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मेड़बंदी से सूखी धरती का गला तर करने की अनोखी मिसाल, बुंदेलखंड का जखनी गांव पानी से हुआ लबालब

वे लोग वैज्ञानिक नहीं हैं, न ही किसी सरकार या संस्था से अनुदान लिए हैं और न ही जल संरक्षण के किसी विशेष शोध समूह (Research Team) का ही हिस्सा हैं, लेकिन खुद के प्रयासों से उन्होंने उस क्षेत्र को हरा-भरा बना दिया, जिसे सिर्फ सूखी, बंजर और पथरीली भूमि के लिए जाना जाता था।

water conservation, save waterजलग्राम के नाम से मशहूर बांदा जिले के जखनी गांव में पानी बचाने के लिए की गई मेड़बंदी (बाएं), जलदूत उमाशंकर पांडेय (ऊपर) और पानी से लबालब जखनी गांव का खेत (नीचे)।

कहते हैं कि बिना पानी के जीवन का अस्तित्व नहीं रह सकता है। पानी यानी जल को ही जीवन बताया गया है। माना जाता है कि शरीर जिन पांच तत्वों के मिलने से बना है, उनमें एक तत्व पानी भी है। हमारी पृथ्वी के तीन हिस्से में पानी भरा है। इतना सब होने पर भी दुनिया भर में लोगों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सरकारें पानी बचाने की अपील कर रही हैं तो वैज्ञानिक पानी का विकल्प खोजने में जुटे हैं। तमाम तरह की मशीनें बनाकर पानी बचाने का जुगाड़ किया जा रहा है। सामाजिक संस्थाएं लोगों को पानी बचाने के प्रति जागरूक कर रही हैं। पानी को लेकर इतने प्रयास भी नाकाफी साबित हो रहे हैं।

दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद के जखनी गांव के कुछ लोगों ने जल संरक्षण की ऐसी तकनीकी विकसित की जो दुनिया के सामने नजीर बन गई। वे लोग वैज्ञानिक नहीं हैं, न ही किसी सरकार या संस्था से अनुदान लिए हैं और न ही जल संरक्षण के किसी विशेष शोध समूह (Research Team) का ही हिस्सा हैं, लेकिन खुद के प्रयासों से उन्होंने वीरों की धरती बुंदेलखंड के उस क्षेत्र को हरा-भरा बना दिया, जिसे सिर्फ सूखी, बंजर और पथरीली भूमि के लिए जाना जाता था। जखनी गांव के उमा शंकर पांडेय और उनकी प्रेरणा से गांव के अन्य लोग स्वयं फावड़ा उठाकर श्रमदान से मेड़बंदी कर बारिश के पानी को रोके। इस देसी तकनीकी ने ऐसा कमाल दिखाया कि सूखा पड़ा गांव जलदार गांव में बदल गया। खुद भारत सरकार के नीति आयोग ने इसको संज्ञान में लिया और वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 (Water Management Index 2019) में जखनी गांव को मॉडल गांव (Model village) के तौर पर पेश किया।

इस काम के प्रणेता उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि सन 2005 में दिल्ली में जल और ग्राम विकास को लेकर एक कार्यशाला हुई थी। उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी मौजूद रहे। उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि बिना धन और तकनीकी के खेतों में मेड़ बनाकर जल को रोकें। हालांकि ऐसा कोई कर नहीं रहा था। इस अपील पर उमा शंकर पांडेय स्वयं पहल किए और अपने पांच एकड़ खेत की मेड़ बनाई और पानी को रोकना शुरू किया। उनकी प्रेरणा से गांव के पांच अन्य किसानों ने भी यही किया। फिर 20 किसान आगे बढ़े। देसी तकनीकी का असर दिखा। गांव के हर घर में प्रयोग किया गया और देखते ही देखते मेड़बंदी तकनीक से बचाए गए जल को पाइप लाइन और नालियों के जरिए छोटे-छोटे कुओं तक पहुंचा दिया गया।

भारत सरकार के नीति आयोग ने जलपुरुष उमा शंकर पांडेय के इस प्रयास को देखकर जखनी गांव को भारत का पहला ‘जल-ग्राम’ घोषित किया है। नीति आयोग के जल सलाहकार अविनाश मिश्र का मानना है कि वर्षा जल को भूमि के अंदर संरक्षण करने का जो तरीका जखनी गांव के किसानों नवजवानों ने अपनाया है, उस परंपरागत तरीके से ही भूजल का स्तर बढ़ाया जा सकता है। वे कहते हैं कि गांव के लोगों के सामूहिक प्रयास से ही वर्षा जल की कमी दूर होगी और जल संकट से निपटने का यही सामुदायिक सहभागिता एकमात्र रास्ता है।

भारत सरकार के जल शक्ति सचिव यूपी सिंह ने स्वयं जखनी जल ग्राम का भ्रमण किया था। उन्होंने जखनी गांव के सामुदायिक परंपरागत जल संरक्षण प्रयास को सबसे उचित और उपयुक्त तरीका माना था। उन्होंने मीडिया के सामने कहा भी था कि जल संरक्षण के लिए बगैर सरकारी मदद के समुदायिक प्रयास के जिस तरीके को जखनी गांव के किसानों-नवजवानों ने अपनाया है वही तरीका पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए।

जखनी की तकदीर बदल गई
अपने अनोखे प्रयास से जखनी गांव को जलग्राम का दर्जा दिलाने वालों ने अपने सामने ही गांव की तकदीर बदलते देखी। करीब 17-18 साल पहले तक जो गांव अशिक्षित और बेरोजगारों के गांव के रूप में जाना जाता था, वहां अब प्राइमरी से लेकर इंटर कॉलेज तक के शिक्षा केंद्र चल रहे हैं। अफसर और जनप्रतिनिधि स्वयं गांव की फिजा का ताजा हालात जानने के लिए आने लगे हैं।

बाहर गए युवा अब घर की राह पर चले
जखनी को पानी से लबालब करने और सूखी धरती का गला तर करने में नायक बने जलग्राम समिति के संयोजक उमाशंकर पांडेय के मुताबिक दो दशक पहले यहां सिर्फ बेरोजगारी और अशिक्षा का माहौल था। आज आलम यह है कि जो लोग कमाने के लिए गांव छोड़कर गए थे, वे अब गांव लौटने लगे हैं। ऐसे युवा और नवजवान गांव में न केवल बेहतर माहौल में रोजगार कर रहे हैं, बल्कि अब पानी बचाने और उससे परंपरागत खेती-किसानी करके अच्छा जीवन जी रहे हैं।

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