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त्रिवेंद्र सरकार लोकायुक्त और तबादला विधेयकों से पीछे हटी

उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने लोकायुक्त और तबादला विधेयक को लेकर खुद ही अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, जिससे सरकार की खासी किरकिरी हो रही है।

Author देहरादून | Published on: March 30, 2017 1:48 AM
उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत (PTI Photo)

उत्तराखंड की भाजपा सरकार ने लोकायुक्त और तबादला विधेयक को लेकर खुद ही अपने कदम पीछे खींच लिए हैं, जिससे सरकार की खासी किरकिरी हो रही है। सरकार के इस कदम पर विपक्ष समेत सत्तापक्ष के कई नेता भी अचरज में हैं। सूबे की भाजपा सरकार ने विधानसभा में लोकायुक्त व तबादला विधेयक पेश करते वक्त इन दोनों विधेयकों की खूबियां जमकर गिनाई थीं। ये दोनों विधेयक 2011 में भी विधानसभा के पटल पर तब की भुवनचंद्र खडूंड़ी सरकार ने रखे थे। इन दोनों विधेयकों को 2012 में कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार ने रद्द करके नया लोकायुक्त विधेयक बनाया था। दो दिन पूर्व जब सदन के पटल पर संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने विधानसभा के पटल पर लोकायुक्त विधेयक व तबादला विधेयक पेश किया तो उन्होंने जमकर इन दोनों विधेयकों की खूबिया गिनार्इं। पंत ने सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए कहा कि तबादला विधेयक नौकरशाही को और अधिक पारदर्शी व जवाबदेह बनाने के लिए लाया गया है। लोकायुक्त राजनीति व नौकरशाही में फैले भ्रष्टाचार को दूर करेगा। उन्होंने दोनों विधेयकों को प्रभावशाली व ताकतवर बताया।

संसदीय कार्यमंत्री की बातों से ऐसा लग रहा था कि राज्य सरकार इसी सत्र में इन दोनों विधेयकों को पास कराकर भ्रष्ट नौकरशाही व राजनेताओं पर करारी चोट करेगी। विपक्ष ने इन दोनों विधेयकों को प्रवर समिति के पास भेजने का प्रस्ताव सदन में रखा, पर सत्तापक्ष ने विपक्ष के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। सत्तापक्ष के विपक्ष के प्रस्ताव को खारिज करने के बाद नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने भी लोकायुक्त विधेयक को प्रवर समिति को सौंपने के अपने प्रस्ताव को वापस ले लिया। जिस पर लगा कि विधानसभा में भारी बहुमत वाली राज्य की भाजपा सरकार अब इस विधेयक को आसानी से पारित करवा लेगी।

पर अचानक सत्तापक्ष का रवैया बदला। संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद्र अग्रवाल से बात की और तबादला विधेयक व लोकायुक्त विधेयक प्रवर समिति को भेजने का प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष रखा, जिसे ध्वनिमत से पास कर दिया गया। सरकार के रवैये ने सभी को चौंका दिया, जबकि सदन में सरकार के पास विपक्ष के 11 सदस्यों के मुकाबले 57 सदस्यों का समर्थन था। सरकार के इस बदले रुख पर सभी अचरज में हैं।

सरकार की तरफ से संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पंत ने दोनों विधेयक प्रवर समिति को सौंपे जाने पर पक्ष रखते हुए कहा कि सरकार भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार किसी भी अहम मसले पर संख्याबल से फैसला नहीं चाहती, बल्कि पूरे सदन की सर्वसम्मति से फैसला लेने में भरोसा करती है। अगले सत्र में इन दोनों बिलों को इन दोनों विधेयकों पर अपनी सहमति दे देगी। प्रवर समिति में भाजपा व कांग्रेस के विधायकों को शामिल किया जाएगा। प्रवर समिति में शामिल सदस्यों के सुझाव के आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
वहीं नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने कहा कि तबादला व लोकायुक्त विधेयकों पर विपक्ष के समर्थन के बावजूद सरकार इन्हें पारित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, इससे भाजपा की करनी और कथनी में भेद दिखाई दिया और भाजपा सरकार की मंशा साफ हुई।

भाजपा सरकार के रणनीतिकार इस मामले में कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। क्या सरकार ने बिना सोचे-समझे इन विधेयकों को सदन के पटल पर रखा। जिस तरह राष्टÑीय राजमार्ग घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कड़ा रवैया अपनाया था। और उसके बाद सदन में लोकायुक्त व तबादला विधेयक पेश किए गए थे। उससे लग रहा था कि राज्य सरकार इसी सत्र में दोनों विधेयक पास कराकर भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ेगी और सूबे के बिगड़े राजनीतिक व नौकरशाही माहौल को एक झटके में सुधार देगी। पर सरकार के कदम कुछ राजनीतिक मजबूरियों के चलते डगमगा गए।

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