पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची से हटाए गए 27 लाख लोगों की अपील पर सुनवाई के लिए बनाए गए 19 न्यायाधिकरण जल्द काम शुरू करेंगे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस मामले में 7 लाख से ज्यादा अपीलें दायर हो चुकी हैं। बंगाल के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भारी संख्या में मत हटाए गए हैं। इस सबके बीच जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं वो सभी परेशान हैं।

बंगाल में नादिया, हुगली और उत्तर 24 परगना जिलों में मतुआ और मुस्लिम समुदायों की आबादी अधिक है। यहां तार्किक विसंगतियों के कारण विचाराधीन 70% से अधिक नाम मतदाता सूची से बाहर हैं। नादिया और उत्तर 24 परगना उन जिलों में भी शामिल हैं जहां एसआईआर के बाद सबसे अधिक नाम हटाए गए हैं।

चुपीपोटा गांव के बूथ नंबर 11 में मतदान के लिए सूचीबद्ध सभी 152 नाम SIR के बाद अपात्र पाए गए

नादिया जिले में 17 विधानसभा क्षेत्र हैं। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने इनमें से 9 सीटें जीती थीं जबकि 8 सीटें तृणमूल कांग्रेस को मिली थीं। हालांकि, इसके बाद उपचुनावों में टीएमसी ने राणाघाट दक्षिण और कालीगंज की दो सीटें अपने नाम कर लीं। 2021 में सभी विधानसभा क्षेत्रों में जीत का न्यूनतम अंतर लगभग 7,000 वोटों का था।

नादिया जिले के चुपीपोटा गांव के बूथ नंबर 11 में मतदान के लिए सूचीबद्ध सभी 152 नाम चुनाव आयोग के एसआईआर के बाद अपात्र पाए गए। बूथ नंबर 12 में मतदान के लिए सूचीबद्ध 120 लोगों में से केवल 2 (शैफुल इस्लाम और अबुल कलाम शेख) के नाम मतदाता सूची में पाए गए।

उत्तर 24 परगना में 33 विधानसभा क्षेत्र हैं, वहां टीएमसी ने 2021 के चुनाव में 29 सीटें जीतीं थीं

उत्तर 24 परगना में 33 विधानसभा क्षेत्र हैं, वहां टीएमसी ने 2021 के चुनाव में 29 सीटें जीतीं थीं जबकि भाजपा ने 4 सीटें – गाइघाटा, भाटपारा, बांगांव उत्तर और बांगांव दक्षिण जीतीं थीं। वहीं, हुगली जिले में 18 विधानसभा क्षेत्र हैं जिनमें से टीएमसी ने 2021 में 14 सीटें जीतीं जबकि भाजपा को केवल 4 सीटें मिलीं। भाजपा ने अपनी चार सीटों में से तीन सीटें बहुत कम अंतर से जीतीं जिनमें जिले की सबसे कम अंतर वाली सीट (गोघाट, 4000 से अधिक वोटों से) भी शामिल है। सबसे अधिक अंतर से जीत चंडीतला में दर्ज की गई जहां टीएमसी ने 41,000 से अधिक वोटों से जीत हासिल की।

मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों में आक्रोश

मतदाता सूची से बाहर किए जाने और अब तक न्यायाधिकरणों द्वारा कोई समाधान न दिए जाने को लेकर लोगों में आक्रोश साफ दिखाई दे रहा है। 40 वर्षीय शकीला बीबी का नाम उनके पिता के नाम की वर्तनी में त्रुटि के कारण मतदाता सूची से हटा दिया गया है । 2002 के एसआईआर में उनका नाम डोलेहर शेख दर्ज था जिसे बाद में बदलकर शेख डॉलर कर दिया गया। उनका कहना है कि अगर उन्हें वोट देना होता तो वे न तो भाजपा और न ही तृणमूल कांग्रेस को चुनतीं। शकीला ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “मैंने 2006 से 2024 तक वोट दिया अब मैं नागरिक क्यों नहीं हूं? मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि वह हमारे साथ खड़ी हैं लेकिन जब नाम हटाए जा रहे थे तब वह कहां थीं? अब हमें एहसास हो रहा है कि हम सिर्फ एक वोट बैंक हैं।”

माता-पिता के 6 या अधिक बच्चे पहले से ही मतदाता सूची में दर्ज

मुस्लिम निवासियों के मतदाता सूची में नाम दर्ज न होने का सबसे आम कारण यह है कि उनके माता-पिता के 6 या अधिक बच्चे पहले से ही मतदाता सूची में दर्ज हैं। मतुआ समुदाय के मामले में, इसका मुख्य कारण माता-पिता के नाम या पिछले मतदाता सूची में नाम का मेल न होना है। 36 वर्षीय पियारु शेख का नाम हटा दिया गया है क्योंकि छह अन्य लोगों ने हुसैन शेख को अपना पिता बताया है। पियारु का कहना है कि उनके केवल तीन भाई-बहन हैं। उन्होंने कहा, “हमने पारिवारिक वंशावली जमा की थी लेकिन उन्होंने उस पर विचार नहीं किया। वहीं दूसरी ओर मेरे सबसे छोटे भाई संजय का नाम वर्तनी की गलतियों के बावजूद शामिल कर लिया गया।”

52 वर्षीय नूर इस्लाम के मामले में कारण यह है कि 2002 की मतदाता सूची में उनका नाम नूर मोहम्मद शेख के रूप में दर्ज है। “मेरे पास इस संबंध में एक हलफनामा है, मैंने उसे जमा कर दिया है। अगर कोई गलती हुई होती तो वे और सबूत मांग सकते थे लेकिन हमें मतदान के अधिकार से वंचित क्यों किया जा रहा है?” चुपीपोटा की प्रधान सबनूर खातून के पति रब्बिल शेख का कहना है कि गांव के 80% परिवारों में दो या दो से अधिक ऐसे नाम हैं जिन्हें हटा दिया गया है।

75 वर्षीय कुलचान बीबी का कहना है कि उनके पति जमीरुद्दीन शेख का निधन हो चुका है, उन्होंने दो बार शादी की थी। जमीरुद्दीन के कुलचान से पांच बच्चे थे और दूसरी पत्नी से चार। अब, जबकि कुलचान बीबी और उनकी बहुओं के नाम मतदाता सूची में शामिल हैं, उनके दो बेटों और दो पोतों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। उनके एक पोते अब्दुल हुसैन (22) ने कहा कि अगर उन्हें पता होता कि उनका मतदाता आवेदन खारिज हो जाएगा तो मैं इसे दाखिल नहीं करता। यह एक लंबी प्रक्रिया थी। मैं इतने दिन बर्बाद नहीं करता।

राजनीतिक दलों में भी प्रक्रिया को लेकर आक्रोश

वहीं, दूसरी ओर राजनीतिक दलों में भी इस प्रक्रिया को लेकर आक्रोश है। कांग्रेस के कृष्णानगर दक्षिण सीट से उम्मीदवार अब्दुर रहीम शेख ने कहा, “इस चुनाव में भाजपा ने उन उम्मीदवारों के नाम हटाकर धांधली की है जो उन्हें वोट नहीं देंगे। लोगों को लगता है कि टीएमसी ने भी इस प्रक्रिया में सहयोग दिया है ताकि राज्य की राजनीति दो पक्षों तक सीमित रहे और अन्य दलों को इससे बाहर रखा जा सके।” शेख का कहना है कि नादिया जिले में उनके निर्वाचन क्षेत्र में 132 अल्पसंख्यक बहुल गांव हैं। कई ऐसे गांव हैं जहां 10-15% वोट रद्द कर दिए गए हैं।

हुगली जिले के उत्तरपारा से चुनाव लड़ रहे टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी के बेटे सिरसन्या हल्दर ने कहा, “मेरे निर्वाचन क्षेत्र में 32,000 वोट रद्द कर दिए गए हैं। यहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या केवल 2% है।” उन्होंने आगे कहा, “हमारी पार्टी 365 दिन जमीनी स्तर पर काम करती रहती है।” टीएमसी ने 2021 में उत्तरपारा से लगभग 36,000 वोटों से जीत हासिल की थी।

राणाघाट उत्तर पुरबो से भाजपा उम्मीदवार आशीष बिस्वास का कहना है कि उन्हें पूरा विश्वास है कि पार्टी नादिया की अनुसूचित जाति आरक्षित सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखेगी, जहां मतुआ समुदाय का दबदबा है। भाजपा ने 2021 में यहां से 31,000 से अधिक वोटों से जीत हासिल की थी। उन्होंने कहा, “मेरे क्षेत्र में भाजपा को 2021 और 2024 दोनों चुनावों में सबसे अधिक वोट मिले। यहां 70 प्रतिशत मतदाता मतुआ समुदाय से हैं लगभग 5000-7000 मतपत्र हटा दिए गए हैं लेकिन इससे नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हिंदू सनातन समुदाय एकजुट हो गया है और वे इस सरकार के खिलाफ मतदान करेंगे जो केवल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण के माध्यम से ही सत्ता में आती है।

Ground Report: बंगाल में ट्रिब्यूनल के बाहर डर का माहौल

पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची से हटाए गए 27 लाख लोगों की अपील पर सुनवाई के लिए 19 न्यायाधिकरणों की बैठक होनी है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इस मामले में 7 लाख से ज्यादा अपीलें दायर हो चुकी हैं। इस सबके बीच जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं वो सभी परेशान हैं। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें