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वाममुक्त होने की राह पर बढ़ता बंगाल, बार-बार मात खाने के बावजूद नहीं सीखा सबक

नगरपालिकाओं के पिछले चुनावों में तृणमूल के पास 93 सीटें थीं और वाममोर्चा के पास 36। जबकि कांग्रेस ने 16 जीती थीं।

माकपा ने आर्मी चीफ पर सेना की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का आरोप लगाया है।

वामपंथी दलों के वर्चस्व की वजह से पश्चिम बंगाल को किसी दौर में लालकिला यानी वामपंथियों का सबसे बड़ा गढ़ कहा जाता था। वर्ष 1977 के बाद से ही यहां हर चुनाव में अपने डंके बजाने बजाने वाला वाममोर्चा बीते छह वर्षों में राजनाति के हाशिए पर पहुंच गया है। वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त खाने के बाद अब यहां होने वाले हर चुनाव के साथ ही यह राज्य वाममुक्त होने की राह पर कदम बढ़ा रहा है। कांग्रेस का तो यहां वैसे भी कोई नामलेवा नहीं था। राज्य में हाल में हुए शहरी निकाय चुनाव के नतीजे भविष्य के राजनातिक परिदृश्य की ओर संकेत करते हैं। सात नगरपालिकाओं की 148 सीटों के लिए हुए इन चुनावों में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने 140 सीटों पर जीत का परचम लहरा कर राज्य की राजनीति और वोटरों पर एक बार फिर अपनी पकड़ साबित कर दी। लेकिन कोई साढ़े तीन दशक तक बंगाल पर राज करने वाले वाममोर्चा को महज एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। यह सीट भी मोर्चा के प्रमुख दल माकपा को नहीं बल्कि उसके सहयोगी फारवर्ड ब्लाक को मिली। कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। उसका एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत सका। इन्हीं नगरपालिकाओं के पिछले चुनावों में तृणमूल के पास 93 सीटें थीं और वाममोर्चा के पास 36। जबकि कांग्रेस ने 16 जीती थीं। वाममोर्चा के हाथ से दो नगर पालिकाएं निकल गईं।

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तृणमूल कांग्रेस के भारी कामयाबी से राजनीतिक पंडितों को कोई हैरानी नहीं हुई है। इसकी वजह यह है कि वर्ष 2011 में सत्ता में आने के बाद से वह हर चुनाव में अपना दबदबा कायम रखती रही है, लेकिन वाममोर्चा की शिकस्त से साफ है कि उसने बीते छह साल में बार-बार मुंह की खाने के बावजूद कोई सबक नहीं सीखा है। इन नतीजों से साफ हो गया है कि वाममोर्चा आम लोगों पर जिस जमीनी पकड़ की वजह से 34 वर्षों तक सत्ता में रहा, वह पूरी तरह ढीली पड़ चुकी है। जहां तक कांग्रेस का सवाल है बंगाल में आखिरी बार वर्ष 1972 से 1977 के बीच सिद्धार्थ शंकर राय की अगुवाई में पार्टी की सरकार थी।अंदरूनी गुटबाजी और नेताओं के दलबदल ने उसके पांव उखाड़ते हुए उसे राजनीति के हाशिए पर धकेल दिया है। बीते साल विधानसभा चुनावों में उसने वाममोर्चा से हाथ मिलाया था, लेकिन यह फैसला दोनों के लिए आत्मघाती साबित हुआ।

भाजपा इन चुनावों में छह सीटें जीत कर भले विपक्ष की खाली कुर्सी की ओर बढ़ रही है, लेकिन उसके लिए मंजिल अभी दूर है। यह पार्टी राज्य में संगठन और ठोस नेतृत्व की कमी से जूझ रही है। उत्तर बंगाल में वाममोर्चा के कुछ वोट इसकी झोली में जरूर गिरे हैं, लेकिन एक मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरने के लिए पार्टी को अभी काफी लंबी दूरी तय करनी है। अब राज्य में अगले साल होने वाले पंचायत चुनावों में विपक्षी राजनीतिक दलों को खुद को जांचने-परखने का एक और मौका मिलेगा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वाममोर्चा के लिए उस चुनाव से पहले गंभीरता से आत्ममंथन करना जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो युवा तबके के वोटर उसे हमेशा के लिए हाशिए पर पहुंचा देंगे।

राजनीतिक पंडित भी हैरान

वाममोर्चा के चुनावी प्रदर्शन ने राजनीतिक पंडितों को भी हैरान कर दिया है। उनका सवाल है कि तीन दशक से भी ज्यादा समय तक यहां राज करने वाले कोई पार्टी शहरी निकाय चुनावों में इस कदर खराब प्रदर्शन कैसे कर सकती है? लेकिन इस सवाल का जवाब तो वामपंथी नेता भी तलाश रहे हैं। माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती का आरोप है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हो सके हैं। इसलिए माकपा जीत नहीं सकी। पार्टी के पिछले प्रदर्शन को ध्यान में रखते हुए उनकी यह दलील महज लाज बचाने की कोशिश ही लगती है। विधानसभा में पर्याप्त विधायक नहीं होने से वह एक भी सदस्य राज्यसभा में नहीं भेज सकी।

 

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