विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही पश्चिम बंगाल में खाने पर राजनीति शुरू हो गई है। भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाने वाली बात यह है कि बीजेपी को हिंदी भाषी क्षेत्र की पार्टी के रूप में देखा जाता है जो सांस्कृतिक रूप से बंगालियों से मेल नहीं खाती। इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ टीएमसी को भाजपा को एक बार फिर से घेरने का मौका मिल गया है। इस ताजा विवाद की जड़ पड़ोसी राज्य बिहार में देखने को मिली, जहां एनडीए सरकार ने शहरी इलाकों में खुले में और बिना लाइसेंस के मांस बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया।

भाजपा के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा घोषित इस फैसले को सरकार ने स्वच्छ शहरों की दिशा में एक कदम बताया। सिन्हा ने कुछ दिनों बाद यह भी कहा कि धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों के पास मछली और मांस की बिक्री पर रोक लगाई जाएगी ताकि जन स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव बनाए रखा जा सके और बच्चों में हिंसात्मक प्रवृत्ति को रोका जा सके।

टीएमसी ने बीजेपी पर लगाया खानपान की आदतों पर नियंत्रण रखने का आरोप

विजय कुमार सिन्हा की हालिया टिप्पणियों के बाद, टीएमसी ने तुरंत भाजपा पर एक बार फिर खानपान की आदतों पर नियंत्रण रखने का आरोप लगाया। पार्टी ने आरोप लगाया, “पहले मंदिरों के पास के बाज़ार थे, फिर खुले स्थान, अब यह शैक्षणिक और धार्मिक संस्थानों और भीड़भाड़ वाले इलाकों के पास है। हम जो देख रहे हैं वह मांस और मछली के सेवन पर देशव्यापी प्रतिबंध है।”

इसके तुरंत बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 17 फरवरी को कहा, “अगर आप बीजेपी को वोट देंगे तो वे हमें बाजार में मछली और मांस बेचने नहीं देंगे। मुझे शाकाहारियों से कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन बंगाल में मछली और मांस की बिक्री पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।”

इसका पलटवार करते हुए भाजपा ने टीएमसी का मुकाबला करने के लिए तुरंत कदम उठाया। राज्य बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, “ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। बिहार या पश्चिम बंगाल में कोई भी ऐसे प्रतिबंध का पालन नहीं करेगा। बंगाल में मछली और मांस की बिक्री जारी रहेगी।” उन्होंने आगे कहा कि पार्टी केवल गोमांस की खुली बिक्री के खिलाफ है।

टीएमसी का आरोप- मछली और चावल खाने वाले बंगाली को निशाना बनाया जा रहा

टीएमसी ने आरोप लगाया कि मछली और चावल खाने वाले बंगाली को निशाना बनाया जा रहा है। टीएमसी ने कहा, “हमने हमेशा उनकी संकीर्ण और रूढ़िवादी परिभाषाओं को चुनौती दी है और उनके घुटन भरे दायरे से बाहर निकलकर फलने-फूलने का साहस दिखाया है और जो बीजेपी समझ नहीं पाती, उसे मिटाने की कोशिश करती है। लोग अगर भाजपा पर भरोसा करते हैं तो ठीक यही होगा। मछली और मांस पर प्रतिबंध, हमारी थालियों पर निगरानी और अंततः हमारे अस्तित्व पर ही सवाल उठेंगे।”

पश्चिम बंगाल में मांसाहार पर विवाद नया नहीं

यह पहली बार नहीं है जब बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा सामने आया है। दिसंबर 2025 में, कोलकाता में गीता पाठ कार्यक्रम स्थल के पास मांस के टुकड़े बेच रहे एक स्ट्रीट वेंडर पर हमले का वीडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था । इस घटना के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

इसके बाद जनवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई बंगाल और असम के बीच चलने वाली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने से टीएमसी भड़क उठी। पार्टी ने एक बार फिर भाजपा पर लोगों के भोजन पर नियंत्रण रखने का आरोप लगाया। इस विरोध के बाद, रेलवे ने यात्रियों को मांसाहारी भोजन का विकल्प भी उपलब्ध कराया।

इससे पहले साल 2024 में पीएम मोदी ने कहा था कि नवरात्रि और सावन के महीने में मांस और मछली का सेवन करने वाले विपक्षी नेता मुगल मानसिकता वाले हैं। तब सीएम बनर्जी ने जवाब देते हुए कहा था, “भाजपा को तो इस बात से भी आपत्ति है कि कोई मछली खाता है। आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि हम क्या खाएं या पहनें?”

TMC vs BJP: बंगाल की संस्कृति की रक्षा को लेकर छिड़ी जंग

वहीं, भाजपा के राजनीतिक एजेंडे से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए, टीएमसी प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा , “काली पूजा के दौरान हम देवी को मांस चढ़ाते हैं और तारा मां पूजा के दौरान मछली। बंगाल की संस्कृति को समझना जरूरी है। उन्होंने पहले वंदे भारत ट्रेनों में मछली पर प्रतिबंध लगाया और भारी विरोध के बाद ही इसे बहाल किया।”

टीएमसी द्वारा इस नए विवाद का भरपूर फायदा उठाने के प्रयास यह दर्शाते हैं कि वह भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में चित्रित करने की अपनी रणनीति पर कायम है जो राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बंगाली सांस्कृतिक मूल्यों के विपरीत है। वहीं,टीएमसी खुद को बंगाली हितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है।

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में महज अब दो महीने बाकी हैं। सभी दल चुनावी तैयारियों में जुट हुए हैं। इस बीच बीजेपी 1 मार्च से 9 परिवर्तन रथ यात्राओं के जरिए एक बड़ा आउटरीच कैंपेन शुरू करने वाली है। पूरे बंगाल में इस कैंपेन के जरिए पार्टी करीब 5,000 किलोमीटर तक सभी विधानसभा सीटों को कवर करेगी। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें