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रावत के उतरने से गरमाई राजनीति

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के पहाड़ से उतर कर मैदानी सीट हरिद्वार ग्रामीण से विधानसभा का चुनाव लड़ने से इस सीट पर मुकाबला रोचक हो गया है।

उत्तराखंड के निवर्तमान मुख्यमंत्री हरीश रावत

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के पहाड़ से उतर कर मैदानी सीट हरिद्वार ग्रामीण से विधानसभा का चुनाव लड़ने से इस सीट पर मुकाबला रोचक हो गया है। हरिद्वार जिले की राजनीति गरमा गई है। सूबे के सभी राजनीतिक दिग्गजों का ध्यान हरिद्वार ग्रामीण सीट पर लगा हुआ है। इस विधानसभा सीट पर मुख्यमंत्री हरीश रावत की प्रतिष्ठा दांव पर है। हरिद्वार ग्रामीण सीट पर इस वक्त भाजपा का कब्जा है। भाजपा नेता स्वामी यतीश्वरानंद इस सीट से मौजूदा विधायक है। सन 2012 में परिसीमन के बाद यह सीट अस्तित्व में आई थी।
हरिद्वार ग्रामीण सीट पर पहले मुख्यमंत्री हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत चुनाव लड़ना चाहती थीं। परंतु स्थानीय कांग्रेसियों के विरोध के चलते अनुपमा रावत ने इस सीट पर चुनाव लड़ने का इरादा छोड़ दिया। रावत के नजदीकी लोगों ने पूर्व विधायक अंबरीश कुमार पर लड़ने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन अंबरीश ने भी इस सीट पर चुनाव लड़ने से मना कर दिया। आखिरकार मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस मैदानी सीट पर उतरकर सभी को चौंका दिया। मुसलिम, दलिद और पर्वतीय बहुल्य इस सीट पर अपना राजनीतिक भविष्य का दांव लगाना हर राजनेता के बूते से बाहर है। परंतु राजनीति के कुशल खिलाड़ी हरीश रावत ने इस सीट पर चुनाव लड़ने का फैसला करके अपनी विरोधियों को सीधी चुनौती दी है।
गढ़वाल में कांग्रेस कमजोर हालात में है। गढ़वाल में सबसे ज्यादा 11 सीट हरिद्वार जनपद में आती हैं। 2012 के चुनाव में 11 में से कांग्रेस केवल तीन सीटें ही जीत पर पाई थी। इनमें रुड़की से प्रदीप बत्रा, खानपुर से कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन और पिरान कलियर से फुरकान अहमद विजयी हुए थे। पिछले साल हरीश रावत की सरकार गिराने के खेल में प्रदीप बत्रा और कुंवर प्रणव सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर भाजपा का दामन थाम लिया था। कांग्रेस के तीन मे से दो विधायकों के भाजपा में चले आने से कांग्रेस हरिद्वार में काफी कमजोर हो गयी है। इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस को भी हरिद्वार जिले में कमजोर माना जा रहा था।
हरिद्वार की ग्रामीण सीट से लगती हुई ज्वालापुर, रानीपुर और हरिद्वार शहर सीट पर भाजपा का कब्जा है। कांग्रेस की नजर मुख्य रूप से इन्हीं चारों सीटों पर है। हरीश रावत के यहां से चुनाव लड़ने के पीछे एक मकसद इन चारों सीटों को कांग्रेस की झोली में डालना है। हरिद्वार सीट पर कांग्रेस 1989 के बाद से ही जीत के लिए तरस रही है। यहां पर लगातार पांच बार से भाजपा काबिज है और हरिद्वार को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। सन् 2002 से लेकर तो सन् 2012 के चुनाव तक लगातार तीसरी बार यहाँ से भाजपा के मदन कौशिक ही विधायक चले आ रहे हैं। हरिद्वार शहर सीट जीतना भी कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। रानीपुर सीट 2012 के चुनाव से पहले हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आयी तो यहाँ से भाजपा ने ही 2012 में जीत हासिल की। भाजपा के युवा नेता आदेश चौहान करीब पांच हजार वोटों से जीते थे। 2012 में यहां कांग्रेस के बागी अंबरीश कुमार ने कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी बलवंत सिंह चौहान की हार मे बड़ी भूमिका निभाई थी। निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में अम्बरीश कुमार यहाँ से दूसरे नंबर पर रहे थे। जबकि कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी बलवंत सिंह चौहान चौथे नंबर पर थे। ज्वालापुर अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित सीट भी 2012 से पहले हुए परिसीमन के बाद बनाई गयी थी। इस सीट पर भी 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने छह सौ वोटों से इस सीट पर कब्जा किया था। भाजपा के चंद्रशेखर ने बसपा के मदन लाल को मात्र छह सौ मतों से हराया था। जबकि कांग्रेस की बृजरानी भी करीब एक हजार वोटों से ही पिछड़ कर तीसरे नंबर पर रही थी।

हरिद्वार ग्रामीण सीट पहले लालढांग विधानसभा सीट के नाम से जानी जाती थी। ये सीट भी 2012 के परिसीमन के बाद हरिद्वार ग्रामीण सीट बन गई। यहां से 2012 के चुनाव में भाजपा ने पहली बार जीत दर्ज की ही। भाजपा के स्वामी यतीश्वरानंद ने कांग्रेस के इरशाद अली को चार हजार से ज्यादा वोटों से हराया था। जबकि इससे पहले दो बार से यहां से जीत रही बसपा को तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा था। मुख्यमंत्री के सामने स्वामी यतीश्वरानंद और बसपा के युवा मुसलिम नेता मुकर्रम अली मैदान में हैं। यह सीट मुसलिम बाहुल्य सीट है। मगर इसके बाद भी 2012 में भाजपा ने यहाँ से जीत दर्ज की थी। 2002 और सन् 2007 के चुनाव में यहां से बसपा हाजी तस्लीम विजयी हुए थे। परंतु 2012 में बसपा ने हाजी का टिकट काटर सैनी बिरादरी के शेषराज सैनी को टिकट दे दिया था। और इसका खामियाजाना उसे तीसरे नंबर पर रह कर भुगतान पड़ा था।

बसपा ने इस बार यहां फिर से मुसलिम प्रत्याशी खड़ा कर भाजपा और कांग्रेस के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है। भाजपा यहां हिंदू कार्ड के भरोसे है तो बसपा मुसलिम और दलित गठजोड़ के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की जुगत में है। बसपा ने यहां से अंसारी बिरादरी के प्रत्याशी को खड़ा किया है। यहां कुल मतदाताओं की संख्या के एक तिहाई से ज्यादा मुस्लिम मतदाता है जो करीब 43 हजार से ज्यादा है। इनमें भी बसपा प्रत्याशी मुकर्रम की अंसारी बिरादरी के करीब 35 हजार मतदाता है। दलित मतदाताओं की संख्या यहाँ करीब 22 हजार है जिन्हें बसपा का वोट बैंक माना जाता है। बसपा दलित मुसलमान गठजोड़ के आधार पर ही अपनी जीत का दावा कर रही है।

इस सीट पर 2012 में कुल 96683 मतदाता थे जो इस बार 2017 में बढ़ कर 118156 हो गए हैं। इसमें मुसलमान और पर्वतीय समुदाय के मतदाताओं की संख्या में ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। पर्वतीय समुदाय के यहां करीब 20 हजार वोट हैं जो भाजपा का वोट बैंक है। इसके अलावा बाकी बचे करीब 33 हजार मतदाताओं में अन्य जातियों के मतदाता है। भाजपा को भी इस बार जीतने के लिए नाकों चने चबाने पड़ सकते है। कांग्रेस को उम्मीद है कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को ही वोट देंगे। इसके अलावा पर्वतीय, और अन्य पिछड़ी जातियों कश्यप, कुम्हार, सैनी मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भी कांग्रेस को मिलेगा। कांग्रेस यहाँ मुख्यमंत्री हरीश रावत की जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है। मुख्यमंत्री हरीश रावत की हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ने की रणनीति सफल हुई तो इसका सीधा असर राज्य में फिर से कांग्रेस को सत्तारुढ़ करने में कारगर साबित हो सकता है।

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