ताज़ा खबर
 

पश्चिम बंगाल: इस चुनाव में सिंगुर को इंतजार है नई सुबह का

’सिंगुरवासियों को राजनैतिक दलों पर भरोसा नहीं, लिहाजा सियासी पंडित भी नहीं जानते कि चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा।

पश्चिम बंगाल के उत्तरी 24 परगना जिले में शनिवार (23 अप्रैल) को चुनावी रैली निकालतीं माकपा कार्यकर्ता। पश्चिम बंगाल में प्रचंड गर्मी के दौरान रैली निकालतीं कार्यकर्ताओं ने माकपा चुनाव चिह्न वाली छतरी का इस्तेमाल किया। (पीटीआई फोटो)

‘हमारे जीवन में तो अमावस की काली लंबी रात उसी दिन शुरू हो गई थी जिस दिन टाटा ने यहां से अपना बोरिया-बिस्तर समेटने का एलान किया था। हमें बीते आठ वर्षों से इस रात की सुबह का इंतजार है।’ महानगर से कुछ दूर हुगली जिले के सिंगुर इलाके के गोपालनगर गांव के सुरेन दास यह कहते हुए कहीं खो जाते हैं। राज्य की बाकी 48 सीटों के साथ चौथे दौर में 30 अप्रैल को सिंगुर सीट के लिए भी मतदान होना है। बीते चुनावों में तृणमूल ने जिले की 18 में से 16 सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार स्थानीय नेता भी चुनाव प्रचार में सक्रिय नहीं हैं।

हुगली जिले का यह अनाम कस्बा कोई दस साल पहले उस समय अचानक सुर्खियों में आया था, जब टाटा समूह ने यहां अपनी लखटकिया नैनो परियोजना लगाने का फैसला किया था। उस परियोजना के चलते इलाके में जमीन की कीमत आसमान छूने लगी और लोगों के सपनों में कई रंग भरने लगे। लेकिन उसके बाद अनिच्छुक किसानों की जमीन वापस करने की मांग में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में चले लंबे आंदोलन ने आखिर टाटा को यह परियोजना समेटने पर मजबूर कर दिया। तब एक बार फिर यह इलाका सुर्खियों में आया था। इसी सिंगुर आंदोलन ने 2011 में ममता को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई थी। तब तृणमूल उम्मीदवार रवींद्रनाथ भट्टाचार्य यहां कोई 35 हजार वोटों से जीते थे।

ममता ने सत्ता में आते ही किसानों को उनकी जमीन लौटाने का भरोसा दिया था। उन्होंने इसके लिए कानून भी बनाया। लेकिन यह मामला अब अदालती पचड़े में फंसा है। बीते दिनों सिंगुर में ममता ने माना था कि अब उनके हाथ में कुछ नहीं है। इस मामले के निपटारे में पांच साल भी लग सकते हैं और पचास साल भी। सुरेन के साथ इलाके के कई युवकों ने टाटा कारखाने में काम करने के लिए पुणे जाकर प्रशिक्षण लिया था। ये युवक उन परिवारों के थे जिन्होंने परियोजना के लिए जमीन दी थी। परियोजना बंद होने के कुछ साल बाद तमाम युवक अब काम की तलाश में विभिन्न शहरों में चले गए। लेकिन बीमार मां की देखभाल के चलते सुरेन बाहर नहीं जा सके। अब वे ट्यूशन पढ़ा कर खर्च चलाते हैं।

जिन लोगों ने उक्त परियोजना के लिए जमीन दी थी उनकी हताशा तो स्वाभाविक है। लेकिन जिन्होंने नहीं दी थी वे भी हताश हैं। टाटा के जाने के बाद कोई ढाई साल बाद यानी विधानसभा चुनावों तक तो लोग भावनाओं के ज्वार में बह रहे थे। अब भावनाओं की जगह हताशा ने ले ली है। बेड़ाबेड़ी गांव के स्वप्न माल कहते हैं कि राजनीति करने वाले तो मजे में ही हैं। लेकिन हमारे बच्चों को रोजगार की तलाश में विभिन्न शहरों की धूल फांकनी पड़ रही है।

टाटा की परियोजना लगने की सूचना फैलते ही तमाम छोटे-बड़े कारोबारी सिंगुर में जमीन खरीदने लगे। नतीजतन जमीन की कीमतें रातोंरात आसमान छूने लगी। अब वह जमीन खाली पड़ी है। बालू भर जाने की वजह से उस पर अब खेती भी नहीं हो सकती। जमीन के एवज में मिला मुआवजा तो कब का खत्म हो गया। जिन लोगों ने ममता की बातों में आकर जमीन का मुआवजा नहीं लिया था वे तो न घर के रहे न घाट के। कोलकाता को दिल्ली से जोड़ने वाले नेशनल हाइवे-2 के किनारे नैनो के लिए बना संयंत्र अब उजाड़ हो चुका है। परियोजना की जमीन पर अब पशु घास चरते नजर आते हैं।

तृणमूल कांग्रेस के प्रति सिंगुर के लोगों की नाराजगी और हताशा को भुनाने के प्रयास में जुटे माकपा उम्मीदवार रबीन देव ने कहा है कि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो टाटा समूह को यहां कारखाना लगाने के लिए राजी कर लिया जाएगा। लोगों की भावनाओं के दोहन के लिए वे नैनो पर चढ़ कर वोट मांग रहे हैं। लेकिन लोगों में अब भावनाएं बची ही कहां हैं? राजनीतिक दलों से उनका भरोसा उठ चुका है। यही वजह है कि वोटरों के होठ सिले हैं और आंखों में सूनापन छाया है। ऐसे में राजनीतिक पयर्वेक्षकों के लिए भी इस बात का अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है कि सिंगुर में चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App