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जनसत्ता विशेष: अंगदान के प्रति बढ़ी जागरूकता

पश्चिम बंगाल में मौत के द्वार (चिकित्सकों द्वारा ब्रेन डेथ घोषित) तक पहुंचे मरीज के परिजनों में इनदिनों पीड़ित व्यक्ति के अंगदान को लेकर जागरूकता काफी बढ़ गई है। इस अच्छी सोच और पुनीत कार्य की बदौलत बीते कुछ महीनों के दौरान 18 से ज्यादा मरीजों का न केवल अंगदान करवाया गया, बल्कि 50 से ज्यादा मरीजों को जीवनदान दिया गया।

Author कोलकाता | January 9, 2019 4:56 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

शंकर जालान

पश्चिम बंगाल में मौत के द्वार (चिकित्सकों द्वारा ब्रेन डेथ घोषित) तक पहुंचे मरीज के परिजनों में इनदिनों पीड़ित व्यक्ति के अंगदान को लेकर जागरूकता काफी बढ़ गई है। इस अच्छी सोच और पुनीत कार्य की बदौलत बीते कुछ महीनों के दौरान 18 से ज्यादा मरीजों का न केवल अंगदान करवाया गया, बल्कि 50 से ज्यादा मरीजों को जीवनदान दिया गया। जानकार कहते हैं कि अंगदान के मामले में विश्वभर में स्पेन पहले पायदान पर है, तो देश यानी भारत में पहले स्थान पर पश्चिम बंगाल है। इसकी मुख्य वजह राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से चलाया जा रहा जागरूकता अभियान है। राज्य की मुख्यमंत्री (स्वास्थ्य विभाग का भी जिम्मा है) ममता बनर्जी के प्रयासों से पहले सूबे की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था दुरुस्त हुई और अब चार-छह महीनों के दौरान लोगों में अंग प्रत्यारोपण को लेकर उत्साह देखा जा रहा है। अंगदान के पीछे राज्य सरकार की सर्वे संतु निरामया की नीति है। अंगदाता, उसके परिजन, पुलिस-प्रशासन, चिकित्सक और अस्पताल के अधिकारी तो सफल अंग प्रत्यारोपण के लिए साधुवाद के पात्र हैं ही, राज्य सरकार की वह पहल भी सराहनीय है, जिसमें सरकारी अस्पतालों में नि:शुल्क अंग प्रत्यारोपण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। इससे भी अच्छी बात यह है कि अंगदान को और अधिक बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार अगले शिक्षा सत्र से आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में अंगदान से संबंधित विषय को शामिल करने जा रही है। इसके तहत अंगदान करने वालों के बारे में बताया और पढ़ाया जाएगा।

दक्षिण चौबीस परगना के पुजाली के 32 वर्षीय सैकत लाटू का हृदय फिलहाल बर्दवान जिले के रानीगंज के रखाल दास (38) में धड़क रहा है। इतना ही नहीं सैकत की किडनी पवन कुमार राय (32) और आजवान शेख (34) नामक रोगियों के शरीर में प्रतिस्थापित की गई थी। सैकत ने तीन लोगों को जीवनदान दिया। इस क्रम में ग्रीन कॉरिडोर बनाकर पुलिस और प्रशासन ने भी बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभाई। सैकत के पिता अमीर के मुताबिक पुत्र को ब्रेन डेथ घोषित करने के बाद जब चिकित्सकों ने उन्हें समझाया कि सकैत के कई अंग अभी भी काम कर रहे हैं और उसके जरिए किसी दूसरे को नई जिंदगी दी जा सकती है तो वे तुरंत अंगदान के लिए तैयार हो गए। सैकत की दोनों किडनी, लिवर, हृदय और दोनों आंखें दान देने संबंधित दस्तावेज पर उन्होंने बगैर देर किए हस्ताक्षर कर दिए। इसमें से लिवर की जांच के बाद पता चला कि वह 75 फीसद खराब हो चुका था, इसलिए किसी दूसरे के शरीर में प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकेगा। सैकत की दोनों आंखें शंकर नेत्रालय को दान दी गई। त्वचा को एसएसकेएम अस्पताल के स्किन बैंक में रखा गया है, जो छात्रों के अध्ययन के काम आएगी। हृदय को ग्रीन कॉरिडोर बनाकर एसएसकेएम अस्पताल से कलकत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचाया गया।

शहर के एक प्रसिद्ध अस्पताल के डॉ. बीपी शाह कहते हैं कि ग्लोबल आब्जर्वेटरी ऑन डोनेशन एंड ट्रांसप्लांट के मुताबिक विश्व में अंगदान व ऑर्गन ट्रांसप्लांट के मामले में स्पेन सबसे आगे है, लेकिन अब बंगाल भी पीछे नहीं है। डॉ. शाह के मुताबिक एक व्यक्ति आठ लोगों की जान बचा सकता है। किडनी, लिवर, हृदय, फेफड़े, आंत, कार्टिलेज, त्वचा, हड््िडयां, कार्निया को दान किया जा सकता है।
मालूम हो कि केंद्र सरकार ने फरवरी 1995 में मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम पास किया था, जिसके अधीन अंगदान और ब्रेन डेथ (मस्तिष्क मृत्यु) को कानूनी वैधता प्रदान की गई है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 23 साल में देश में प्रति 10 लाख लोगों पर अंगदान करने वालों की संख्या एक से भी कम रही, लेकिन बंगाल इस मामले में कुछ इतर है।

राज्य स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक संबंधित विभाग की ओर से चलाए जा रहे निरंतर जागरूकता अभियानों के कारण अंग प्रत्यारोपण में एक अभूतपूर्व उत्साह देखा गया है। बीते वर्ष जुलाई से दिसंबर तक 20 लोगों ने अंगदान किया, जिससे 50 लोगों को मौत के मुंह से निकाला जा सका। अधिकारियों को उम्मीद है कि भविष्य में राज्य में प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ जाएगी। जागरूकता अभियान तेज किया जा रहा है और एक ठोस रोडमैप बनाया जा रहा है। विभाग इस अभियान को और प्रभावी तरीके से चलाने के लिए गैर-सरकारी संगठनों के साथ भी समझौता करेगा। इसके अलावा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य प्रशासन को यह साफ निर्देश दिया है कि अंग प्रत्यारोपण को सफल करने के लिए जब भी जरूरत पड़े, ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाए। इतना ही नहीं, सरकारी अस्पतालों में सफलतापूर्वक अंग प्रत्यारोपण के लिए खर्च की परवाह किए बगैर मरीजों का इलाज और अन्य सुविधाएं सुनिश्चित करने का निर्देश भी मुख्यमंत्री समय-समय पर देती रहती हैं।

-सरकारी अस्पतालों में अंगदान और अंग प्रतिस्थापन का यह पहला मामला था, जो न केवल सफल रहा है, बल्कि इस काम में जुड़े लोगों का संबल भी बना। वे कहती हैं कि मरने के बाद भी दूसरों में जीवित रहने के पुण्य कर्म के तहत अंगदान के प्रति सूबे के लोगों का रुझान हाल के दिनों में काफी बढ़ा है। इसे बढ़ावा देने के लिए तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने भी ढांचागत सुविधाएं देना सुनिश्चित किया है।
-डॉ. शशि पांजा, राज्य सरकार में मंत्री

अस्पतालों में अभियान
राज्य के स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार की ओर से राज्यभर के अस्पतालों में ब्रेन डेथ की घोषणा करने में राष्ट्रीय अंग और प्रत्यारोपण कार्यक्रम के तहत पंजीकृत रीजनल ऑर्गन एंड टीशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन मदद करता है। इस बाबत सही समय पर ब्रेन डेथ की घोषणा के लिए आरओटीटीओ की ओर से विभिन्न प्रशिक्षण व कार्यशालाओं के जरिए चिकित्सकों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिसमें पश्चिम बंगाल के अलावा कई अन्य राज्य के चिकित्सक भी शामिल हैं।

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