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तेजाब हमलों के मामले थम नहीं रहे, न्याय मिलने में भी हो रही देरी

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों (वर्ष 2016 तक) के मुताबिक, पश्चिम बंगाल इस मामले में पहले स्थान पर है। लेकिन एक महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद यहां ऐसे हमलों की शिकार महिलाओं को न्याय और मुआवजा मिलने की दर काफी धीमी है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार भले देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले अपराध की दर कम होने का दावा करे, कम से कम एक मामले में यह राज्य अव्वल है। वह है महिलाओं पर तेजाब से हमलों की बढ़ती घटनाएं। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों (वर्ष 2016 तक) के मुताबिक, पश्चिम बंगाल इस मामले में पहले स्थान पर है। लेकिन एक महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद यहां ऐसे हमलों की शिकार महिलाओं को न्याय और मुआवजा मिलने की दर काफी धीमी है।
एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों में कहा गया है कि वर्ष 2016 में पूरे देश में तेजाब से हमलों की 283 घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से लगभग 27 फीसदी यानी 76 मामले अकेले बंगाल में हुए। बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश का स्थान है जहां 57 मामले दर्ज हुए। वर्ष 2014 में देश में ऐसे 203 मामले दर्ज हुए थे जबकि वर्ष 2015 में ऐसे 222 मामले सामने आए थे। लेकिन 2016 में ऐसे मामलों की तादाद बढ़ कर 283 तक पहुंच गईं। वर्ष 2016 में इन हमलों के सिलसिले में कुल 233 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

एसिड सर्वाइवर्स एंड वूमेन वेलफेयर फाउंडेशन (एएसडब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के संयोजक दिब्यलोक रायचौधरी कहते हैं कि कुछ वर्षों के दौरान देश में तेजाब से हमलों के मामले में अभियुक्तों को सजा की दर जहां 40 फीसदी रही है वहीं पश्चिम बंगाल में यह महज 14 फीसद है। उनका कहना है कि हमले के बाद पीड़ित महीनों तक सदमे और अस्पताल में रहते हैं। इससे नतीजतन इस दौरान अपराधी या तो फरार हो जाता है या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठा कर बचाव की जमीन तैयार कर लेता है।

पीड़ितों के पुनर्वास व मुआवजे की प्रक्रिया तेज करने की खातिर विभिन्न राज्यों के पुलिस प्रमुखों पर दबाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने हाल में तेजाब से हमलों का एक राष्ट्रीय डिजिटल डाटा बेस तैयार किया है। वर्ष 2013 में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम पारित होने के बाद भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) में धारा 326 ए और 326 बी जोड़ने के बाद ऐसे हमलों में अभियुक्तों को अब 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। इससे पहले ऐसे मामलों में अधिकतम तीन साल की ही सजा का प्रावधान था।

तेजाब से हमलों के बाद पीड़ित या पीड़िता के सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाज का खर्च जुटाने की होती है। उनका इलाज या पुनर्वास लंबा चल सकता है। लेकिन बंगाल सरकार का रेकॉर्ड इस मामले में अच्छा नहीं है। एसोसिएशन फार प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) की ओर से से सूचना के अधिकार के तहत जुटाई गई जानकारी से पता चला है कि सरकार ने 46 मामलों में से महज 18 में ही मुआवजा दिया है। एपीडीआर के बापी दासगुप्त तेजाब से हमले के पीड़ित लोगों की ओर से बरसों से मामले लड़ते रहे हैं। वे सूचना के अधिकार के जरिए मुआवजे की जानकारी लेने के अलावा एसिड की बिक्री से संबंधित नियमों को कड़ाई से लागू करने की भी मुहिम चला रहे हैं।

बापी बताते हैं कि इन हमलों में मुख्यत: नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल होता है जो सुनारों की दुकानों पर आसानी से उपलब्ध है। इसका इस्तेमाल सोने को साफ करने के लिए किया जाता है। कलकत्ता हाईकोर्ट में एसिड हमलों के पीड़ितों के मामले लड़ने वाले वरिष्ठ एडवोकेट जंयत नारायण चटर्जी कहते हैं कि ऐसे हमलों की जांच की प्रगति से मुआवजे का कोई संबंध नहीं होना चाहिए। अभियुक्त की गिरफ्तारी हो या नहीं, मुआवजा पहले मिलना चाहिए। वैसे, राज्य सरकार का दावा है कि बीते दो वर्षों के दौरान राज्य में ऐसी घटनाओं में कमी आई है। अधिकारियों का मानना है कि एडिस हमलों को रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए ऐसी हर घटना की सूचना पुलिस को देनी होगी।

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