पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में इस बार चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है, जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के मजबूत गढ़ में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सेंध लगाने की आक्रामक रणनीति के साथ उतरी है।

2021 के विधानसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने वाली भाजपा इस बार अपनी स्थिति बदलने के इरादे से मैदान में है और दहाई के अंक में सीटें हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। पार्टी ने यहां अपनी ताकत बढ़ाने के लिए वरिष्ठ नेता अमित शाह को सीधे मोर्चे पर उतारा है, जबकि संगठन को मजबूती देने के लिए विशेष रणनीति तैयार की गई है। इसी क्रम में सोनपुर दक्षिण से पूर्व सांसद रूपा गांगुली को उम्मीदवार बनाया गया है।

सूबे की सियासत के सबसे महत्त्वपूर्ण जिले दक्षिण परगना की 31 विधानसभा सीटों में से पिछले चुनाव में भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। तृणमूल ने 2021 में 30 सीटें अपने नाम की थीं। शाह ने खुद इस जिले की कमान और निगरानी अपने हाथों में ले रखी है। जमीनी स्तर पर पार्टी संगठन की कमजोरी को पाटने और मतदाताओं खासकर मतुआ और शरणार्थी समुदायों को साधने के लिए त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब देब को यहां विशेष तौर पर पार्टी ने मोर्चे पर लगाया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बिप्लब देब और शाह की रणनीति काम कर गई तो बंगाल की राजनीतिक में एक बड़ा उलटफेर हो जाएगा।

चुनाव की शुरुआत में शाह ने यहां के रायदीघी से भाजपा की ‘परिवर्तन यात्रा’ आरंभ की थी। शाह ने कहा था कि पश्चिम बंगाल की जनता अब बदलाव चाहती है। शाह ने आरोप लगाया था कि मौजूदा शासन में भ्रष्टाचार चरम पर है। साथ ही उन्होंने राज्य सरकार पर विकास कार्यों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। उन्होंने घुसपैठ का मुद्दा भी उठाया और कहा कि अवैध घुसपैठ राज्य के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। साथ ही उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी इस बात को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि घुसपैठियों को देश से बाहर निकाला जाएगा।

यह जिला एक ‘फ्रंटलाइन क्लाइमेट जोन’ बन चुकी है

यह जिला बंगाल की खाड़ी के किनारे बसा हुआ है और इसकी पहचान एक ‘फ्रंटलाइन क्लाइमेट जोन’ के रूप में भी बन चुकी है, क्योंकि यहां चक्रवात, समुद्री जलस्तर वृद्धि और तटीय कटाव जैसे खतरे लगातार बने रहते हैं। भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टि से यह जिला बेहद संवेदनशील है। यह बांग्लादेश की सीमा के पास स्थित है और समुद्री मार्गों के करीब होने के कारण सुरक्षा व सीमा प्रबंधन के लिहाज से भी अहम भूमिका निभाता है।

इसके अलावा, कोलकाता के लिए खाद्य आपूर्ति, मछली उत्पादन और श्रमबल का बड़ा हिस्सा इसी जिले से आता है। जिले में चार लोकसभा सीटें जादवपुर, डायमंड हार्बर, मथुरापुर और जयनगर आती हैं। डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी ने इस पूरे इलाके को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बनाया हुआ है। दक्षिण 24 परगना की आबादी विविध और जटिल सामाजिक संरचना वाली है। यहां हिंदू और मुसलिम दोनों समुदाय बड़ी संख्या में रहते हैं, कई इलाकों में मुसलिम आबादी 40-50 फीसद तक भी पहुंचती है।

जातीय समीकरण की बात करें तो यहां अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की बड़ी आबादी है, जो चुनावी राजनीति में अहम भूमिका निभाती है। सुंदरबन क्षेत्र में आदिवासी समुदाय भी मौजूद हैं। यहां की राजनीति में जाति से ज्यादा धर्म, स्थानीय मुद्दे, गरीबी, रोजगार और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे महत्त्वपूर्ण होते हैं।

दक्षिण 24 परगना की विधानसभा सीटों पर लंबे समय तक वाम दलों का प्रभाव रहा, खासकर माकपा नेतृत्व में। 1977 से 2011 तक वाम मोर्चा सरकार के दौरान यहां उनका मजबूत आधार था। लेकिन 2011 के बाद तृणमूल ने इस जिले में जबरदस्त पकड़ बना ली। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल ने ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में अपना मजबूत वोट बैंक तैयार किया। इतिहास की बात करें तो दक्षिण 24 परगना का विकास औपनिवेशिक काल में हुआ, जब ब्रिटिश शासन के दौरान इसे प्रशासनिक रूप से व्यवस्थित किया गया।

यह पहले ‘24 परगना’ बड़े जिले का हिस्सा था, जिसे बाद में उत्तर और दक्षिण में बांटा गया। इस क्षेत्र में जमींदारी व्यवस्था और नदी-आधारित अर्थव्यवस्था का गहरा प्रभाव रहा है। सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह जिला विविधता से भरा हुआ है। यहां बंगाली संस्कृति का गहरा प्रभाव है, लेकिन इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय, मछुआरा समुदाय और आदिवासी समूह भी बड़ी संख्या में रहते हैं। यहां के लोगों की जीवनशैली प्रकृति के बेहद करीब है, खासकर सुंदरबन क्षेत्र में, जहां लोग जंगल, नदी और समुद्र पर निर्भर रहते हैं।

दक्षिण परगना के विधानसभा क्षेत्र

गोसाबा, बसंती, कुलतली, पाथरप्रतिमा, काकद्वीप, सागर, कुलपी, रायदिघी, मंदिरबाजार, जयनगर, बारुइपुर पूर्व, कैनिंग पश्चिम, कैनिंग पूर्व, बारुइपुर पश्चिम, मग्राहाट पूर्व, मग्राहाट पश्चिम, डायमंड हार्बर, फलता, सतगछिया, बिशनुपुर, सोनारपुर दक्षिण, भंगड़, कस्बा, जादवपुर, सोनारपुर उत्तर, टालीगंज, बेहाला पूर्व, बेहाला पश्चिम, महेशतला, बज बज और मेटियाबुरुज।

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पश्चिम बंगाल के जंगलमहल के आदिवासी बहुल इलाकों में आने वाले विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी के बीच फिर से कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। जंगलमहल में झारग्राम, पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुरा जिले शामिल हैं। बीते कुछ सालों में यहां बड़े राजनीतिक उतार-चढ़ाव आए हैं। कभी लेफ्ट पार्टियों का गढ़ रहा यह इलाका बाद में माओवादी विद्रोह का केंद्र बन गया। 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद TMC ने यहां अपना दबदबा बनाया। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक