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बंगाल चुनावः जो असनसोल कहलाता है ‘भाईचारे का शहर’, वहां यही भाव नदारद!

सोमवार को मतदान है। इससे पहले, शहर के प्रवेश द्वार पर भाईचारगी का बैनर है। मन के भीतर समाई हैं 2018 को रामनवमी के दिन हुई हिंसा की कड़वी यादें।

Author Translated By अजय शुक्ला आसनसोल | Updated: April 25, 2021 1:43 PM
Asansol, West Bengal, National Newsआसनसोल शहर का नीले रंग का प्रवेश द्वार। (एक्सप्रेस फोटोः दीपांकर घोष)

थोड़ा-सा बंगाली। थोड़ा-सा ‘हिन्दुस्तानी’ और थोड़ा-सा मुसलमानी। यह है आसनसोल की डेमोग्रफी। शहर के बाहर ही नीले रंग का विशाल, खूबसूरत प्रवेशद्वारः

वेलकम टु आसनसोल

द सिटी ऑफ ब्रदरहुड

ब्रदरहुड यानी भाईचारा। शहर में आज यही चीज़ नदारद है। अप्रैल 2018 तक सब ठीक था। फिर, आई उस साल की रामनवमी। सांप्रदायिक दंगा हुआ। दो जानें गईं। कई घर फूंके गए। और शहर अलग-अलग खानों में बंट गया। बीसी रॉय रोड के पास रहने वाले अशोक कुमार मंडल उस हिंसा में बुरी तरह प्रभावित हुए थे। कहते हैः उस साल रामनवमी पर हुआ आयोजन बड़ा था। हमको पता भी था कि यह उग्र भी होगा। बाहरी लोग भी आए थे। लेकिन फिर जो हुआ। जो मैंने देखा, उसको अनहुआ नहीं कर सकता। देखते-देखते हमारा पुश्तैनी घर फूंक दिया गया।

मंडल कार-मिस्त्री हैं। कहते हैः मैंने दोनों समुदायों के बीच नफरत देखी। अब हम फिर साथ रहने लगे हैं। साथ काम भी करते हैं। हंसी-मजाक भी हो जाता है। इसके बावजूद मैं चाहता हूं कि सरकार ऐसी बने कि जब दोबारा हिंसा भड़के तो वह मेरे साथ खड़ी हो।

यूं तो भाजपा के बाबुल सुप्रियो यहां से 2014 में ही टीएमसी की डोला सेन को हराकर एमपी बन चुके थे। लेकिन, 2018 की हिंसा के बाद मतदाता का मूड बहुत बदल गया। 2016 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने आसनसोल सिटी से दो सीटें निकाली थीं। फिर 2018 की हिंसा के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव हुए। और, इस बार बाबुल सुप्रियो ने सातों विधानसभा क्षेत्रों में टीएमसी का सूपड़ा साफ कर दिया। बाबुल की जीत का फासला (तीन लाख) तीन गुना हो गया।

मोहम्मद शब्बीर शहर के चांदमारी मोहल्ले में रहते हैं। इस इलाके ने भी 2018 में हिंसा देखी थी। शब्बीर को नहीं लगता कि इस बार का चुनाव प्रचार किसी तरह 2019 वाले से भिन्न है। तब भी भाजपा हिंसा के मुद्दे को ले आती थी। वही काम वह इस बार कर रही है। भाजपा कार्यकर्ता हमारे सामने ही घर-घर जाकर ऐलान करते फिरते हैं कि हिन्दुओं की सरकार आएगी।

शब्बीर कहते हैं कि वे डरे हुए हैं। समाज के अंदर इस बार जहर की मात्रा पहले से बढ़ गई है। उन्हें भी वह मंजर याद है जब मुसलमानों के घर और दुकानें जला दी गई थीं।

सोमवार को आसनसोल में भी मतदान है। शहर देख कर लगता है कि मानो भाजपा और टीएमसी में झंडों की जंग चल रही हो। दोनों दल ज्यादा से ज्यादा जगह अपने पोस्टरों से पाट देना चाहते हैं। इस बार भाजपा ने कई जगह ऐसे झंडे लगाए हैं जिनमें कमल निशान की बजाए ओम लिखा है।

यह ओम शब्द क्यों? एक भाजपा कार्यकर्ता समझाता है- हम वह चिह्न लगा रहे हैं, जिस पर हम विश्वास करते हैं। ओम से भला क्या दिक्कत? समस्या टीएमसी को होगी। अब जनता मुस्लिम तुष्टिकरण पार्टी को वोट न देगी।

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