पश्चिम बंगाल में आज दूसरे चरण की वोटिंग के लिए चुनावी प्रचार थम जाएगा और 29 अप्रैल को वोटिंग की जाएगी। ऐसे में आज हम उस जगह की बात करेंगे जहां से मुद्दा उठाकर ममता बनर्जी सत्ता पर काबिज हुई। यह जगह है नैनो मैन्युफैक्चरिंग प्लांट, जिसे टाटा ने आंदोलन के कारण छोड़ दिया। अब इस जगह पेड़-पौधे उग आए हैं।
इसी के बगल में 70 वर्षीय शेख मोहम्मद अली ने कहा कि यहाँ जो कुछ भी हुआ, उसकी वजह से उन्हें उत्तराखंड जाना पड़ा, जहां वे अब एक सुनार के तौर पर काम करते हैं।
जॉयमोल्ला गांव के रहने वाले शेख मोहम्मद ने कहा, “मैंने यह सब अपनी आंखों से देखा है। नैनो फैक्ट्री का प्रस्ताव कैसे आया, उसके आसपास और दूसरे कारोबार कैसे बढ़ने लगे। मेरे बेटे ने यहीं से ट्रेनिंग ली और उसे 4500 रुपये माह पर एक अप्रेंटिस के तौर पर काम मिला। फिर आंदोलन शुरू हुआ और सब बंद पड़ गया।” शेख मोहम्मद को उस समय वामपंथी सरकार ने उनकी जमीन के बदले मुआवजा दिया था।
2006 में शुरू हुआ था सिंगुर भूमि अधिग्रहण आंदोलन
2006 में शुरू हुए सिंगुर भूमि अधिग्रहण आंदोलन के साथ ही नंदीग्राम आंदोलन भी चल रहा था, इससे तृणमूल कांग्रेस को फायदा मिला और इसने ममता बनर्जी को 2011 में सत्ता पर काबिज कराया।
हालांकि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिग्रहण को अवैध करार दिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जमीन वापस कर दी। लेकिन अब भी जमीन का एक बड़ा हिस्सा बिना खेती के पड़ा है। राज्य सरकार उन किसानों को मुआवजा दे रही रही, जिन्हें अनिच्छुक की कैटेगरी में रखा गया था।
सरकार की नाकामी का प्रतीक
दो दशक बीत जाने के बाद भी सिंगुर पश्चिम बंगाल में उद्योग लाने में सरकार की नाकामी का प्रतीक बना हुआ है और इस कारण यहां रोजगार की कमी और पलायन मु्ख्य मुद्दे हैं। मौजूदा विधानसभा चुनावों की घोषणा से ठीक पहले टीएमसी सरकार ने युवा साथी योजना शुरू की, इसके तहत बेरोजगार युवाओं को हर माह 1500 रुपये दिए जाते हैं। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस योजना के तहत 84 लाख से अधिक आवेदन मिले हैं, जिनमें से 65 लाख से अधिक आवेदन सभी विधानसभा क्षेत्रों में लगाए गए कैंपों के जरिए और 19 लाख आवेदन ऑनलाइन मिले हैं।
एक ओर जहां बीजेपी और अन्य विपक्षा दलों ने रोजगार के मुद्दे पर सरकार को घेर रखा है, तो वहीं ममता बनर्जी ने इसे अपनी प्राथमिकता बताया है।
बेरोजगारी बड़ा मुद्दा
लेकिन, शेख मोहम्मद इससे जरा भी प्रभावित नहीं हैं। उन्होंने पूछा, “क्या ये 1500 बेरोजगार युवाओं के लिए नौकरी पक्की कर पाएंगे, क्या 2000 रुपये और 16 किलो चावल की तरह में किसी परिवार का भविष्य सुरक्षित कर पाएंगे? मेरे बेटे को अधिकतर युवाओं की तरह और कितने समय तक दूसरे राज्यों में जाकर काम करना पड़ेगा?”
उन्होंने आगे कहा, “जमीन को देखिए। न तो रोजगार दिया और न ही इस पर खेती की जा सकती है। 18 सालों से, जब से टाटा यहां से गए तब से यह ऐसी ही पड़ी है।”
वोटरों के मन में नौकरियां
करीब 10 फीट की दूरी पर, युवाओं का एक समूह सड़क किनारे बने एक चबूतरे पर बैठा है। इनमें से अधिकतर सोने के कारीगर है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करते हैं- ठीक सिंगूर के अपने कई साथियों के तरह।
26 वर्षीय शेख इमरान ने कहा यहां कोई काम नहीं है। अल्मोड़ा में हम 30-35 हजार रुपये कमा लेते हैं। हम यहां क्यों रुकेंगे। मुझे भी युवा साथी योजना के तहत 1500 रुपये मिलते हैं लेकिन यह पॉकेट मनी की तरह है। शेख इमरान अल्मोड़ा में काम करते हैं और उनका नाम एसआईआर से कट गया है।
करीब 500 मीटर दूर, बेरोबेरी बाजार में 25 वर्षीय सैकत धारा खाद की एक दुकान चलाते हैं। वह एक किसान और अधिग्रहण-विरोधी आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक दूधकुमार धारा के बेटे हैं।
सैकत धारा ने कहा, “प्रोजेक्ट क्षेत्र के भीतर हमने अपनी 5.5 बीघा जमीन खो दी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उसे वापस पाने पर भी हम केवल 2.5 बीघा जमीन पर खेती कर पाए।” साथ ही उन्होंने कहा कि लोग उद्योग और खेती दोनों ही चाहते हैं। उन्होंने कहा, “उद्योगों के बिना आर्थिक हालात नहीं सुधरेंगे, देखते हैं इस चुनाव के बाद क्या होता है।”
60 वर्षीय बंधाना दास ने कहा, उचित प्रक्रिया के तहत उद्योग लाए जाने चाहिए। हमने अपने दो बेटों के लिए दुकानें खरीदीं, जिन्हें नौकरी नहीं मिल पाई।
टाटा का बंद पड़ा नैनो प्लांट
जब एक नजर उस वीरान जगह पर डालते हैं तो इसकी पूरी कहानी सामने आ जाती है। घास के मैदान और मलबे के बीच अंदरूनी सड़कों पर पाइप बिखरे पड़े हैं। शिकायतों के बाद जलभराव की समस्या से निपटने के लिए एक नई नहर खोदी गई है।
बेराबेरी के 46 वर्षीय अजीत हम्भीर ने कहा, “प्रोजेक्ट एरिया के भीतर मेरी 10 कट्ठा जमीन है, जो अब जंगली घास और झाड़ियों से ढक गई है। मैं उस पर खेती नहीं कर सकता क्योंकि मिट्टी में कंक्रीट, पत्थर और लोहे के टुकड़े पड़े हैं। मेरे चार भाई और मैं प्रोजेक्ट एरिया के बाहर वाली जमीन पर गुजारा करते हैं। मुझे लगता है कि अब उद्योगों के वापस आने का समय आ गया है।”
टाटा को हटना पड़ा था पीछे
टाटा मोटर्स ने 18 मई 2006 को नैनो फैक्ट्री की घोषणा की, जिसके बाद वाममोर्चा सरकार ने इस परियोजना के लिए छह मौजों- गोपालनगर, बेराबेरी, बाजेमेलिया, खासेरभेरी, सिंघेराबेरी और जॉयमोल्लाह में 997.5 एकड़ जमीन अधिग्रहित की।
दिसंबर 2007 में तत्कालीन विपक्ष की नेता ममता बनर्जी ने इस अधिग्रहण के विरोध में 26 दिनों की भूख हड़ताल की। इन विरोध प्रदर्शनों के चलते टाटा मोटर्स को 3 अक्टूबर 2008 को पीछे हटना पड़ा।
लौटाई गई जमीन का केवल करीब 30 फीसदी हिस्सा ही खेती योग्य होने के कारण कुछ ग्रामीणों ने सरकारी मदद से मछली पालन शुरू किया, लेकिन यह पहल असफल रही।
सिंगुर में हुआ है विकास- टीएमसी विधायक
इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दोनों ने ही सिंगुर के पास रैलियां की। साल 2021 में टीएमसी के बेचाराम मन्ना ने यह सीट जीती थी। उन्होंने कहा, “मुझे इस बार अपनी जीत का पूरा भरोसा है। लोग सिंगुर आंदोलन को भूले नहीं है, यहां विकास हुआ है।”
हालांकि करीब 25 किमी दूर उत्तरपारा में हिंदुस्तान मोटर्स प्लांट के पास 30 वर्षीय सोनाली बसु इस बात से सहमत नहीं है। उन्होंने कहा, “सिंगुर में कुछ भी नहीं हुआ है। यहां भी हिंदुस्तान मोटर्स प्लांट मई 2014 में बंद हो गया था। हमें नौकरियां कहां से मिलेंगी? बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा है।”
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पश्चिम बंगाल के दूसरे चरण के लिए 29 अप्रैल को वोटिंग होगी। दूसरे चरण की 142 सीटों पर वोटिंग होनी है। यह पूरा क्षेत्र ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में 142 में से 123 सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज की थी जबकि भाजपा को केवल 18 पर जीत हासिल हुई थी। वहीं एक सीट पर अन्य ने जीत दर्ज की थी। दूसरे चरण का चुनाव काफी महत्वपूर्ण होने वाला है और यह तय करेगा कि बंगाल में किसकी सत्ता आ रही है। दूसरे चरण में प्रेसीडेंसी डिवीजन की भी सीटें हैं जहां पर टीएमसी का एकछत्र राज है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
