जखनी की मेड़बंदी विधि से महाराष्ट्र में भी जलसंरक्षण की पहल, संस्थाएं बोलीं- पौधरोपण से बचाएंगे वर्षा भूजल

मेड़बंदी से ऊसर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है मेड़बंदी से खेत में वर्षा जल रुकता है भूजल संचयन होता है, भूजल स्तर बढ़ता है, भूमि के कटाव के कारण मृदा के पोषक तत्व खेत में ही बने रहते हैं, जो पैदावार के लिए आवश्यक है।

Water conservation, water management
समारोह में बोलते जखनी जल मॉडल को पेश करने वाले जलयोद्धा उमा शंकर पांडेय।

जलसंरक्षण और जल बचाने के लिए आज दुनिया भर में तमाम तरह के प्रयोग किए जा रहे हैं। तमाम वैज्ञानिक संस्थाएं इस दिशा में शोध करके पानी बचाने की तरकीबें खोज रही हैं, हालांकि वैज्ञानिक प्रयासों का नतीजा यह है कि हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद कोई बड़ी सफलता नहीं मिली। दूसरी तरफ भारत के गांवों में आज भी लाखों लोग पुरखों की बताई विधि को अपनाकर न केवल जलसंरक्षण कर रहे हैं, बल्कि उससे ऊसर और रेगिस्तानी भूमि को भी हरा-भरा बनाकर प्राकृतिक रूप से अनाज और साग-सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के बांदा जिले के जखनी गांव से जलयोद्धा उमाशंकर पांडेय के प्रयासों से शुरू हुआ जल आंदोलन अब महाराष्ट्र तक पहुंच गया है। खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़ विधि से जल संरक्षण विधि की सफलता से प्रभावित होकर महाराष्ट्र में महा एनजीओ संगठन के शेखर मुंदड़ा और उनके सहयोगियों ने 15 अगस्त से 2 अक्टूबर तक सेवा संकल्प वर्षा जल पर्व मना रहे हैं। इसकी शुरुआत पद्मविभूषण आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर जी के आशीर्वचन से हुआ।

इस दौरान आजादी के अमृत महोत्सव के तहत 15 अगस्त से वृहद स्तर पर पौधरोपण की शुरुआत की गई। इस दौरान शेखर मुंदड़ा ने कहा कि महा एनजीओ फेडरेशन में सैकड़ों संस्थाएं सदस्य के रूप में हैं। वे सब मिलकर इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। संस्थाओं ने कहा कि पौधरोपण करके वर्षा भूजल को बचाएंगे। लोगों ने कहा कि पिछले 25 वर्ष के प्रयासों से सिद्ध हो चुका और समुदाय के आधार पर होने वाला यह बड़ा जन अभियान है। सबसे खास बात यह है कि इसे बिना किसी सरकारी सहायता के किया गया है।

जखनी विधि में अपनी सुविधानुसार ऐसे पेड़ों को लगाया जा सकता है, जिनके पत्तों से जैविक खाद बने, औषधीय बने। जिनसे अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होगी, जैसे बेल सहजन सागोन करौंदा अमरूद नींबू बेर कटहल शरीफा अथवा क्षेत्र की जलवायु के अनुसार दूसरे पेड़ भी लगा सकते हैं।

खेत की मेड़ों के ऊपर अरहर दाल मूंग अलसी सरसों उर्द ज्वार सन जैसी फसलें पैदा कर सकते हैं, जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है। मेड़बंदी से ऊसर भूमि को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है मेड़बंदी से खेत में वर्षा जल रुकता है भूजल संचयन होता है, भूजल स्तर बढ़ता है, भूमि के कटाव के कारण मृदा के पोषक तत्व खेत में ही बने रहते हैं, जो पैदावार के लिए आवश्यक है।

नमी संरक्षण के कारण फसल सड़ने से खेत को परंपरागत जैविक ऊर्जा प्राप्त होती है। पशुओं को मेड़बंदी से शुद्ध चारा मिलता है। भोजन प्राप्त होता है देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 जून 2019 को देशभर के प्रधानों को पत्र लिखा था कि मेड़बंदी कर खेतों में वर्षा बूंदों को रोकें।

यूपी में ऐसा प्रयोग जल योद्धा उमा शंकर पांडेय के नेतृत्व में भारत के पहले जलग्राम जखनी के किसानों ने करके दिखाया। इसकी चर्चा भारत सरकार तक पहुंची और राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस प्रयोग को देश के लिए एक बड़ा मॉडल बताया। महाराष्ट्र में महा एनजीओ संगठन के शेखर मुंदड़ा और उनके सहयोगियों के 15 अगस्त से 2 अक्टूबर तक सेवा संकल्प वर्षा जल पर्व मनाने पर खुशी जताते हुए उमा शंकर पांडेय ने कहा कि यह बेहद खुशी की बात है कि यह योजना मॉडल महाराष्ट्र तक पहुंच गई।

इससे 27 वर्षों का उनका संघर्ष सफल हुआ। उन्होंने महाराष्ट्र के गांवों में जल बचाने के लिए महा एनजीओ संगठन के शेखर मुंदड़ा और उनके सहयोगियों को बधाई दी और उम्मीद जताई कि राज्य के अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लोग इस मॉडल को अपनाकर अपना और अपने समाज के विकास में मददगार बनेंगे।

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