पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर तेज होती सियासी जंग के बीच प्रदेश में ‘चेहरे बनाम संगठन’ पर बहस शुरू हो गई। सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। जबकि भाजपा के तरफ से कोई चेहरा घोषित नहीं किया गया। वहीं पश्चिम बंगाल में लंबे समय से स्थानीय नेता का चेहरा ही राजनीति के केंद्र में रहा है।
ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के तरफ से सवाल उठाए जा रहे हैं कि ममता बनर्जी के सामने भाजपा के तरफ किसका चेहरा है। भाजपा के अलग-अलग नेता राज्य में मुख्यमंत्री बनने का दावा करते हैं, लेकिन चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे रखकर लड़ रहे हैं। हालांकि भाजपा का दावा है कि अन्य राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी बिना चेहरा बताए चुनावी मैदान में हैं। स्थानीय नेताओं का कहना है कि सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के जरिए ममता बनर्जी ने वाम सरकार के खिलाफ जन समर्थन हासिल कर खुद को मजबूत चेहरा बनाया। उसी के दम पर साल 2011 से लगातार वह सत्ता में हैं।
‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देकर लोगों के बीच ‘दीदी’ की मजबूत छवि बनाई। वहीं राज्य में नेता विपक्ष व मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार माने जा रहे सुबेंदु अधिकारी का प्रभाव मुख्य रूप से पूर्वी मेदिनीपुर और आसपास के इलाकों तक सीमित माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता हासिल करने के लिए उत्तर बंगाल, आदिवासी इलाकों और शहरी मतदाताओं में के साथ पूरे प्रदेश में मजबूत पकड़ होनी जरूरी है। जो सुबेंदु अधिकारी के पास नहीं दिखता।
इसके उलट, ममता बनर्जी का जनाधार राज्यव्यापी है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी वोटरों तक, उनकी सीधी पकड़ मानी जाती है। तृणमूल कांग्रेस प्रवक्ता डा. ऋजु दत्ता ने कहा कि प्रदेश के सभी 294 सीटों पर ममता बनर्जी का चेहरा ही चुनाव में है। जबकि भाजपा में गृहमंत्री अमित शाह ही नहीं बता पाते कि उनके तरफ से मुख्यमंत्री कौन होगा। कभी भाजपा नेता मिथुन चक्रवर्ती मुख्यमंत्री बनने का दावा करते हैं तो कभी कोई और। वहीं भाजपा सांसद जगन्नाथ सरकार का कहना हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय नेता हैं। बंगाल के लोग उन्हें पसंद करते हैं। उनके साथ आना चाहते हैं। वहीं सुबेंदु अधिकारी की पहचान भी पूरे बंगाल में है। वह नंदीग्राम आंदोलन से खड़े हुए, उनका कद ममता बनर्जी के बराबर हैं।
ज्योति बसु ने ठुकरा दिया था प्रधानमंत्री का पद
पश्चिम बंगाल के बड़े चेहरों में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के दिग्गज नेता ज्योति बसु ने साल 1996 में प्रधानमंत्री बनने का मौका ठुकरा दिया था। साल 1977 से 2000 तक वह प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनका नाम भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्रियों में शामिल है। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भूमि सुधार ‘आपरेशन बर्गा’ के जरिए किसानों को अधिकार दिलाया।
साथ ही पंचायती राज को लागू कर गांव स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत किया। उनका कद प्रदेश स्तर की राजनीति के साथ राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा माना जाता था। इसके अलावा कांग्रेस के बड़े नेता रहे सिद्धार्थ शंकर राय भी प्रदेश के बड़े चेहरों में शामिल हैं। वह साल 1972-1977 के दौरान मुख्यमंत्री रहे। उनका दौर राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा (विशेषकर नक्सल आंदोलन) से भरा रहा। उन्होंने कानून-व्यवस्था को सख्ती से नियंत्रित करने की नीति अपनाई। जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से साल 2000 से 2011 तक मुख्यमंत्री रहे बुद्धदेब भट्टाचार्जी ने राज्य में औद्योगीकरण पर जोर दिया। उन्होंने सिंगूर (टाटा नैनो प्रोजेक्ट) और नंदीग्राम में उद्योग लगाने की कोशिश की। इसके अलावा प्रदेश में आइटी सेक्टर और निवेश लाने का प्रयास भी किया।
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पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले में तृणमूल कांग्रेस अपनी पुरानी जमीन तलाशने में जुटी हुई है। वहीं भाजपा पिछले चुनाव में जीती सीट के साथ दो अन्य सीटों के लिए मशक्कत कर रही है। दोनों दलों ने इन क्षेत्रों में अपने बड़े नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी हुई है। इस जिले में कुल नौ विधानसभा है। इसमें मेकलीगंज, माथाभांगा, कूच बिहार उत्तर, सीतलकुची और सिताई विधानसभा अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। कूचबिहार दक्षिण, दिनहाटा, नटबारी और तुफानगंज सामान्य सीट है। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
