देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार अपने सहयोगियों से बड़े ही दुखी मन से कहा था कि उनके लिए यह बड़ा ही पीड़ादायक है कि जिस भाजपा ने देश के अलग-अलग हिस्सों में इतनी प्रगति की है, वह पश्चिम बंगाल में शायद ही कोई खास बढ़त बना पाई है।

अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में इतना मार्मिक भाव इसलिए था क्योंकि भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पश्चिम बंगाल गृह राज्य था, जनसंघ ही आगे चलकर भाजपा का रूप ले लिया। साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जनसंघ के शुरुआती वर्षों में डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सहायक के तौर पर काम करते हुए ही की थी।

भाजपा के प्रदर्शन में होगा सुधार

अब जब चुनाव प्रचार थम चुका है और बुधवार को पश्चिम बंगाल में दूसरे और अंतिम चरण का मतदान हो रहा है, तो ऐसा लगता है कि भाजपा बंगाल में एक बड़ी सफलता के चौखट पर खड़ी है। चाहे इस बार वह सत्ता में आए न आए, लेकिन उसके सहयोगियों और विरोधियों, दोनों को ही यह उम्मीद है कि वह 2021 के अपने प्रदर्शन में सुधार करेगा। 2021 में भाजपा ने 284 में से 77 सीटें जीती थीं, जो 2016 की 3 सीटों से काफी अधिक थीं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 2026, 2006 की पुनरावृत्ति होगा या फिर 2011 की? इस सवाल पर चर्चा कोलकाता की पॉश पार्क स्ट्रीट पर स्थित मशहूर कैफे फ्लूरीज में भी उतनी ही हो रही है थी, जो 1927 से वहां मौजूद है।

साल 2006 की बात करें तो उस दौरान ममता बनर्जी को लगा कि उनके पास लेफ्ट फ्रंट को हराने का मौका है, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्जी ने लेफ्ट फ्रंट की उसकी अब तक की सबसे बेहतरीन जीत दिलाई और उनकी सीटों की संख्या बढ़कर 235 हो गई। हालांकि, सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण के विरोध में चले आंदोलनों के बाद जल्द हालात बदल गए। इससे ममता को वह मौका मिल गया जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार था और पांच साल बाद लेफ्ट सत्ता से बाहर हो गया।

टीएमसी अब उतनी मजबूत नहीं दिखी

भाजपा ने खुद को उस मुकाम पर पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत की है जिसका सपना अटल बिहारी ने देखा था, इसके लिए उन्होंने बड़ी लगन से एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा तैयार किया है, जिसमें पांच सदस्यों वाले मंडल शक्ति केंद्र बूथ-स्तर पर लोगों को लामबंद करने में मदद करते हैं। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि संगठनात्मक रूप से यह अभी भी टीएमसी जितनी मजबूत नहीं है।

सभी वर्गों के लोगों ने राज्य में रोजगार की स्थिति को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है और इससे पार्टी को फायदा होना चाहिए। एक महिला ने लक्ष्मी भंडार योजना का जिक्र करते हुए कहा, “हर महीने 1500 रुपये का क्या फायदा? मेरी बेटी को ऐसी नौकरी चाहिए जिससे उसे कम से कम 20000 रुपये मिलें ताकि वह अपना गुजारा कर सके।” हालांकि गांवों और झुग्गी-बस्तियों दोनों ही जगहों पर बड़ी संख्या में महिलाओं ने इस योजना के गुणगान किए हैं।

भाजपा ने टीएमसी सिस्टम में लगाई सेंध

भाजपा के बड़े नेता सिर्फ नौकरियों को लेकर अंसतोष और राज्य में उद्योग और निवेश लाने में नाकामी पर ही भरोसा नहीं कर रहे हैं। उन्हें पार्टी से जुड़े युवाओं के अनौपचारिक टीएमसी सिस्टम के खिलाफ भी नाराजगी महसूस हो रहा है। ये युवा क्लबों या कारोबारी ग्रुपों की तरह काम करते हैं, अगर आप अपने घर की मरम्मत करवाना चाहते हैं तो ये ठेका लेने की जिद करते हैं या बैंक से लोन दिलाने में दखल देते हैं या फिर लोगों को वोट डालने से रोकते हैं। यह सिस्टम वामपंथी शासन के दौरान भी काम करता था और जब टीएमसी सत्ता में आई तो यह उसके साथ जुड़ गया। अब माना जा रहा कि भाजपा ने इस सिस्टम में सेंध लगा दी है और जानकारों का मानना है कि आज टीएमसी के सभी कार्यकर्ता पार्टी के लिए काम नहीं कर रहे हैं।

तुष्टीकरण करने वाली नेता बनीं ममता?

भाजपा ने ममता को मुसलमानों का तुष्टीकरण करने वाली नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश की है, ताकि हिंदुओं का अपने पक्ष में एकजुट किया जा सके। साथ ही घुसपैठियों के खिलाफ भाजपा की आवाज ने राज्य के कुछ हिस्सों में हिंदुओं को अपनी ओर आकर्षित किया है।

इधर कई लोगों का मानना है कि कुछ बंगालियों में मुसलमानों के प्रति एक दबी हुई नफरत भी मौजूद है, इनमें ऊंची क्लास और ऊंची जाति के भद्रलोक भी शामिल हैं। इसकी वजह बंटवारे जैसे ऐतिहासिक कारण हैं।लेकिन अब तक इसे जाहिर करना राजनीतिक रूप से सही नहीं था। जैसा कि एक राजनीतिक जानकार ने कहा, अब यह ढांचा टूट रहा है। दक्षिण 24 परगना जिले में मुस्लिम महिलाओं ने माना कि “पहले तो हिंदू-मुस्लिम वाली कोई भावना नहीं थी, लेकिन अब यह जोर पकड़ रही है।”

हालांकि अभी तक इसने वह स्तर हासिल नहीं किया है जिसकी उम्मीद थी और न ही इसने उस तरह के मुखर हिंदुत्व का रूप लिया है जैसा कि हिंदी राज्यों में पहचान के तौर पर देखा जाता है। पश्चिम बंगाल में हिंदू धर्म अधिक समन्वयवादी है और यह कई धाराओं से प्रभावित है जैसे कि शक्ति परंपरा, मां काली की पूजा और स्वामी विवेकानंद व रामकृष्ण परमहंस जैसी हस्तियों के विचार।

भाजपा ने किए सुधार

एक ओर ममता ने अपनी लड़ाई को बंगाली पहचान की रक्षा की जंग के तौर पर पेश किया। वहीं बंगाल की यह लड़ाई कुछ मायनों में हिंदू राष्ट्रवाद और बंगाली राष्ट्रवाद के बीच एक मुकाबला भी बन गई है।

अपनी गलतियों से सीखते हुए इस बार भाजपा ने बड़ी जनसभाओं में हिंदी बोलने वाले वक्ताओं का उतारने से अधिकतर परहेज किया, सिवाय अमित शाह, नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के। भूपेंद्र यादव, जिन्हें चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, पूरे समय नजर नहीं आए, वे न तो पोस्टर में दिखे और न ही इंटरव्यू में और न ही सोशल मीडिया पोस्ट में। वे पिछले साल सितंबर से ही पर्दे के पीछे रहकर काम कर रहे हैं।

हालांकि भाजपा की सबसे बड़ी कमी यही है कि उसके पास चुनाव प्रचार की अगुवाई करने और राज्य की आकांक्षाओं से खुद को जोड़ने वाला कोई बंगाली चेहरा नहीं है। लोगों ने इस चुनावी मुकाबले को दीदी बनाम मोदी बताया।

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पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण की वोटिंग शुरू होने वाली है। अब चुनाव की लड़ाई उत्तर के सीमावर्ती इलाकों से हटकर दक्षिण के ज्यादा आबादी वाले शहर और औद्योगिक क्षेत्रों में पहुंच गई है। भले ही मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच माना जा रहा है, लेकिन एक और अहम चीज नतीजों पर असर डाल सकती है। वह है वाम दलों और कांग्रेस के गठबंधन के बचे हुए वोट, जिन्हें 2021 के बाद अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें