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प. बंगाल में तीसरे चरण का चुनाव : बुद्धिजीवियों व माओवादियों ने छोड़ा ममता का साथ

पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने इलाके की 218 में से 191 सीटें जीत ली थीं।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (पीटीआई फाइल फोटो)

पश्चिम बंगाल में तीसरे चरण के वोट पड़ने के साथ चुनावी सरगर्मी चरम पर है। सत्ता के समीकरणों को लेकर राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं, और ग्रामीण इलाकों से रूझान तलाश रहे हैं। सूबे में ग्रामीण इलाके ही हमेशा सत्ता की चाबी रहे हैं। वाममोर्चा सरकार अगर 34 सालों तक सत्ता में बनी रहे तो उसके पीछे ग्रामीण वोटरों की अहम भूमिका थी। इस बार भी अपवाद नहीं है। इन इलाकों में लोगों को सारदा चिटफंड घोटाले और तृणमूल कांग्रेस नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे से कोई मतलब नहीं है। उनके लिए ममता बनर्जी सरकार की ओर से शुरू की गई सबूजी साथी, खाद्यसाथी और कन्याश्री व युवाश्री जैसी योजनाएं ही समर्थन का पैमाना हैं।

ममता बनर्जी भी ग्रामीण वोटरों की इस नब्ज को अच्छी तरह पहचान चुकी हैं। यही वजह है कि उन्होंने चुनाव अभियान के दौरान ग्रामीण इलाकों पर खास ध्यान दिया है और तमाम योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार करती रही है। ग्रामीण इलाकों को ध्यान में रखते हुए ही ममता ने अपने कार्यकाल के आखिरी दो सालों के दौरान तमाम ऐसी योजनाएं शुरू कीं जो वोटरों पर पकड़ मजबूत बना सके। इनमें कन्याश्री योजना के तहत युवतियों को सालाना 25 हजार रुपए देना, सबूज साथी योजना के तहत 40 लाख छात्र-छात्राओं को मुफ्त साइकिलें, खाद्यसाथी के तहत दो रुपए किलो चावल और गेहूं मुहैया कराना और बेरोजगारों को वित्तीय सहायता दने के लिए शुरू युवाश्री योजना शामिल है। इसके साथ ही अपने अभियान के दौरान ममता बेहद सुनियोजित तरीके से इन योजनाओं का प्रचार भी करती रही हैं। अपनी रैलियों में वे वित्तीय तंगी के बावजूद सरकार की ओर से किए गए विकास कार्यों को गिनाती रही हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जिस सारदा चिटफंड घोटाले का ग्रामीण इलाकों में असर हो सकता था उसे विपक्ष ठीक से भुना नहीं सका। चिटफंड कंपनियों की चपेट में आने वाले ज्यादातर परिवार ग्रामीण इलाकों के हैं। लेकिन विपक्ष इसे चुनावों में बड़ा मुद्दा नहीं बना सका। जबकि ममता ने अपने रणनीतिक कौशल का परिचय देते हुए इन कंपनियों को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी पूर्व वाममोर्चा सरकार पर डाल दी। ममता की दलील रही है कि उनकी सरकार ने ही चिटफंड कंपनियों पर नकेल कसी और हजारों निवेशकों के पैसे लौटाए। चुनाव अभियान के दौरान विपक्ष का पूरा जोर नारदा न्यूज स्टिंग वीडियो के बहाने भ्रष्टाचार और कोलकाता में हुए फ्लाईओवर हादसे पर रहा। लेकिन ग्रामीण इलाकों में ये मुद्दे खास असर नहीं डाल सके हैं।

राज्य के ग्रामीण इलाकों में तृणमूल कांग्रेस के वोटों का हिस्सा 43 फीसद है जबकि शहरी इलाकों में यह 54 फीसद है। खासकर दक्षिण बंगाल के ग्रामीण वोटरों ने पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का खुल कर समर्थन किया था और तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन ने इलाके की 218 में से 191 सीटें जीत ली थीं। कांग्रेस के अबकी वाममोर्चा के साथ होने के बावजूद ममता ने अपने ग्रामीण वोट बैंक को बनाए रखने का प्रयास किया है। इन वोटरों में अल्पसंख्यक तबके की भी खासी आबादी है। इस तबके ने पिछली बार तृणमूल का समर्थन किया था और ममता को इस बार भी उनका समर्थन पाने की उम्मीद है।

बुद्धिजीवियों व माओवादियों ने छोड़ा ममता का साथ

पिछले साल विधानसभा चुनावों में बदलाव के नारे की लहर में राज्य के बुद्धिजीवी तबके के ज्यादातर लोग ममता बनर्जी के साथ थे। यहां तक कि जंगलमहल के नाम से कुख्यात राज्य के माओवादी असर वाले इलाकों में भी माओवादियों ने वाममोर्चा को सत्ता से हटाने की अपील कर परोक्ष तौर पर चुनाव जीतने में तृणमूल कांग्रेस की सहायता की थी। लेकिन पांच साल बाद अबकी नजारा एकदम बदला हुआ है। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अब भी ममता के साथ जरूर है। लेकिन यह वही तबका है जिसे तृणमूल कांग्रेस के समर्थन के एवज में मलाईदार पद मिले हैं। कोई सांसद बन कर दिल्ली पहुंच चुका है तो कोई मंत्री बन कर राज्य सचिवालय में। बाकी लोगों का ममता सरकार की नीतियों से मोहभंग हो चुका है। बीते चुनावों में ममता पर मेहरबान माओवादी भी उनके खिलाफ हैं।

पिछले चुनावों से पहले खासकर नंदीग्राम और सिंगुर में जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के शुरुआती दौर में ही यह तबका खुल कर ममता के समर्थन में आ गया था। बीते विधानसभा चुनावों में तो इस तबके ने ममता की बदलाव की मांग का खुल कर समर्थन किया था और वाममोर्चा सरकार के खिलाफ लगातार रैलियां की थी। उनमें जानी-मानी लेखिका महाश्वेता देवी समेत कई नाम थे। लेकिन अब ममता को समर्थन के सवाल पर यह तबका दो-फाड़ हो चुका है। महाश्वेता देवी भी अक्सर ममता बनर्जी सरकार की नीतियों की मुखर आलोचना करती रही हैं। सरकार से मतभेदों के कारण ही उन्होंने पश्चिम बंग बांग्ला अकादमी के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था। उम्र बढ़ने की वजह से वे अबकी सक्रिय नहीं हैं। लेकिन उन्होंने पहले की तरह ममता या उनकी पार्टी के पक्ष में कोई बयान भी नहीं जारी किया है।

समीर आईच, सुनंद सान्याल, गायिका इंद्राणी सेन और रंगकर्मी विभास चक्रवर्ती जैसे कई नाम अब ममता से दूर हो चुके हैं। इंद्राणी कहती हैं कि पिछली बार हमने ममता का समर्थन किया था क्योंकि बदलाव वक्त की मांग थी। लेकिन सत्ता में आने के बाद इस सरकार ने भी वही किया जो पिछली सरकार कर रही थी। इसलिए हमने ममता से नाता तोड़ लिया है। ममता के कार्टून की वजह से जेल जाने वाले जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र कहते हैं, अब बुद्धिजीवी तबके में विभाजन की लकीरें साफ नजर आ रही हैं। अब महज वही लोग ममता के साथ हैं जिनको समर्थन के एवज में मलाई मिली है। वहीं माओवादियों का सवाल है कि अगर ममता के दावों के मुताबिक जंगलमहल में शांति बहाल हो चुकी है तो यहां इतनी बड़ी तादात में सुरक्षा बलों की तैनाती की क्या जरूरत है? उनका आरोप है कि यह सरकार भी पूर्व बुद्धदेव सरकार की नीतियों पर ही चल रही है।

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