हिंदुत्व को राजनीतिक विचारधारा बनाने वाले सावरकर थे सती प्रथा के पक्षधर, कानून का किया था विरोध

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य न रहे वीर सावरकर को इन दोनों ही संगठनों में इज्जत और सम्मान दिया जाता है। साल 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन यह रिजेक्ट कर दिया गया था।

vinayak damodar savarkar
विनायक दामोदर सावरकर का चित्र (Photo Source: Twitter/@VPSecretariat)

विनायक दामोदर सावरकर जिन्हें वीर सावरकर भी कहते हैं, को लेकर चर्चा कम और राजनीति ज्यादा होती है। कोई उन्हें हिंदुत्व का रक्षक और सच्चा सिपाही मानता है तो कोई अंग्रेजों का यार। यहां तक कि महात्मा गांधी की हत्या में भी उनका नाम उछला था। साल 1948 में गांधीजी की हत्या के छठवें दिन विनायक दामोदर सावरकर को हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि फरवरी 1949 में बरी कर दिया गया था। पिछले लगभग दो दशक में कई ऐसे मौके आए, जब सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की गई। हालांकि राजनीतिक रूप से उनके नाम को लेकर कभी सहमति नहीं बन सकी।

1906 में सावरकर कानून की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड गए थे। वहां रहते हुए उन्होंने आजाद भारत सोसायटी (फ्री इंडिया सोसायटी) का गठन किया था, जिसके जरिये वो इंग्लैंड में रहने वाले भारतीय छात्रों को आंदोलन के लिए जोड़ते थे। सोसायटी के एक कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में सावरकर ने कहा था, हमें अंग्रेजी अफसर और अंग्रेजी कानून का विरोध करने से कुछ लाभ नहीं होगा। बल्कि हमें ऐसी व्यवस्था हासिल करनी होगी, जिससे कानून बनाने का अधिकार हमारे पास आ गए।

इंग्लैंड के बाद सावरकर पुणे आ गए और यहां के फरग्यूसन कॉलेज में दाखिला लिया। लेकिन राजनीतिक विचारों और गतिविधियों में लिप्त रहने के चलते उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया। साल 1910 में उन्हें नासिक के कलेक्टर की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। कलेक्टर एएमटी जैकसन की हत्या के आरोप में सबसे पहले सावरकर के भाई को गिरफ्तार किया गया था।

सावरकर पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से अपने भाई को एक पिस्टल भेजी थी, जिसका इस्तेमाल हत्या में किया गया था। सावरकर को पानी के जहाज से भारत लाया जा रहा था। जब जहाज फ्रांस के मार्से बंदरगाह पर ‘एंकर’ हुआ तो सावरकर जहाज के शौचालय के ‘पोर्ट होल’ से बीच समुद्र में कूद गए थे। हालांकि उन्हें तब भी गिरफ्तार कर लिया गया और अंडमान की सेलुलर जेल में कैद कर दिया गया था।

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सावरकर स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा तो थे, लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा याद हिंदुत्व के नाम पर ही किया जाता है। जिस समय सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों से लड़ने और देश को स्वतंत्र कराने के लिए आजाद हिंदी फौज को बना रहे थे ठीक उसी समय सावरकर ब्रिटिश फौज में भारतीयों की भर्ती करवाने में अंग्रेजों की मदद कर रहे थे। दरअसल कई दया याचिकाओं के बाद अंग्रेजों ने इस शर्त पर सावरकर को जेल से आजाद कर दिया था कि वो किसी भी प्रकार के राजनीतिक और ब्रिटिश विरोधी आंदोलन में शामिल नहीं होंगे। सावरकर ने अंग्रेजों के प्रति वफादारी के लिए लिखित आश्वासन भी दिया था।
तब जाकर दस साल जेल में रहने के बाद सावरकर और उनके भाई को 1924 में रिहा किया गया था।

‘चित्रगुप्त’ उर्फ सावरकर: 1926 में ‘लाइफ ऑफ बैरिस्टर सावरकर’ (बैरिस्टर सावरकर का जीवन) नाम की एक किताब प्रकाशित हुई थी। उस समय तक लोग यही जानते थे कि इस किताब को किसी ‘चित्रगुप्त’ नाम के लेखक ने लिखा है और यह सावरकर की पहली जीवनी थी। इसमें उनका भरपूर गुणगान किया गया था और यह भी बताया गया था कि वो कितने बहादुर थे। कहा जा सकता है कि किताब के जरिए एक हीरो में रूप में उनकी छवि बनाने की पूरी कोशिश की गई।

इस किताब का दूसरा संस्करण सावरकर की मृत्यु के दो दशक बाद 1987 में प्रकाशित हुआ था। वीर सावरकर प्रकाशन द्वारा दूसरा संस्करण प्रकाशित किया गया था और इसके प्रकाशक रवींद्र रामदास ने किताब की प्रस्तावना में यह खुलासा किया था कि आखिर लेखक चित्रगुप्त कौन थे। आपको जानकर हैरत होगी कि यह कोई और नहीं खुद सावरकर थे। उन्होंने ही इस छद्म नाम से पूरी किताब लिखी थी।

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अंडमान जेल से वापसी के बाद उन्होंने एक और किताब लिखी थी जिसका नाम है ‘हिंदुत्व – हू इज़ हिंदू?’ इसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया था। सावरकर का मानना था कि, “इस देश का इंसान मूलत: हिंदू है। इस देश का नागरिक वही हो सकता है जिसकी पितृ भूमि, मातृ भूमि और पुण्य भूमि यही हो। पितृ और मातृ भूमि तो किसी की हो सकती है, लेकिन पुण्य भूमि तो सिर्फ हिंदुओं, सिखों, बौद्ध और जैनियों की हो हो सकती है। मुसलमानों और ईसाइयों की ये पुण्यभूमि नहीं है। इस परिभाषा के अनुसार मुसलमान और ईसाई तो इस देश के नागरिक कभी हो ही नहीं सकते।” सावरकर ने लिखा था कि हिंदू बनकर ही इस पुण्यभूमि का हुआ जा सकता है।

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अपनी एक और किताब, ‘द वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस ऑफ 1857’ में सावरकर ने सती प्रथा को गैर कानूनी बताने पर दुख और रोष व्यक्त किया था। सावरकर का मानना था कि यह गलत है और हिंदू आदर्शों की बेअदबी है। उनका मानना था कि हिंदुत्व और इस्लाम को भारत से खत्म करने के लिए यह अंग्रेजों की चाल थी। उन्होंने अपनी किताब में लिखा था कि हिंदु और मुस्लिम धर्म की जड़ों को हिलाने के लिए अंग्रेज सरकार लगातार कानून बना रही है। रेलवे के जरिए धर्म और जाति का बंटवारा किया जा रहा था। एक के बाद एक देश में ईसाई मिशन के स्कूल खोले जा रहे थे। ऐसे मिशन को खुले हाथों से सरकार पैसे दे रही थी ताकि गैर हिंदू और गैर मुस्लिम आबादी की संख्या को बढ़ा सकें।

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