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दूर तक जाएगी बवाना से निकली बात

हरियाणा की सीमा से जुड़े बवाना (सुरक्षित) विधानसभा सीट के 28 अगस्त को घोषित होने वाले चुनाव नतीजों का असर दिल्ली की राजनीति पर दूरगामी होने वाला है।

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हरियाणा की सीमा से जुड़े बवाना (सुरक्षित) विधानसभा सीट के 28 अगस्त को घोषित होने वाले चुनाव नतीजों का असर दिल्ली की राजनीति पर दूरगामी होने वाला है। बुधवार को करीब तीन लाख मतदाता वाले इस विधानसभा के मतदाताओं ने औसत मतदान किया। फरवरी 2015 के विधानसभा चुनावों में आप को मिली प्रचंड जीत के बाद दिल्ली के हर चुनाव में आम आदमी पार्टी के घटते असर को रोकने के लिए पार्टी प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पूरे इलाके को छान मारा है। उन्हें अपने हरियाणा मूल के होने का लाभ भी मिलने की बात कही जा रही है। सबसे ज्यादा तो उनका ही राजनीतिक भविष्य इस उप चुनाव में दांव पर लगा हुआ है।

अगर भाजपा नहीं जीती तो माना जाएगा कि अप्रैल में हुए निगमों के चुनाव के बाद भाजपा में गिरावट आई है और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की लोकप्रियता से जोड़ा जाएगा। वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव उसके वजूद से जोड़कर देखा जा रहा है। ‘आप’ के टिकट पर 2015 का चुनाव जीते वेद प्रकाश के इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने से उपचुनाव हुआ। वे भाजपा के उम्मीदवार हैं। कांग्रेस और आप ने इसे ही मुद्दा बनाया है। इतना ही नहीं पिछले चुनाव के भाजपा उम्मीदवार गुग्गन सिंह और पूर्व पार्षद नारायण सिंह भाजपा छोड़ आप के प्रचार में लगे। 13 अप्रैल को हुए राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में भाजपा जीती और ‘आप’ उम्मीदवार की जमानत जब्त हुई। कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी। वह चुनाव आप के विधायक जनरैल सिंह के इस्तीफा देने से हुआ था जिन्हें आप ने पंजाब में विधान सभा चुनाव लड़ाया था। उस चुनाव में आप के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा बेवजह सीट छोड़ने का भी बना था। बवाना उप चुनाव में यह भाजपा के खिलाफ बना। संयोग से आप के टिकट पर चुनाव लड़ रहे रामचंद्र बसपा के टिकट पर 2008 में विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी जमानत गंवा चुके हैं। उनके पक्ष में एक ही बात अहम है कि वे उत्तर प्रदेश के मूल निवासी हैं और शाहबाद डेयरी के इलाके से आते हैं जहां बड़ी तादात में उत्तर प्रदेश, बिहार के प्रवासी रहते हैं।

इस चुनाव में यमुना पुश्ते से बवाना गए करीब चालीस हजार मुसलिम वोटर भी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं जिन्हें अपने पक्ष में करने के लिए कांग्रेस और ‘आप’ ने हर संभव प्रयास किए। उसी तरह 26 गांवों के वोट के लिए तीनों दलों ने दिल्ली से लेकर हरियाणा तक के जाट नेताओं को चुनाव प्रचार में लगा दिया। पहले कांग्रेस के और पिछले कुछ चुनाव में आप के साथ जुड़ने वाले पूर्वांचल(बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी) बिहार मूल के कलाकार मनोज तिवारी के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा से भी जुड़ने लगे हैं। शायद यही कारण रहा है कि चुनाव प्रचार के दौरान तिवारी पर हमला किया गया। कांग्रेस ने अपने तीन बार के विधायक सुरेंद्र कुमार को फिर से चुनाव मैदान में उतारा। वे लगातार 1998, 2003 और 2008 में इस सीट से विधायक रहे। लेकिन 2013 और 2015 के चुनाव में वे न केवल चुनाव हारे बल्कि तीसरे नंबर पर रहे। सुरेंद्र कुमार के पक्ष में सबसे बड़ी बात है कि उनका राजनीतिक कद काफी बड़ा है और पूरे इलाके में असरदार है। सामान्य तौर पर इस सीट का समीकरण तो भाजपा के पक्ष में है।

23 अप्रैल को हुए दिल्ली नगर निगमों के चुनाव में इस सीट के छह निगम वार्डों में से तीन भाजपा, एक-एक आप, बसपा और निर्दलीय जीते थे। भाजपा को 53,850,आप को 36,891 और कांग्रेस को 25,555 वोट मिले थे। इस चुनाव के बाद बिना नियम बनाए संसदीय सचिव बनाए गए बीस विधायकों की सीट पर फिर से चुनाव हो सकते हैं। अगर इस चुनाव में आप हार जाती है तो आप नेताओं का मनोबल इतना गिर जाएगा कि उसे दोबारा उठाना ज्यादा कठिन हो जाएगा। जिस तरह से इस चुनाव में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन, पूर्व सांसद सज्जन कुमार, चतर सिंह ने मेहनत की है उससे तो कांग्रेस उम्मीदवार सुरेंद्र कुमार मुख्य मुकाबले में माने जा रहे हैं। लेकिन अगर वे दूसरे नंबर पर रहे तब भी कांग्रेस को पार्टी को मजबूत बनाने का आधार मिल जाएगा। अब 28 अगस्त को मतगणना के बाद तय होगा कि दिल्ली में किस दल का असर बढ़ रहा है।

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