असम में नतीजों से पहले बढ़ रही सरगर्मी

असम में विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस- दोनों ही दलों की अगुआई वाले गठबंधनों में मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरखाने खींचतान तेज दिख रही है।

Assamसांकेतिक फोटो।

असम में विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस- दोनों ही दलों की अगुआई वाले गठबंधनों में मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरखाने खींचतान तेज दिख रही है। दोनों सियासी खेमे बहुमत न होने की स्थिति (त्रिशंकु की संभावना) को लेकर भी अग्रिम तैयारियों में जुटे दिख रहे हैं। अपने खेमे से कोई न टूट जाए और दूसरे खेमे से तोड़ लिया जाए- इस बात की कवायद दोनों सियासी गठबंधनों में दिख रही है।

ऐसे में कुछ दोनों खेमों में गुणा-भाग शुरू हो गया है और चुनाव खत्म होने के बाद राजनीतिक भागदौड़ पर विराम लगने की जगह सरगर्मी बढ़ रही है। चुनाव के बाद नतीजे से पहले एक-दूसरे के खेमे में सेंध लगाने की असाधारण राजनीति शुरू हो गई। नतीजों के बाद जोड़-तोड़ की तो कई सियासी मिसाल रही है, लेकिन संभवत: यह पहला मौका होगा जब इस तरह की राजनीति हो रही है। असम में 126 सीटों वाली विधानसभा के लिए दो चरणों में मतदान कराए गए थे। आखिरी चरण का मतदान छह अप्रैल को हुआ था। मतों की गिनती दो मई को होगी।

चुनाव के तुरंत बाद सियासी सरगर्मी उस वक्त बढ़ी, जब कांग्रेस-एआइयूडीएफ के कुछ नेताओं के भाजपा के संपर्क में रहने के दावे सामने आए। इसके बाद गठबंधन ने अपने दो दर्जन उम्मीदवारों को राजस्थान के जयपुर के होटल में भेज दिया। हालांकि, कांग्रेस-एआइयूडीएफ के नेताओं ने दावा किया कि उम्मीदवार महीनों के चुनावी प्रचार के बाद बहुत थके थे, इसीलिए उन्हें बस छुट्टी के लिए भेजा गया है और टूट की कोई बात नहीं है।

लेकिन, गठबंधन के नेताओं के अनुसार भाजपा ने कम-से-कम छह उम्मीदवारों को अपने पाले में करने की कोशिश की थी। इसी दौरान पलटवार करते हुए एआइयूडीएफ के नेताओं ने भी दावा किया कि भाजपा के पांच-छह उम्मीदवारों ने उनसे संपर्क कर महागठबंधन का समर्थन करने की बात कही है। भाजपा नेताओं ने इस दावे को पूरी तरह गलत बताया। हालांकि, चुनाव के बीच ही सियासी जोड़-तोड़ की झलक देखने को मिल गई थी। दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले बोडो पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) के उम्मीदवार रंगजा खुंगूर बासुमतरी ने भाजपा के समर्थन में चुनाव मैदान नाम वापस ले लिया और भाजपा का दामन थाम लिया था।सियासी सरगर्मी बढ़ने की वजह सिर्फ अपने-अपने गठबंधनों की एकजुटता बनाए रखने तक ही सीमित नहीं है।

भाजपा नीत राजग और कांग्रेस नीत संप्रग- दोनों ही गठबंधनों के भीतर नेतृत्व को लेकर संकट पहले से है। प्रदेश में भाजपा के सर्वानंद सोनोवाल पांच साल मुख्यमंत्री बने रहे, लेकिन चुनाव के बीच संकेत दिया गया कि वे जीतने के बाद भी मुख्यमंत्री बनेंगे, यह जरूरी नहीं है। इसके पीछे हिमंत बिस्वा सरमा को मनाने की कोशिश थी। दरअसल, हिमंत ने चुनाव घोषित होने से पहले जनवरी में कहा था कि वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और संगठन को मजबूत करने के लिए काम करेंगे। इसे हिमंत का सीएम की रेस से बाहर होने का संकेत समझा गया।

इसके बाद भाजपा आलाकमान के कहने पर वह चुनाव में उतरे। लेकिन मुख्यमंत्री पद का सवाल बना रहा। शीर्ष नेतृत्व ने कह दिया कि चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा जाएगा और मुख्यमंत्री कौन बनेगा, इसका फैसला बाद में होगा।
इसके बाद से कई तरह की अटकलें लगने लगीं। कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर भाजपा को घेरा। उसने कहा कि भाजपा ने खराब प्रदर्शन के चलते चुनाव से पहले ही सोनोवाल को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतार दिया। उधर, सोनोवाल ने एक बयान देकर मुख्यमंत्री के सवाल को और उलझा दिया।

उन्होंने कहा कि संगठन जो भी जिम्मेदारी देगा, उसे निभाने के लिए वह तैयार हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि अगर भाजपा गठबंधन को अपने दम पर बड़ी जीत मिलती है तो सोनोवाल का स्वाभाविक दावा और मजबूत होगा। अगर त्रिशंकु विधानसभा या नजदीकी जीत-सी स्थिति बनती है तो हिमंत का भाग्य खुल सकता है। इसी तरह की दुविधा कांग्रेस गठबंधन में भी हैं। गठबंधन ने मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया। गठबंधन में 10 दल शामिल हैं। एआइयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल की मुख्यमंत्री का नाम तय करने में चलेगी।

आगे के समीकरण तय करने में छोटे दलों की बड़ी भूमिका रहने वाली है। बीपीएफ चुनाव से ठीक पहले एनडीए से अलग हुई थी। कहा गया कि सोनोवाल के अभी भी इनके नेताओं से बेहतर संबंध है और जरूरत पड़ने पर उनकी ओर जा सकते हैं। इसी तरह कांग्रेस और एआइयूडीएफ भी पहली बार मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा के असम गण परिषद जैसे दलों के साथ गठबंधन होने के बावजूद हाल में संबंध बहुत बेहतर नहीं रहे। ऐसे में माना जा रहा है कि चुनाव परिणाम के बाद छोटे-छोटे दलों की सरकार गठन में बड़ी भूमिका होगी।

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