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डॉक्टरों की हड़ताल से खुली स्वास्थ्य ढांचे की कलई

ममता की टिप्पणियों ने भी आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने आंदोलन में बाहरी लोगों के शामिल होने का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों को दो घंटे के भीतर काम पर लौटने या सरकारी कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी दे दी।

पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टर 11 जून से हड़ताल पर थे। (फोटोः पीटीआई)

पश्चिम बंगाल में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल खत्म होने के बाद अब राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं धीरे-धीरे भले ही सामान्य हो रही हैं। लेकिन इस हड़ताल ने बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे की कलई खोल दी है। हजारों मरीजों को हुई परेशानियों और 24 से ज्यादा मरीजों की मौत के बाद यह सवाल उठने लगा है कि डॉक्टरों की यह हड़ताल कितनी जायज थी और क्या दूसरे पेशों की तरह डॉक्टरों को हड़ताल करने का अधिकार है?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से सुरक्षा का भरोसा देने और दूसरी मांगो पर विचार करने के बाद जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल खत्म जरूर हो गई लेकिन अब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिल सका है कि क्या यह समस्या का स्थायी समाधान है और आगे से ऐसी घटना की स्थिति में क्या डॉक्टर दोबारा हड़ताल पर नहीं जाएंगे। मुख्यमंत्री के साथ बैठक में राज्य भर से जुटे जूनियर डॉक्टरों ने आधारभूत ढांचे की कमियों पर जो सवाल उठाए उससे बंगाल में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली एक बार फिर सामने आ गई है।

बंगाल में हड़ताल की शुरुआत एक सप्ताह पहले तब हुई जब कोलकाता के एनआरएस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक मरीज की मौत के बाद उसके परिजनों ने जूनियर डॉक्टरों के साथ कथित रूप से मारपीट की। उसमें दो लोग घायल हो गए। उस घटना के विरोध में पहले एनआरएस के जूनियर डॉक्टरों ने काम ठप कर दिया। अगले दिन से बंगाल के तमाम सरकारी अस्पतालों में काम बंद हो गया। कोलकाता में मारपीट की ऐसी घटनाएं पहले भी होती रही हैं और उनके खिलाफ डॉक्टरों का आंदोलन भी। लेकिन पहली बार राज्य के तमाम सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ ज्यादातर निजी अस्पतालों और निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टरों ने भी एनआरएस की घटना के विरोध में काम बंद कर दिया। नतीजतन राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो गईं। धीरे-धीरे यह आग देश के दूसरे हिस्सों में फैल गई और तमाम डॉक्टर के साथ इंडियन मेडिकल एसोसिएशन भी इस हड़ताल के समर्थन में आ गया।

ममता की टिप्पणियों ने भी आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने आंदोलन में बाहरी लोगों के शामिल होने का आरोप लगाते हुए डॉक्टरों को दो घंटे के भीतर काम पर लौटने या सरकारी कार्रवाई का सामना करने की चेतावनी दे दी। इससे डॉक्टरों की नाराजगी बढ़ गई और वे ममता बनर्जी से ही माफी की मांग करने लगे। केंद्र सरकार ने भी इस मुद्दे पर बंगाल सरकार को परामर्श भेजा। इसके बाद ममता ने भाजपा पर आंदोलन को उकसाने का आरोप लगा कर मामले को सियासी रंग दे दिया।

यह हड़ताल अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है। मसलन आगे फिर ऐसी मारपीट हुई तो क्या होगा। बैठक में ममता ने भी माना कि तमाम सावधानियों के बावजूद ऐसी एकाध घटनाएं होती ही रहेंगी। क्या वैसे में डॉक्टर दोबारा हड़ताल पर चले जाएंगे। सबसे बड़ा सवाल उनके हड़ताल के अधिकार को लेकर उठ रहे हैं। वैसे सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही कई फैसले दे चुका है। शीर्ष अदालत एक मामले में कह चुका है कि चिकित्सा अधिकारी और सरकारी अस्पताल मानव जीवन को बचाने के कर्तव्य से बंधे हुए हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने छह मई 1996 को पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में अपने फैसले में कहा था कि अगर सरकारी अस्पताल किसी जरूरतमंद व्यक्ति का समय से इलाज मुहैया कराने में विफल रहता है तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के अधिकार की रक्षा की गारंटी का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में तमाम अदालतें डॉक्टरों को उनके हिपोक्रैटिक शपथ की भी याद दिला चुकी हैं। बंगाल के मामले में भी एक जनहित याचिका के आधार पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने डॉक्टरों को मरीजों की जान बचाने की उक्त शपथ की याद दिलाई थी। वकील सुनील सरकार कहते हैं कि कोई भी पीड़ित मरीज डॉक्टरों की हड़ताल की स्थिति में उनके खिलाफ मामला दायर करा सकता है।

लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों की दलील है कि डॉक्टर भी आखिर हाड़-मांस के सामान्य इंसान ही हैं। उनको भी सुरक्षा की जरूरत है। एक वरिष्ठ डॉक्टर सुकुमार सेन कहते हैं कि डॉक्टरों के कामकाज के लिए भयमुक्त माहौल बनाना जरूरी है ताकि वे लोग निडर होकर अपने पेशे पर ध्यान दे सकें। वे कहते हैं कि कई बार आधारभूत सुविधाओं की कमी का खामियाजा भी खासकर जूनियर डॉक्टरों को ही भुगतना पड़ता है। ऐसे में अपनी सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताएं जायज थीं।

बंगाल में स्वास्थ्य क्षेत्र पहले से ही बदहाल है। हालांकि बैठक में ममता ने दावा किया कि वर्ष 2011 में इस क्षेत्र का बजट महज छह सौ करोड़ था जो अब बढ़ कर 9600 करोड़ तक पहुंच गया है। उन्होंने माना कि सरकार के पास आधारभूत सुविधाओं की बेहतरी के लिए संसाधनों का अभाव है। ममता का कहना था कि सरकार को ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों के लिए डॉक्टर और नर्स नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले जूनियर डॉक्टरों पर भारी दबाव रहता है। रोजाना दूर दराज से हजारों की तादाद में लोग बेहतर इलाज की आस में इन अस्पतालों में पहुंचते हैं।

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