पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 16 सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों के लिए सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बीच रस्साकशी शुरू हो गई है। वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में इन सीटों पर दोनों दलों के लिए कांटे की टक्कर रही थी।

तृणमूल ने इनमें से नौ सीटें जीती थीं, जबकि भाजपा को सात सीटें मिली थीं। वर्तमान चुनाव में दोनों ही पार्टियां इन 16 सीटों में अधिक से अधिक सीटों को अपने पक्ष में करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही हैं। एसटी वर्ग की आरक्षित ये सीटें दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, दक्षिण दिनाजपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुरा और पुरुलिया जैसे जिलों में केंद्रित हैं। प्रमुख आरक्षित सीटों में अलीपुरद्वार, झारग्राम और कलिंपोंग शामिल हैं। तृणमूल कांग्रेस ने इन सभी 16 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है जबकि भाजपा ने इनमें से अभी तक 13 सीटों के लिए उम्मीदवार तय किए हैं।

पहले चरण में 23 अप्रैल को एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 15 सीटों पर मतदान होगा। वहीं, संदेशखाली में दूसरे और अंतिम चरण में 29 अप्रैल को मत डाले जाएंगे। तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की 84 आरक्षित (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ) विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं से जुड़ने के उद्देश्य से 60 दिवसीय जनसंपर्क कार्यक्रम ‘तफसीली संलाप’ चला रही है।

इस अभियान के दौरान तृणमूल के प्रतिनिधियों की अलग-अलग टीम विशेष वाहनों में यात्रा करके लक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के गांवों और बूथों तक पहुंचेंगी। ये टीमें सरकार की कल्याणकारी योजनाओं पर चर्चा कर करेंगी।

टीएमसी ने बीजीपीएम के साथ किया गठबंधन

इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस ने इन 16 सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची में बड़ा फेरबदल किया है। पार्टी ने सत्ता-विरोधी लहर का सामना करने के लिए 12 एसटी सीटों में से कई सीटों पर मौजूदा विधायकों को बदल दिया गया है। इतना ही नहीं तृणमूल ने ‘भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा’ (बीजीपीएम) के साथ गठबंधन किया है।

पार्टी ने दार्जिलिंग, कलिंपोंग व कर्सियांग की सीटें उनके लिए छोड़ दी हैं। पार्टी लगातार भाजपा नीत केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल के फंड को रोकने का आरोप लगाती रही है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि विभिन्न योजनाओं के फंड रुकने से सबसे अधिक नुकसान आरक्षित वर्ग के लोगों का ही होता है।

तृणमूल कांग्रेस इसलिए भाजपा को आरक्षित वर्गों को हानि पहुंचाने वाला दल बताती है। दूसरी ओर, भाजपा पुरुलिया और जंगलमहल जैसे इलाकों में आदिवासी कुड़मी समाज के साथ अपने जुड़ाव को मजबूत कर रही है।

इसका मकसद राज्य सरकार के प्रति उनकी नाराजगी का लाभ उठाना है, खासकर आदिवासी दर्जे की मांगों के मामले में। भाजपा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से जुड़े ‘प्रोटोकाल उल्लंघन’ विवाद का इस्तेमाल कर रही है और इसे आदिवासी समुदायों का अपमान बताकर पेश कर रही है। भाजपा उन सात सीटों में से छह पर नए और युवा चेहरों पर भरोसा कर रही है, जिन्हें वह 2021 में हार गई थी।

अनुसूचित जनजाति बहुल इलाकों में विकास और बुनियादी ढांचे मुद्दे को भाजपा लगातार उठा रही है ताकि इस वर्ग के लोगों के बीच और गहरी पैठ बनाई जा सके। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने एसटी-आरक्षित सीटों में से केवल एक सीट 22,038 मतों के अंतर से जीती थी और इन सीटों पर कुल मतों का 17.39 फीसद हिस्सा हासिल किया था।

इसके उलट, तृणमूल कांग्रेस ने 13 सीटें जीतीं, जिनमें जीत का औसत अंतर 21,945 वोट और मत फीसद 44.1 फीसद था। वर्ष 2021 में भाजपा की सात एसटी सीटों पर जीत का औसत अंतर 20,231 मत था, जो तृणमूल कांग्रेस की नौ सीटों पर जीत के औसत अंतर 20,046 वोटों से थोड़ा अधिक था। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस का मत फीसद 45.23 रहा, जो भाजपा के 44.04 फीसद से थोड़ा ही अधिक था। इसके अलावा चार एसटी उम्मीदवार अनारक्षित सीटों से चुने गए जिनमें दो भाजपा से, एक तृणमूल कांग्रेस से और एक निर्दलीय शामिल था।

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पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं और इसी बीच चुनाव कार्यक्रम भी सामने आ चुका है। इस बार चुनाव दो चरणों में आयोजित किए जाएंगे, जिससे राज्य की सियासत और भी दिलचस्प होने की उम्मीद है। चुनाव आयोग द्वारा जारी कार्यक्रम के अनुसार, पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल 2026 को होगा, जबकि दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल 2026 को कराया जाएगा। इसके बाद 4 मई 2026 को मतगणना की जाएगी, जिस दिन यह साफ हो जाएगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। मूल रूप से बंगाल में टक्कर सत्ताधारी टीएमसी और बीजेपी के बीच है। दोनों की पार्टियों ने जनता को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक