ताज़ा खबर
 

पश्चिम बंगाल: गहरा रहा है पीने के पानी का संकट, आर्सेनिक से भी दिक्कत

गहरे ट्यूबवेलों के बढ़ते इस्तेमाल से आर्सेनिक की समस्या और गंभीर हो गई है। सरकार ने आर्सेनिक से निपटने की दिशा में कुछ उपाय जरूर किए हैं।

पश्चिम बंगाल व राजधानी कोलकाता में बीते एक-डेढ़ दशकों के दौरान पीने के पानी का संकट लगातार गंभीर हुआ है।

पश्चिम बंगाल व राजधानी कोलकाता में बीते एक-डेढ़ दशकों के दौरान पीने के पानी का संकट लगातार गंभीर हुआ है। देश के ग्रामीण इलाकों में हर उन पांच लोगों में से एक इसी राज्य में रहता है जिनको पीने का साफ पानी नहीं मिलता। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश के जिन 4.11 करोड़ लोगों को अब भी पीने का साफ नहीं मिलता उनमें से 78 लाख बंगाल में ही हैं। भूमिगत जलस्तर में तेजी से आने वाली गिरावट को ध्यान में रखते हुए अगले कुछ वर्षों में पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता को भी दिल्ली, चंडीगढ़ और बंगलूर की तर्ज पर पीने के पानी के भारी संकट से जूझना पड़ सकता है। बड़े पैमाने पर होने वाले शहरीकरण और भूमिगत जल के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से जलस्तर में तेजी से गिरावट आई है। इसके अलावा कंक्रीट के फुटपाथों ने हालत को और गंभीर बना दिया है।

आल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजिन एंड पब्लिक हेल्थ के पूर्व अधिकारी अरुणाभ मजुमदार कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों की 84 फीसद आबादी अब भी अपनी जरूरतों के लिए भूमिगत पानी पर निर्भर है। लेकिन राज्य के 83 ब्लाकों में जहां भूमिगत पानी में आर्सेनिक है, वहीं 43 ब्लाकों में फ्लोराइड की मात्रा तय सीमा से ज्यादा है। इसके अलावा कई ब्लाकों में भूमिगत पानी में खारापन और आयरन की समस्या है। ग्रामीण ही नहीं बल्कि राज्य के शहरी इलाकों में भी महज 56 फीसद परिवारों को ही पीने का साफ मिलता है जो राष्ट्रीय औसत 70.6 फीसद से काफी कम है। कोलकाता नगर निगम का दावा है कि महानगर में पीने के पानी की सप्लाई का 15 फीसद भूमिगत पानी से आता है। लेकिन हकीकत में यह आंकड़ा 25 से 30 फीसद तक है।

कुछ तथ्य

  • भूमिगत पानी में आर्सेनिक की मौजूदगी के मामले में बंगाल पूरे देश में शीर्ष पर है। राजधानी कोलकाता के कुछ इलाकों में भी भूमिगत जल आर्सेनिक-मुक्त नहीं है।
  • राज्य के पूर्वी व पश्चिमी बर्दवान, मालदा, हुगली, नदिया, हावड़ा, मुर्शिदाबाद, उत्तर व दक्षिण 24-परगना जिलों के 83 ब्लाकों में पानी में आर्सेनिक की मौजूदगी खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है।
  • बीते साल लोकसभा में पेश एक रिपोर्ट में भी बंगाल में इस समस्या की गंभीरता का जिक्र किया गया था।

आर्सेनिक प्रभावित

  • 1.04 करोड़ बताई गई थी बीते साल मार्च तक राज्य में आर्सेनिक से पीड़ित लोगों की तादाद
  • 16.88 लाख पीड़ितों के साथ बिहार दूसरे और 14.48 लाख की प्रभावित आबादी के साथ असम तीसरे स्थान पर है इस मामले में
  • 1.48 करोड़ है पूरे देश में आर्सेनिक पीड़ित लोगों की तादाद। 55 फीसद हिस्से में आर्सेनिक का स्तर महानगर के भूमिगत जल में विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से तय मानकों के मुकाबले ज्यादा है जादवपुर विश्वविद्यालय के स्कूल आफ एनवायरनमेंटल स्टडीज के मुताबिक।

गहरे ट्यूबवेलों के बढ़ते इस्तेमाल से आर्सेनिक की समस्या और गंभीर हो गई है। सरकार ने आर्सेनिक से निपटने की दिशा में कुछ उपाय जरूर किए हैं। आर्सेनिक से प्रभावित इलाकों में छह लाख लोगों को पीने का साफ पानी मुहैया करा रही है। इसके अलावा कोलकाता के पूर्वी छोर पर एक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट भी स्थापित किया जा रहा है। आर्सेनिक से प्रभावित इलाकों में से 52 फीसद में पीने का साफ पानी मुहैया कराया जा रहा है।

-सुब्रत मुखर्जी, ग्रामीण विकास मंत्री, पश्चिम बंगाल

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App