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पश्चिम बंगाल चुनाव पर बेबाक बोल : परिवर्तन पंथी

पश्चिम बंगाल की विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 294 सदस्यों की है, जिनमें से फिलहाल 184 सीटों पर ममता बनर्जी का कब्जा है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (पीटीआई फोटो)

देश अभी विचारधारा की राजनीति के जिस द्वंद्व, टकराव और संक्रमण काल से गुजर रहा है, उसमें पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव को अगर एक कसौटी की तरह देखें तो यह अतिरंजना नहीं होगी। दरअसल, जिस तरह पिछले चार दशक से देश में पश्चिम बंगाल वाम राजनीति का गढ़ रहा है और हाल के वर्षों में दक्षिणपंथ की राजनीति का केंद्रीय सत्ता में उभार हुआ है, उसमें इसलिए भी राज्य के चुनाव को एक खास जगह मिली हुई है कि पांच साल पहले सत्ता से बाहर होने के बाद एक बार फिर से वामदलों ने अपना पूरा जोर लगा दिया है, यहां तक कि कांग्रेस से समझौता करना भी उनके लिए कोई परेशानी का सबब नहीं बना। इसलिए इस राज्य के चुनावी नतीजों का इंतजार शायद सबको है।

कोलकाता की सरहद में कदम रखते ही शहर के दोनों तरफ के खंभों से लिपटी नीली और सफेद रंग की लड़ियां सहज ही कुछ अलग-सी छाप छोड़ती प्रतीत होती हैं। इनके बारे में जानना कोई ज्यादा मुश्किल भी नहीं। शहर में कोई भी बता देगा कि यह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की दस्तखतनुमा पहचान है। टैक्सी का ड्राइवर एक कदम और आगे बढ़ जाता है, ‘अगर आप अपने घर का पेंट नीला और सफेद करवा लें तो आपका टैक्स माफ हो जाता है’। उसकी इस बात की सच्चाई पर किसी को शुबहा हो सकता है, लेकिन यह इस बात को जाहिर करने के लिए काफी है कि अगर ममता की मर्जी के अनुकूल काम करेंगे तो बस कल्याण ही है। यह सच भी है कि स्थानीय प्रशासन ने एक योजना ही शुरू कर दी थी कि अगर कोई व्यक्ति अपने घर को नीले रंग में रंगवा लेता है तो उसे टैक्स में छूट मिलेगी। जयपुर को ‘गुलाबी शहर’ कहे जाने का संदर्भ भले ही कुछ और हो, लेकिन उसी तर्ज पर कोलकाता को ‘नीला शहर’ नाम देने की यह कवायद काफी हद तक कामयाब दिखाई देती है।

ऊपर से ऐसा ही दिखता है पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का प्रभाव। तमाम आरोपों और टकराव के बीच कामयाबी से अपना करीब एक कार्यकाल पूरा कर चुकी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अपने दूसरे कार्यकाल को लेकर काफी आश्वस्त दिखाई दे रही है। हालांकि चुनाव के ऐन मौके पर कोलकाता में एक फ्लाईओवर के गिरने की घटना और तृणमूल कांग्रेस के चार बड़े नेताओं के स्टिंग आॅपरेशन में पकड़े जाने के कारण पार्टी को स्थानीय स्तर पर थोड़ा धक्का तो लगा है। तृणमूल की ओर से इसका जबर्दस्त खंडन किया जा रहा है और प्रतिक्रिया भी दी जा रही है। लेकिन सच यह भी है कि मुद्दों के मारे विपक्ष को इसने उंगली उठाने का कारण तो दे ही दिया है। अब चुनावों में इसका असर कितना होगा, यह देखने की बात है।

सच यह है कि बंगाल में पिछले विधानसभा चुनाव में जो बुद्धिजीवी ममता के समर्थन में थे, उनमें से ज्यादातर लोग आज उनसे दूर हो चुके हैं। चाहे उनमें कौशिक सेन हों या कबीर सुमन। अरुणाभ घोष जैसे उनके साथी कांग्रेस में चले गए। और इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ममता बनर्जी को आलोचना बर्दाश्त नहीं। भाजपा ने घोटालों को लेकर उनकी आलोचना की तो उन्होंने सीबीआइ जांच व भाजपा के खिलाफ रैली निकालने का आदेश जारी कर दिया। कवि शंख घोष ने इस पर सवाल उठाए और अन्य बुद्धिजीवियों ने भी इससे दूरी बरती। माओवाद प्रभावित नंदीग्राम और सिंगुर जिन्होंने माकपा के खिलाफ ममता को वोट दिया था, अब वे भी ममता के ‘परिवर्तन’ से परेशान हैं।

करीब साढ़े तीन दशक तक काबिज वामपंथी दलों को धराशायी करके ममता बनर्जी ने अपनी कामयाबी की जो कहानी लिखी थी, उसकी इबारत अभी धूमिल पड़ती नहीं दिखाई दे रही। तब ममता ने कांग्रेस से हाथ मिला कर अपनी ताकत दोहरी की थी और इस राष्ट्रीय पार्टी को अपने साथ दूसरे नंबर की पार्टी के तौर पर ही जगह दी। बहरहाल, चुनावी हिसाब-किताब के लिहाज से देखें तो बिहार और झारखंड से आए लोगों की कोलकाता में भरमार है। हिंदी भी शहर में बोलचाल की आम भाषा है। लगभग सभी लोग किसी का अभिवादन करने के लिए ‘नमस्ते जी’ ही कहते हैं। यानी ऐसा लगता है कि भाषा को लेकर कहीं कोई पूर्वग्रह नहीं है। यहां तक कि शहर के पुराने और भीड़भाड़ वाले इलाके में भी लोग हिंदी को अपनी भाषा की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह दीगर है कि शहर की 60 फीसद के करीब आबादी बंगाली समुदाय के लोगों की है।

जिस प्रदेश में हर बार चुनावी हिंसा में सैकड़ों लोगों के मारे जाने का इतिहास रहा हो, वहां इस बार चुनावों के दौरान बढ़ती जागरूकता और कई चरणों में होने वाले चुनाव दरअसल प्रबंधन के कसाव की ओर संकेत करते हैं। पूरा शहर मुस्तैद पुलिसकर्मियों से अटा पड़ा दिखता है। यह अलग बात है कि इस हालत में भी यहां ट्रैफिक सिग्नल का उल्लंघन धड़ल्ले से होता है। हालांकि चालान भी उतने ही कटते दिखाई देते हैं।

पश्चिम बंगाल की विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 294 सदस्यों की है, जिनमें से फिलहाल 184 सीटों पर ममता बनर्जी का कब्जा है। इसके अलावा, कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ कर 42 सीटों पर कामयाबी हासिल की थी। आज भले ही हर कोई भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी का रोना रो रहा है। मगर कहने को आम आदमी सरकार के खिलाफ कोई खास शिकायत करता नहीं दिखता है। लेकिन वोट के नाम पर उसकी प्राथमिकता चुप्पी है। कम से कम ममता बनर्जी का खुला विरोध तो बिल्कुल नहीं है।

अहम नतीजे लालगढ़ जैसे उन नक्सल-प्रभावित इलाकों से आएंगे, जिन्होंने पिछले चुनावों में वाम मोर्चे की सरकार के खिलाफ ममता बनर्जी का साथ दिया था, इस वादे पर भरोसा करके कि ममता नक्सली समूहों के मुताबिक राज्य की दशा और दिशा बदलेंगी। लेकिन सत्ता में आते ही ममता ने माओवादियों के प्रति जिस तरह के बयान दिए, जैसी बेरुखी दिखाई, उसने नक्सली समूहों को निराश किया। अब देखना यह है कि इन चुनावों में माओवादी और उनके समर्थकों के बीच ममता को लेकर फैली निराशा का हश्र क्या होता है।

आज हालत यह है कि अपनी पार्टी बनाने से पहले के अपने राजनीतिक प्रशिक्षण के कारण ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बनने पर आत्ममुग्ध दिखती हैं। इसकी मिसाल उनके शासनकाल में बनाए गए प्रतीक्षालयों में सजी उनकी तस्वीरें हैं। होर्डिंग्स की भी कोई कमी नहीं। सरकारी योजनाओं को कैसे अपने नाम करना है, यह भी उन्हें बखूबी मालूम है। लिहाजा अंत्योदय के तहत दिए जाने वाले दो रुपए किलो चावल और साढ़े तीन रुपए किलो आटे का श्रेय वे खुद ही बटोर जाती हैं।

शहरी इलाकों में कई अलग-अलग कारणों से खड़े होने वाले मुद्दों का सिला तो आपको देना ही पड़ता है, फिर चाहे वह उपभोक्ता वस्तुओं की महंगाई हो या पेट्रोल-डीजल की घटती-बढ़ती कीमतें। लेकिन बंगाल के दूरदराज के इलाकों में ऐसी कोई शिकायत शायद ही किसी के पास हो। अगर होगी भी तो वह मुखर नहीं है। प्रचार के मामले में कांग्रेस और वामपंथी दल थोड़ा आगे दिखाई देते हैं। लेकिन नीले और सफेद रंग में रंग देने के बाद शहर तृणमूल के प्रचार का ही ध्वजवाहक बना हुआ है। यह रंग इतना प्रभावी और प्रचुर है कि इसके बाद कोई भी प्रचार बौना ही लगता है।

एक समय कांग्रेस और वामपंथी कभी एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। आज संग-संग हैं। इतना ही नहीं एक-दूसरे के गीत भी गा रहे हैं। हालांकि दोनों दलों के इतिहास को देखते हुए इस बात पर हैरत ही होती है कि ये आज इस चुनाव को ‘विकास और विनाश’ की लड़ाई बना कर लड़ रहे हैं। यह सच है कि कांग्रेस ने जिस तरह से करीब साढ़े तीन दशक के कार्यकाल तक वामपंथी दलों के आगे घुटने टेके थे, उससे इसका उबर पाना आसान नहीं था। लेकिन ममता ने यह भी कर दिखाया। उन्होंने न सिर्फ इतिहास के दो प्रबल शत्रुओं को मजबूत कर दिया, बल्कि पिछले चुनाव में कांग्रेस को सहारा देकर 42 के आंकड़े तक भी पहुंचा दिया। अब ताजा चुनावों के बाद नतीजों में देखना होगा कि क्या कांग्रेस इस आंकड़े को पचा कर इसमें कुछ सुधार भी कर पाती है!

कांग्रेस की 2014 के लोकसभा चुनाव में तो स्थिति दयनीय थी और वामपंथी दलों की तो जैसे कमर ही टूट गई थी। वैसी स्थिति में ममता बनर्जी ने लोकसभा की 34 सीटों पर कब्जा किया और वामपंथियों को महज दो सीट पर ही समेट दिया। जबकि अप्रत्याशित तौर पर भारतीय जनता पार्टी ने दो सीटों पर अपनी जीत दर्ज की। ये दो सीट और उसके बाद एक विधानसभा चुनाव में हुई जीत ने भाजपा की उम्मीदें बुलंद कर दीं। लेकिन 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो स्थिति थी, उसमें अब ग्रहण लग चुका है। खासतौर पर दिल्ली और बिहार की पराजय ने यह साबित कर दिया था कि भाजपा के अजेय होने की धारणा आधारहीन ही थी। भाजपा का सारा दारोमदार बंगाल में पिछले कुछ अरसे से बढ़ी राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों पर है। संघ ने पिछले एक अरसे में बंगाल के दूरदराज इलाकों में भगवा ध्वज फहरा कर शाखा का आयोजन शुरू किया है।

इधर चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राहुल सिन्हा की जगह पर दिलीप घोष को पार्टी की कमान देकर दांव खेला है, जिसका परिणाम हासिल होने की उम्मीद भी की जा रही है। उधर तृणमूल की कमान सीधे दीदी के हाथ में है। कांग्रेस के पास अधीर रंजन चौधरी की सूरत में एक प्रभावशाली नेता हैं लेकिन चौधरी अपना प्रभाव क्षेत्र मुर्शिदाबाद से कितना बाहर ले जा पाते हैं, यह देखना होगा। वाम मोर्चे का सबसे अहम घटक मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) का सारा दारोमदार सूर्यकांत मिश्र के कंधों पर है। पार्टी के पास पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सूरत में एक दिग्गज हैं, लेकिन बुद्धदेव इस चुनाव में अभी तक एकाध बार ही प्रचार को निकले हैं।

इन सबके अलावा यहां कुछ छोटे खिलाड़ी भी हैं जो यहां आकर बसे मारवाड़ी, गुजराती और भोजपुरी समुदाय के लोगों पर नजर रख कर अपना अभियान चलाते हैं। आम लोगों से बातचीत में यह तो तय है कि उनके मन में सरकार को लेकर कुछ नाराजगी है फिर, वह चाहे तोलाबाजी को लेकर हो या फिर भ्रष्टाचार को। तोलाबाजी, यहां की स्थानीय जुबान में जबरन वसूली को कहते हैं। इसका शिकार ठेले वालों से लेकर बड़े व्यापारी तक बन जाते हैं। इसके अलावा सरकारी तंत्र में फैले भ्रष्टाचार की भी पूरी समस्या है। शहर के विस्तार में बहुमंजिला इमारतें अपनी कहानी खुद कह रही हैं क्योंकि ये भी नोएडा और गुड़गांव की तर्ज पर खाली ही पड़ी हैं। कारोबार में आई मंदी के कारण लोगों की नाराजगी आखिरकार सरकार को ही झेलनी है। बैटरी से चलने वाली टोटो सेवा को लेकर शहरवासी उत्साहित हैं, हालांकि इसी मुद्दे पर रिक्शा चालकों की सरकार से नाराजगी भी दिखाई देती है।

कोलकाता साफ-सुथरा शहर है। अंदरूनी सड़कों को छोड़ दें तो शहर का आंतरिक ढांचा ममता की पसंद की स्ट्रीट लाइट के कारण चमचम दिखाई देता है। कुल मिलाकर ममता को वही लाभ दिखाई दे रहा है जो मजबूत विकल्प न होने के कारण किसी भी सत्तारूढ़ दल को मिलता है। ऐसा लगता नहीं है कि वामपंथी दल और कांग्रेस सरकार के खिलाफ जो भी नाराजगी है उसे भुना कर खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर पाए। भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा है जिसका अपना-अपना पाठ है। जहां तक विकास का सवाल है तो उसका एक मजबूत ढांचा खड़ा करने की कोशिश तो बंगाल में साफ ही दिखाई दे रही है। देखना सिर्फ यही है कि लोगों में अलग-अलग कारणों से तृणमूल के खिलाफ जो रोष है, वह पार्टी के मौजूदा 184 के आंकड़े पर कितना असर डालता है।

क्या रहा पिछला जनादेश

विधानसभा चुनाव 2011
2011 में हुए विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 184 सीटें जीत कर बहुमत हासिल किया। तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस और एक वामपंथी दल एसयूसीआइ के साथ हाथ मिलाया था। कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं और एसयूसीआइ को एक। उन चुनावों में माकपा की अगुआई वाले वाममोर्चा को महज 62 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। उनमें से 40 सीटें माकपा को मिली थीं। उसके बाद फारवर्ड ब्लाक को 11, आरएसपी को सात, भाजपा को दो, समाजवादी पार्टी को एक और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी (पीसी) को एक सीट मिली थी। दार्जिलिंग पवर्तीय क्षेत्र में गोरखा जनमुक्ति के उम्मीदवार तीन सीटों-दार्जिलिंग, कालिम्पोंग और कर्सियांग पर विजयी रहे थे जबकि दो सीटें निर्दलियों के खाते में गई थीं।

लोकसभा चुनाव 2014
प. बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। भाजपा ने लगभग 18 फीसद वोट हासिल करते हुए दो सीटें-आसनसोल व दार्जिलिंग जीत लीं। इन चुनावों में सबसे ज्यादा फायदा तृणमूल कांग्रेस को हुआ और उसकी सीटें 19 से बढ़ कर 34 तक पहुंच गर्इं। दूसरी ओर, वाममोर्चा 23 फीसद वोटों के साथ महज दो सीटों तक सिमट गया। कांग्रेस को भी दो सीटों का नुकसान हुआ और वह 9.7 फीसद वोट के साथ चार सीटें ही जीत सकी।

ममता बनर्जी : कामयाब होने की जिद

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई चुनौतियों का सामना किया है। गठन के महज तेरह सालों के भीतर अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को सड़क से सचिवालय तक पहुंचाने वालीं ममता बनर्जी को जुझारूपन अपने पिता प्रमिलेश्वर बनर्जी से विरासत में मिला है। कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद की नेता के तौर पर करियर की शुरुआत करने वालीं ममता ने अपने जीवन व करियर में तमाम मुकाम अपने दम पर हासिल किए। जिद उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा रहा है। जिद, जुझारूपन और शोषितों के हक की लड़ाई का आह्वान कर उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। सादगी ममता के जीवन का हिस्सा रही है। सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल से उनका नाता कभी नहीं टूटा। निजी या सार्वजनिक जीवन में उनके रहन-सहन और आचरण पर अब तक सवाल नहीं उठे हैं। सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों के हक में जमीन अधिग्रहण विरोधी लड़ाई के जरिए गरीबों की मसीहा के तौर पर उभरीं ममता ने 2011 के विधानसभा चुनावों में वामपंथियों के लगभग साढ़े तीन दशक लंबे शासन का अंत कर अपनी मंजिल हासिल कर ही ली। अब उनके सामने उस सत्ता को बरकरार रखने की चुनौती है।

सूर्यकांत मिश्र : माकपा की सेहत के डॉक्टर

वाममोर्चा की साख बचाने की जिम्मेदारी सूर्यकांत मिश्र के कंधों पर है। वही मोर्चा के सितारा प्रचारक भी हैं। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद से ही उनकी भूमिका बदल गई है। पेशे से डॉक्टर सूर्यकांत को माकपा के पूर्व प्रदेश सचिव विमान बोस सत्तर के दशक में राजनीति में ले आए थे। अस्सी के दशक के आखिर में उन्हें पश्चिम मेदिनीपुर जिला परिषद का अध्यक्ष बनाया गया था। बाद में वे स्वास्थ्य व पंचायत मंत्री बने और 2011 तक इसी पद पर रहे। साल 2011 के चुनावों तक लो प्रोफाइल में रहने वाले इस मृदुभाषी नेता ने तब तमाम प्रमुख नेताओं के चुनाव हार जाने के बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता का पद संभाला और उसके बाद उनका पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया। अबकी चुनावों में भी उनका आक्रामक रुख जस का तस है। पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य उन्हें अपनी सरकार का एक बेशकीमती नगीना मानते थे। एमके पंधे की मौत के बाद उन्हें माकपा के पोलितब्यूरो का सदस्य बनाया गया और पिछले साल प्रदेश माकपा का महासचिव।

अधीर रंजन चौधरी : कांग्रेस के ‘बाहुबली’

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी पर अक्सर बाहुबली होने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन बंगाल में कांग्रेस अगर अब भी सत्ता की दौड़ में है तो उसका श्रेय काफी हद तक अधीर को ही जाता है। तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वाममोर्चा के साथ बने गठजोड़ के मुख्य वास्तुकार वही हैं। ममता बनर्जी के कट्टर विरोधी अधीर की मुर्शिदाबाद जिले में तूती बोलती है। गंगा के उस पार बसा मालदा अगर एबीए गनी खान चौधरी के कारण कांग्रेस का गढ़ बना तो इस पार बसा मुर्शिदाबाद अधीर के कारण। लंबे अरसे तक मुर्शिदाबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहे अधीर को दो साल पहले प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई थी। स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर राजनीति के मैदान में उतरे अधीर 1996 में पहली बार विधायक बने और उसके तीन साल बाद सांसद। उन्होंने जिले की बरहमपुर लोकसभा सीट से चुनाव तब लड़ा था जब 1951 के बाद वहां कांग्रेस कभी नहीं जीती थी। यूपीए सरकार में वे कुछ समय तक रेल राज्य मंत्री भी रहे। अधीर का दावा है कि कांग्रेस-वाम गठजोड़ को इस बार सरकार बनाने लायक बहुमत मिल जाएगा।

दिलीप घोष : भाजपा का जयघोष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए दिलीप घोष ने पिछले साल दिसंबर में प्रदेश भाजपा की कमान ऐसे मुश्किल दौर में संभाली जब राज्य में लोकसभा चुनावों के वक्त सिर चढ़ कर बोलने वाले मोदी का जादू फीका पड़ चुका था और पार्टी में अंदरूनी गुटबाजी चरम पर थी। पिछले साल हुए नगर निगम चुनावों में पार्टी की कलह खुल कर सामने आ गई थी और टिकट के दावेदार सड़क पर ही एक-दूसरे से निपटने लगे थे। विधानसभा चुनावों से पहले केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल में भाजपा को एकजुट कर उसे सांगठनिक तौर पर मजबूत करने की जिम्मेदारी घोष को सौंपी। भाजपा की कमान संभालने के बाद केंद्रीय नेतृत्व के वरदहस्त का फायदा उठाते हुए उन्होंने संगठन में व्यापक फेरदबदल किया और प्रदेश से जिलास्तर तक तमाम पदाधिकारियों को बदल डाला। घोष की कोशिश अब पार्टी को लोकसभा चुनावों की कामयाबी के स्तर तक ले जाने की है जब भाजपा ने राजनीतिक पंडितों को हैरत में डालते हुए 17 फीसद वोट हासिल करते हुए दो सीटें जीत ली थीं। खुद घोष अबकी पूर्व मेदिनीपुर जिले के खड़गपुर सीट से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उनका दावा है कि राज्य में अगली सरकार के गठन में भाजपा की भूमिका निर्णायक होगी।

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