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पश्चिम बंगाल चुनाव: दीदी को भारी पड़ सकती है बेखबरी

ममता बनर्जी सरकार को सारदा चिटफंड और नारद स्टिंग आॅपरेशन कर रहे हैं परेशान, अल्पसंख्यक कल्याण और बेरोजगारी के मुद्दे पर भी पीछे हैं

Author कोलकाता | Published on: April 24, 2016 2:27 AM
हावड़ा जिले में चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (पीटीआई फोटो)

कोलकाता, 23 अप्रैल। आरोपों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। लेकिन सबसे ऊपर आ गए हैं आतंक और भ्रष्टाचार के आरोप। टेट, एसएससी परीक्षाओं, उत्तर बंग विकास परिषद, त्रिफला घोटाले की चर्चा अभी कम पड़ गई है, ममता बनर्जी की पेंटिंग की पौने दो करोड़ में हुई खरीद की भी। लेकिन सारदा चिटफंड घोटाला पीछा किए हुए है। सबसे ज्यादा नारद स्टिंग आपरेशन में तृणमूल कांग्रेस के कई मंत्री, विधायकों और सांसदों को सरेआम टीवी चैनलों पर रुपए लेते देख आम बंगाली हैरान है।

हैरान वह इस बात पर भी है कि पार्टी प्रमुख कह रही हैं कि स्टिंग कांड का पता पहले चला होता तो वह कुछ करतीं। दल के ही बड़े नेता मुकुल रॉय कहते हैं कि किसी ने व्यक्तिगत काम के लिए पैसे नहीं लिए। कोई बदनाम करने के लिए इसे साजिश बता रहा है, पर चैनलों-अखबारों, सोशल मीडिया ने करोड़ों लोगों तक इस नेक काम को पहुंचा दिया है। रही सही कसर फ्लाईओवर हादसे ने निकाल दी है। सिंडीकेट राज अब लोगों की जुबान पर है।

वैसे, दीदी और उनका दल विकास-विकास की रट लगाए हुए हैं। लेकिन यह सब किसी तर्कवादी के पल्ले नहीं पड़ रहा। सड़कों की मरम्मत, रोशन शहर को रोशनी से थोड़ा और नहला देना, अच्छा लगता है, पर यह विकास तो नहीं। सच तो यही है कि पिछले पांच साल में बंगाल के हिस्से एक भी बड़ा कारखाना नहीं आया। चाय बागान, जूट मिल लगातार बंदी के शिकार होते गए। राहुल गांधी में अपने भाषणों में ईंट भट्ठों तक के बंद होते जाने की ओर इशारा किया। हल्दिया, दुर्गापुर, बैरकपुर के शिल्पांचल बेरौनक होते चले गए।

हुगली नदी के किनारे की 22 जूट मिले बंद हैं, उत्तर बंगाल के कई चाय बागान भी। भुखमरी और बीमार पीछा नहीं छोड़ रहे। फिर भी विकास की बात हो रही है। सरकारी दफ्तरों में एक लाख 42 हजार से अधिक पद भरे जाने हैं। पिछले साढ़े चार साल में 41 हजार नियुक्तियां जरूर हुई हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर ठेके पर।

ममता सरकार अल्पसंख्यकों की तरफदार होने का दावा करती है, लेकिन इन्हीं के विकास के दफ्तर में कोई 1700 पद रिक्त पड़े हैं। इनके लिए 56 मार्केटिंग हब बना कर 56 हजार युवकों को रोजगार देने की घोषणा की गई थी, लेकिन अब तक कुछ हुआ नहीं। राज्य के रोजगार बैंक में 18 लाख युवकों के नाम दर्ज हैं, पर काम महज 1043 को मिल पाया है। वैसे, ममता जी सभी काम कर देने के दावे की तरह यह दावा भी कर रही हैं कि उनकी सरकार ने 68 लाख नौकरियों की व्यवस्था कर दी है।

विपक्ष इस दावे की खिल्ली उड़ाते हुए कह रहा है कि इसका मतलब हुआ हर मतदान केंद्र के हिस्से 80 लोगों को रोजगार। वह लोगों से पूछ रहा है क्या सचमुच ऐसे नौजवानों को आप जानते हैं, जिन्हें रोजगार मिला। इलाके के लोग ऐसे खुशनसीब लोगों को खोजने में नाकाम हैं। हां, निजी और आइटी कंपनियों की नौकरियां पा कर राज्य से बाहर जरूर चले गए हैं थोड़े युवक-युवतियां।

राज्य सरकार अभी घाटे पर चल रही है। वित्तीय हालत खराब है। पिछली सरकार के बाजार से कर्ज लेने के मर्ज की निंदा करने वाली ममता जी की सरकार 34 साल में लिए पौने दो करोड़ लाख के कर्ज को कम करने की जगह पांच साल में बढ़ा कर तीन करोड़ लाख तक ले गई हैं। विपक्षी दल के नेताओं का आरोप है कि सिर्फ वोट बैंक बढ़ाने के इरादे से इस बदहाली में हजारों क्लबों को करोड़ों बांटे गए। उत्सवों में करोड़ों पानी की तरह बहाए गए। रोजगार सृजन के लिए कोई काम ही नहीं किया गया।

विपक्ष का आरोप दूसरे क्षेत्रों में भी अराजक स्थितियां पैदा करने का है। साधारण लोगों तक का मानना है कि शिक्षालयों में पठन-पाठन का माहौल खराब हुआ है। शिक्षक तक सत्ताघारी दल के छात्र नेताओं पीटे और अपमानित किए गए हैं। चिकित्सालयों में तोड़-फोड़ और डाक्टरों की पिटाई की कई घटनाएं हुई हैं। सत्ताधारी दल के समर्थकों के हमलों में पांच पुलिसवालों को भी जानें गंवानी पड़ी हैं। विपक्षी दलों के कई कार्यकर्ताओं-नेताओं की हत्या हुई है।

वामदलों के आरोप के मुताबिक उनके 174 सदस्य तृणमूल के हमले में मारे गए हैं। आपसी हिंसा के शिकार सत्ताधारी के कई लोग भी हुए हैं। मारपीट, आगजनी, छेड़छाड़, बलात्कार, धमकी, जबरन उगाही, चोरी-डकैती की वारदातें आए दिन सुर्खियां बनती रही हैं। हालांकि आपराधिक वारदातें पहले भी होती रही हैं, पर इनमें इधर जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।

जाहिर है, यह तस्वीर लोगों में असंतोष और निराशा ही पैदा कर सकती है। दूसरे चुनाव के दौरान हो रही हिंसक वारदातों से जो आतंक का माहौल बना है, सत्ताधारी दल की मुश्किलें बढ़ा सकती हैं। चुनाव आयोग के कड़े रुख पर मुख्यमंत्री का हमलावर होना, कार्यकर्ताओं को उत्साहित के साथ-साथ अनियंत्रित भी कर रहा है।

देख लेने, निपट लेने की उनकी धमकियां भी नतीजे को प्रभावित कर सकती हैं। भ्रष्टाचार के आरोप से कहीं ज्यादा विरोधियों-मतदाताओं को आतंकित करने की कोशिश नुकसानदायक साबित हो सकती है। सत्ता पक्ष के लोग इसे गंभीरता से लेने के मूड में नहीं दिख रहे। राजनीतिक प्रेक्षकों की माने तो इस बेखबरी का नुकसान ममता जी को भुगतना पड़ सकता है।

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