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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव: वामपंथी साफ, माओवादियों के पुराने गढ़ में एक तिहाई सीटें बीजेपी को

पश्चिम बंगाल में हाल में संपन्न पंचायत चुनावों में भाजपा को बड़ी सफलता मिली है। पार्टी मुख्य विपक्षी दल के तौर पर सामने आई है। खासकर नक्सल प्रभावित रहे पुरुलिया और झारग्राम में बीजेपी ने एक तिहाई से ज्यादा सीटें हासिल की हैं। वहीं, वामपंथियों का लगभग सूपड़ा साफ हो गया है।

पश्चिम बंगाल पंचायत चुनावों में जीत के बाद खुशी मनाते भाजपा कार्यकर्ता। (फोटो सोर्स: पीटीआई)

भाजपा पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के विकल्प के तौर पर उभरी है। राज्य में हाल में संपन्न पंचायत चुनावों से इसकी तस्दीक होती है। पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस भाजपा के मुकाबले ग्राम पंचायत की तकरीबन चार गुना ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रहीं। वहीं, भाजपा दूसरे स्थान पर रही। राज्य की सत्ता में दशकों तक रहे वाम मोर्चा और कांग्रेस की हालत बेहद खराब रही। पंचायत चुनावों में वामपंथियों का लगभग सूपड़ा ही साफ हो गया। पंचायत चुनाव परिणाम के आंकड़ों के अनुसार, भाजपा ने माओवाद प्रभावित रहे पुरुलिया और झारग्राम जिलों में जबरदस्त सफलता हासिल की है। ‘मिंट’ के अनुसार, बीजेपी ने पुरुलिया की 1,944 ग्राम पंचायत की सीटों में से 644 (लगभग एक तिहाई) पर जीत हासिल की। वहीं, झारग्राम की 806 में से 329 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही। इन दोनों जिलों में आदिवासियों की जनसंख्या भी काफी है। ग्राम पंचायत की कुल 31,457 सीटों के नतीजे घोषित किए गए थे। इनमें से तृणमूल ने 21,110 और भाजपा ने 5,747 सीटों पर जीत हासिल की। वहीं, वाम मोर्चा को महज 1,708 सीटें ही मिलीं। वाम दलों से ज्यादा निर्दलीय को सीटें (1,830) हासिल हुईं। जिला परिषद की 571 सीटों में से वाम मोर्चा को सिर्फ 1 सीट नसीब हुई, जबकि तृणमूल को 544 और भाजपा को 22 सीटें मिलीं। मालूम हो कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। अगले साल लोकसभा का चुनाव होना है, ऐसे में भाजपा की नजर पश्चिम बंगाल पर है।

पूर्व माओवादियों के पुनर्वास से नाराजगी!: तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद माओवादियों के खिलाफ व्यापक संयुक्त अभियान चलाया गया था। इस दौरान बड़ी तादाद में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया था। झारग्राम के भाजपा जिला प्रमुख सुखमय सतपति ने बताया कि समर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास योजना के बाद से ही क्षेत्र में तृणमूल के खिलाफ असंतुष्टि बढ़नी शुरू हो गई थी। उन्होंने कहा, ‘वाम मोर्चा के अत्याचार के खिलाफ लोहा लेने वाले लोगों को अचानक से नजरअंदाज किया जाने लगा और पूर्व माओवादियों को नई जिंदगी दी जाने लगी थी।’ सुखमय पिछले दो वर्षों से लगातार इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बाद सबसे ज्यादा सीटें निर्दलीय के खाते में गईं। जीतने वालों में से अधिकतर तृणमूल कांग्रेस के असंतुष्ट नेता थे। वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने की है।

ममता सरकार से आदिवासी भी नाराज: स्थानीय विशेषज्ञों का कहना है कि आदिवासी समुदाय किसी भी तरह के छलावा या धोखे को गंभीरता से लेते हैं। यदि उन्हें पता है कि सरकार ने प्रति परिवार पांच किलोग्राम सब्सिडी वाला चावल देने की घोषणा की है, लेकिन उन्हें सिर्फ 2 किलो ही दिया जा रहा है तो समुदाय इसे विश्वासघात के तौर पर लेता है। इन विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी की सरकार राज्य में जिस विकास की बात करती है, आदिवासी समुदाय का रवैया उसके प्रतिकूल है।

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