजबूत चेहरा न होने के चलते यह स्थिति पैदा हुई।

जनता के दिमाग में यह बात थी कि प्रधानमंत्री मोदी बंगाल के मुख्यमंत्री नहीं बनने वाले। पार्टी की ओर से किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया गया था। माना जा रहा है कि ममता के मुकाबले एक मजबूत चेहरे का अभाव पार्टी को खला है।
भाजपा ने भले ही मुकाबले को पूरी तरह से द्विपक्षीय बनाया, लेकिन यही समीकरण उसके लिए भारी पड़ा। वाममोर्चा और कांग्रेस को सीटें नहीं मिली, लेकिन उस गठबंधन ने भाजपा को हराने में अहम भूमिका निभाई। लोकसभा के अपने कुछ हिस्से का वोट गठबंधन ने भाजपा से छीना।

दूसरे तृणमूल ने बाहरी और बंगाली अस्मिता का मुद्दा उठा अपना वोट बढ़ा लिया। मुसलिम, महिला मतदाता एकतरफा तृणमूल के साथ हो गए। दलितों का एक वर्ग भाजपा के साथ नहीं गया। कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले मालदा में तृणमूल कांग्रेस ने क्लीन स्वीप किया है। कोरोना की दूसरी लहर के कहर के चलते चुनाव प्रचार प्रभावित होने का नुकसान भाजपा को हुआ है। आखिरी के छह दौर में तृणमूल को खासी बढ़त रही।

बंगाल में जय श्री राम के नारे को चुनावी मुद्दा बनाकर उतरी भाजपा को ध्रुवीकरण की बड़ी उम्मीद थी, लेकिन ऐसा होता नहीं दिखा। बंगाल में भाजपा के 100 सीटों से कम पर रहने से साफ है कि ध्रुवीकरण नहीं हो सका। ममता बनर्जी को लगी चोट और उनके खिलाफ निजी हमलों से भाजपा की पकड़ ढीली हुई। कोरोना महामारी ने भी बंगाल में भाजपा से वोटों का आॅक्सीजन छीना।

Next Stories
1 पश्चिम बंगाल में ओवैसी के साथ हो गया ‘खेला’, AIMIM के सातों उम्मीदवारों की जमानत जब्त
2 सियासी भागदौड़ में धरे रह गए किसानों के असल मुद्दे
3 आखिरी दोनों चरणों में कांग्रेस के गढ़ में पहुंची लड़ाई
ये पढ़ा क्या?
X