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पश्चिम बंगाल: पंचायत चुनावों के लिए कमर कसने लगे दावेदार

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद मुकुल राय की सांगठनिक क्षमता का लाभ उठा कर वह पंचायत चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता पर काबिज होने के अपने सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाना चाहती है।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (file photo)

पश्चिम बंगाल में अगले साल की शुरुआत में होने वाले पंचायत चुनावों के लिए तमाम प्रमुख दावेदार अभी से कमर कसने लगे हैं। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस जहां सरकार की ओर से शुरू की गई विकास योजनाओं के सहारे मैदान में उतर कर अपनी जीत का सिलसिला कायम रखने का प्रयास करेगी, वहीं विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस सरकार के कथित कुशासन, आतंक व भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर पांव जमाने का प्रयास करेंगे। आंकड़े और इतिहास गवाह है कि राज्य में जिस राजनीतिक पार्टी का पंचायतों पर कब्जा रहा है, वही विधानसभा चुनावों में भी जीतती रही है। वाममोर्चा ने पंचायतों पर अपनी मजबूत पकड़ के बूते ही बंगाल पर कोई 34 साल तक राज किया था।

आगामी पंचायत चुनाव जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और इसकी नेता ममता बनर्जी के लिए अग्निपरीक्षा साबित होंगे, वहीं भाजपा भी इसके जरिए अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने का प्रयास करेगी। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद मुकुल राय की सांगठनिक क्षमता का लाभ उठा कर वह पंचायत चुनावों में बेहतर प्रदर्शन कर वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता पर काबिज होने के अपने सपने को हकीकत में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाना चाहती है। दूसरी ओर, वाममोर्चा इन चुनावों के जरिए बीते कोई एक दशक से अपने पैरों तले की जमीन लगातार खिसकने की प्रक्रिया पर अंकुश लगाना चाहता और अब अगले पंचायत चुनावों से ही उसका पुनरुत्थान शुरू होगा। बंगाल में कांग्रेस को भी इन चुनावों से अपने भाग्योदय की उम्मीद है।
वर्ष 2013 में हुए पिछले पंचायत चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली के सबसे निचले स्तर यानी ग्राम पंचायतों की 55.8 फीसद सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी ने सबसे ऊपरी स्तर यानी जिला परिषद चुनावों में 17 में से 13 पर कब्जा कर लिया था। उसने पंचायत की लगभग 57 हजार सीटों में 6,272 सीटें तो निर्विरोध जीत ली थीं।

इससे वोटरों पर उसकी पकड़ का अंदाजा मिलता है। तब वाममोर्चा ने ग्राम पंचायतों की 22.9 फीसद सीटें जीती थीं और कांग्रेस ने लगभग सात फीसद। भाजपा पूरी तरह हाशिए पर ही रही थी। लेकिन अबकी तृणमूल कांग्रेस के सामने कई तरह की चुनौतियां हैं। खासकर चिटफंड कंपनियों के साथ तृणमूल नेताओं का नाम जुड़ने से उसके लिए परेशानी हो सकती है। पंचायत चुनावों से पहले राज्य सरकार ने ग्रामीण इलाकों में मुफ्त गायें बांटने का फैसला किया है। हालांकि उसकी दलील है कि इस योजना का मकसद लोगों को आत्मनिर्भर बनाना और राज्य में दूध का उत्पादन बढ़ाना है। लेकिन विपक्षी राजनीतिक दलों ने तृणमूल कांग्रेस पर तोहफे बांटने की राजनीति का आरोप लगाया है। लगभग साढ़े तीन दशक तक बंगाल पर राज करने वाला वाममोर्चा भी इन चुनावों के जरिए मुख्यधारा में वापसी के लिए जूझ रहा है। सांगठनिक कमजोरी और नेतृत्व की कमी जैसे विभिन्न मुद्दों से जूझ रहे मोर्चा ने अपने हाथों से निकली राजनीतिक जमीन को दोबारा हासिल करने के लिए माकपा की अगुवाई में पूरे राज्य में जनसंपर्क अभियान अभियान चलाया था। इसके तहत बंगाल प्लेटफार्म फार मास आर्गनाइजेशंस (बीपीएमओ) के बैनर तले तमाम वामपंथी दल और उससे जुड़े संगठन केंद्र व राज्य सरकार की कथित जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे।

भाजपा को उम्मीद

पार्टी इसके जरिए ग्रामीण इलाकों में अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रही है ताकि इसकी फसल व 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनावों में काट सके। अध्यक्ष अमित शाह कई बार बंगाल का दौरा कर चुके हैं। उनके निर्देश पर ही अब प्रदेश नेतृत्व राज्य के 77 हजार मतदान केंद्रों तक पहुंचने की योजना बना रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष कहते हैं कि कि पार्टी के 10 हजार कार्यकर्ताओं की टीम तमाम मतदान केंद्रों का दौरा कर लोगों को तृणमूल कांग्रेस के कुशासन की जानकारी देगी। घोष बताते हैं कि तृणमूल कांग्रेस के आतंक की वजह से भाजपा ने बीते पंचायत चुनावों में महज 25 से 30 फीसद सीटों पर ही अपने उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन अगले चुनाव में वह तमाम सीटों पर लड़ेगी। उनका दावा है कि लोग अब तृणमूल के विकल्प के तौर पर भाजपा की ओर देख रहे हैं।

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