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खेला चोलछे

भाजपा जिस राष्ट्रवाद के भरोसे उत्तर भारत में चुनावी रैलियों में तालियां बटोर रही थीं वो बंगाल में नहीं काम आया। बंगाल का राष्ट्रवाद कोई चुनावी या मौसमी स्वांग भर नहीं है। बंगाल का राष्ट्रवाद रवींद्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद है। यह साहित्य, संगीत और संस्कृति का भी राष्ट्रवाद है।

Mamta Banerjeeममता बनर्जी, मुख्‍यमंत्री बंगाल। फाइल फोटो।

बंगाल के चुनावी संदेश पर जब सब अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे उसी समय सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होता है। एक लड़की सड़क पर जा रही होती है तभी मोटरसाइकिल पर पीछे से दो लड़के आते हैं और उसका पर्स छीनने की कोशिश करते हैं। लड़की अपना पर्स दूर फेंक देती है और लड़के उसे उठाने दौड़ते हैं। तभी लड़की लपक कर उनकी मोटरसाइकिल पर बैठ जाती है और उसे लेकर भाग खड़ी होती है।

दोनों लड़के अपनी मोटरसाइकिल के लुट जाने के बाद लड़की के खाली पर्स से अपना सिर धुनते हैं। तभी लड़की तेजी से मोटरसाइकिल चलाते हुए आती है और लड़कों से अपना पर्स भी छीन कर ले जाती है। अब लड़कों के पास न तो लड़की का पर्स है और न अपनी मोटरसाइकिल। बंगाल चुनाव में उम्मीदों के विपरीत जिस तरह से ममता बनर्जी को जनता का भरपूर समर्थन मिला है उसकी वजहों को हम इस वीडियो से समझ सकते हैं।

जिन राज्यों में चुनाव हुए उनमें बंगाल और तमिलनाडु की हालत एक जैसी थी। दोनों जगहों पर दस सालों से यथास्थिति के खिलाफ माहौल था और विपक्ष का पहला मुद्दा परिवर्तन ही था। तमिलनाडु में यह हुआ भी। फिर बंगाल में ममता के खिलाफ बना माहौल कैसे पलट गया? बिहार चुनाव के बाद पूरी केंद्रीय शक्ति बंगाल में जुट गई थी। भाजपा के जो केंद्रीय नेता बिहार नहीं गए थे उन्होंने चुनाव तक बंगाल को दूसरा घर ही बना लिया था। तब तक लोगों में ममता के खिलाफ एक लहर थी भी। ममता की अगुआई में वाम को प्रणाम करने के बाद भी रोजगार और विकास का संकट ज्यों का त्यों था। उस वक्त की जमीनी हकीकत देख भाजपा, कांग्रेस और वाम तीनों ने ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला। हालत यह हो गई कि भाजपा ने खुद से ज्यादा ममता को जगह दे दी और उसके बाद माहौल बदलने लगा।

अगर यह चुनाव त्रिकोणीय होता तो भाजपा को ज्यादा फायदा होता। लेकिन पूरा विपक्ष एक तरफ तो ममता एक तरफ अकेली। अगर आप व्यक्ति केंद्रित आलोचना करते हैं तो फिर आपका वार कमर के नीचे होने लगता है जिसे युद्ध में नाजायज माना जाता है। इसी वार के बाद बंगाल अपने उस चेहरे को लेकर सजग होने लगा और अब ममता बनर्जी की छवि एक पीड़ित की हो गई थी, एक स्त्री नेता की हो गई थी, उस अभिमन्यु की तरह हो गई थी जिसकी सारे दुश्मन चक्रव्यूह बना कर हत्या करने आए हैं। जो तृणमूल से छिटक कर भाजपा और अन्य दलों के साथ चले गए थे वे भी अपनी ‘मां, माटी और मानुष’ वाली नेता की तरफ वापसी करने लगे थे। कांग्रेस और भाजपा में गए कई लोग खास कर अल्पसंख्यक अपनी दीदी के पास लौट आए। इस बेचारगी की लहर का ही असर था कि ममता ने पहले जितना तो बरकरार रखा ही उससे भी ज्यादा पाया।

भाजपा जिस राष्ट्रवाद के भरोसे उत्तर भारत में चुनावी रैलियों में तालियां बटोर रही थीं वो बंगाल में नहीं काम आया। बंगाल का राष्ट्रवाद कोई चुनावी या मौसमी स्वांग भर नहीं है। बंगाल का राष्ट्रवाद रवींद्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद है। यह साहित्य, संगीत और संस्कृति का भी राष्ट्रवाद है। हिंदी पट्टी अपने चुनावी मुद्दे में साहित्य और संस्कृति को लेकर संवेदनशील नहीं है। लेकिन बंगाल को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसकी संस्कृति पर हमला हो। ‘दीदी ओ दीदी’ जब राजनीतिक जुमला बन गया तो पूरा बंगाली बौद्धिक समुदाय अपनी क्षेत्रीय नेता की गरिमा को लेकर संवेदनशील हो गया और एकजुट हो गया। ‘ममता बेगम’, या ‘खेला होबे’ पर उन्हें बरमूडा (हाफ पैंट) पहनने का मर्दाना ताना सुन बंगाली अस्मिता एक फुटबॉल टीम की तरह एकजुट हुई और सोचा कि अपने खिलाफ गोल नहीं करना है।

भारत जैसे मर्दवादी माहौल वाले देश में एक स्त्री नेता के इतना मजबूत होकर उभरने के अपने सकारात्मक संदेश हैं। ममता बनर्जी फिलहाल वो निर्णायिका बनी हैं जिन्होंने क्षेत्रीय क्षत्रपों को ढहाने के तूफान को थामा है। लेकिन यह भी सच है कि जनादेश के बाद भी बंगाल का खेल खत्म नहीं हुआ है। अभी तो वहां एकांकी भर खत्म हुई है। आगे के अध्याय में ममता बनर्जी का खेल अभी बहुत मुश्किल होने वाला है। उनके लिए सबसे आकस्मिक चुनौती तो कोरोना का विस्फोट ही है। स्वास्थ्य के मामले में बंगाल भी दूसरे राज्यों की तरह बदहाल है। चुनावी रैलियों के कारण वहां कोरोना ने जो विकराल रूप धरा उसे ममता बनर्जी कैसे थामती हैं ये देखना होगा।

इसके साथ ही बड़ी चिंता बंगाल में चुनाव के बाद शुरू हुआ हिंसा का तांडव है। बंगाल सरकार से हिंसा के बाबत सवाल पूछती केंद्रीय गृह मंत्रालय की चिट्ठी बंगाल पहुंच चुकी है। इसके साथ ही ममता बनर्जी को यह याद रखना ही है कि वे नंदीग्राम में चुनाव हार चुकी हैं और छह महीने के अंदर उन्हें विधानसभा की सदस्यता लेनी है, बंगाल में विधान परिषद न होने से यह समस्या उनके लिए बढ़ गई है। वहीं, मद्रास हाई कोर्ट की तीखी आलोचना और हत्या का मुकदमा दर्ज करने जैसे तल्ख आरोप के बाद चुनाव आयोग ने बंगाल की दो विधानसभा सीटों जंगीपुर और शमशेरगंज में उप चुनाव कराने से हाथ खड़े कर दिए हैं जो वहां के उम्मीदवारों के निधन के बाद खाली हुई है।

यहां 16 मई को मतदान होना था। पहले जो चुनाव आयोग बंगाल में आठ चरणों के चुनाव को सही ठहरा रहा था अब कोरोना विस्फोट का उदाहरण देकर उपचुनाव से परहेज कर रहा है। एक तरफ तो मध्यप्रदेश के गृहमंत्री अब भी चुनाव को कोरोना से न जोड़ने की सलाह देते हुए महाराष्ट्र और पंजाब का हवाला दे रहे हैं कि वहां कौन सा चुनाव था। दूसरी तरफ अब चुनाव आयोग उपचुनाव से इनकार कर रहा है।

इतनी सारी चुनौतियों के बीच ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी कुर्सी बचाने की। बंगाल में भाजपा पहले से ज्यादा ताकतवर हो चुकी है और ममता बनर्जी के लिए सत्ता का ‘खेला’ और मुश्किल होने वाला है। चुनावों के बाद बंगाल में कई मोर्चों पर खेल अभी शेष है जिससे ममता बनर्जी को जूझना है।

भाजपा जिस राष्ट्रवाद के भरोसे उत्तर भारत में चुनावी रैलियों में तालियां बटोर रही थीं वो बंगाल में नहीं काम आया। बंगाल का राष्ट्रवाद कोई चुनावी या मौसमी स्वांग भर नहीं है। बंगाल का राष्ट्रवाद रवींद्रनाथ टैगोर का राष्ट्रवाद है। यह साहित्य, संगीत और संस्कृति का भी राष्ट्रवाद है। हिंदी पट्टी अपने चुनावी मुद्दे में साहित्य और संस्कृति को लेकर संवेदनशील नहीं है। लेकिन बंगाल को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उसकी संस्कृति पर हमला हो।

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