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जनसत्ता विशेष: कोलकाता में 39 हजार से ज्यादा लोग फुटपाथ पर

बिन छत वालों को घर मुहैया कराने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें कहने को तो काफी कुछ काम करती हैं, कई योजनाएं बनाती हैं, हजारों-लाखों करोड़ खर्च भी करती हैं, लेकिन राजनीतिक दांवपेच के कारण वंचित लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता।

Author December 19, 2018 4:44 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

शंकर जालान

बिन छत वालों को घर मुहैया कराने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें कहने को तो काफी कुछ काम करती हैं, कई योजनाएं बनाती हैं, हजारों-लाखों करोड़ खर्च भी करती हैं, लेकिन राजनीतिक दांवपेच के कारण वंचित लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता। देश के अन्य शहरों की तरह ही सिटी आॅफ जॉय यानी कोलकाता में भी फुटपाथ व झोपड़ियों में रहने वाले हजारों लोग ऐसे हैं, जो राजनेताओं को कोसते हुए व्यंग्य के लहजे में सीधे-सीधे कहते हैं- रहने को घर नहीं, सारा जहां हमारा। मई 2011 में राज्य की सत्ता संभाले के बाद ही तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता को लंदन बनाने की बात कही थी और रंग-रोगन व प्रकाश के मामले में तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने काफी कुछ किया भी है, लेकिन आज भी हजारों लोग बेघर हैं और कभी किसी उड़ान-पुल के नीचे तो कभी किसी रेल पटरी के किनारे और कभी सुलभ शौचालयों में रहने को विवश हैं। इसे अफसोस ही कहा जाएगा कि जिस शहर को देश की सांस्कृतिक राजधानी का दर्जा प्राप्त है उस शहर के 20 हजार से ज्यादा लोग पूरी तरह बेघर हैं।

हाल ही में हुए एक सर्वे में पाया गया कि कोलकाता में लगभग 39,431 लोग फुटपाथ पर सोते हैं जो कि पूरे शहर की आबादी का लगभग 7.55 फीसद है। इनमें लगभग 55 फीसद यानी 21,759 लोग बिल्कुल खुले आसमान के नीचे और 45 फीसद यानी 17,672 लोग प्लास्टिक कवर या तम्बू गाड़कर सोते हैं। वहीं, कोलकाता नगर निगम के कुल 144 वार्ड में से 24 वार्डों की आबादी अधिक घनी है। इन 24 वार्डों में लगभग 26,825 लोग बेघर हैं और यह महानगर में कुल बेघर लोगों का 68.03 फीसद हिस्सा है। सर्वे के मुताबिक कोलकाता में 39,431 लोग बेघर और इससे सटे जिले हावड़ा 14,300, उत्तर चौबीस परगना में 15,600 व दक्षिण चौबीस परगना में 16,100 लोग बेघर हैं।

बेघर लोगों को अपना घर दिलवाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की गई। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस योजना का नाम बदल कर शहरी इलाकों के लिए निजोश्री परिकल्पो और ग्रामीण इलाकों के लिए बांग्लार बाड़ी आवास योजना कर दिया, लेकिन सच कहें तो इन योजनाओं का बहुत अधिक लाभ ऐसे लोगों को मिलता नहीं दिख रहा है, जिनका कोई घर या आशियाना न हो। कागज यानी फाइलों पर तो सैकड़ों घर बने और करोड़ों खर्च हुए, लेकिन हकीकत यही है कि आज भी हजारों लोग महानगर कोलकाता और आसपास के जिलों में बेघर हैं। वर्ष 2011 की जनसंख्या के मुताबिक कोलकाता में लगभग 70 हजार लोग बेघर थे, जबकि वर्ष 2001 में महानगर में बेघर लोगों की संख्या 55 हजार थी। फिलवक्त ऐसे लोगों की संख्या 39 हजार के करीब है। इस बाबत राज्य के आवास मंत्रालय का कहना है कि 2001 की तुलना में 2011 में बेघर लोगों की संख्या में इजाफा हुआ था, लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनने के बाद बेघर लोगों की संख्या में काफी गिरावट आई है। राज्य के आवास मंत्री अरुप विस्वास की मानें तो 2021 तक राज्य सरकार शहर के सभी बेघर लोगों को घर मुहैया करा देगी।

दूसरी ओर, जानकारों का कहना है कि बेघरों के लिए घर, एक ऐसा अफसाना है, जिसे अंजाम तक पहुंचाना किसी भी सरकार के लिए मुमकिन नहीं हुआ और यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक व्यक्ति की आय में पर्याप्त बढ़ोतरी नहीं होगी। यह शर्मनाक है कि 2011 के जनगणना के समय 17 लाख लोग देशभर में बेघर थे और 2018 में भी इसी संख्या से रू-ब-रू होना पड़ रहा है, ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि किसका विकास और कहां हुआ विकास?

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