न्याय के देवता हैं गोलू

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल क्षेत्र में एक ऐसे देवता हैं जिन्हें न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें गोलू देवता कहा जाता है।

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कुमाऊं दर्शन।

सुनील दत्त पांडेय

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल क्षेत्र में एक ऐसे देवता हैं जिन्हें न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। इन्हें गोलू देवता कहा जाता है।
कुमाऊं मंडल के 3 जिलों अल्मोड़ा, नैनीताल और चंपावत में न्याय के प्रतीक गोलू देवता के मंदिर हैं। अल्मोड़ा में गोलू देवता चितई और नैनीताल में घोड़ाखाल गोलू देवता तथा चंपावत में गोलू देवता यानी गोलज्यू के मंदिर हैं।

पौराणिक कथाओं के मुताबिक गोलू देवता कत्यूरी राजवंश के राजा झालूराई की इकलौती संतान थे। राजा झालूराई एक न्यायप्रिय, दयालु और तेजस्वी राजा थे। उनकी सात रानियां थीं लेकिन सभी निसंतान थीं। राजा को अपने वंश को आगे न बढ़ पाने का डर था। एक दिन राजा एक ज्योतिषि से मिले। ज्योतिषि ने उनसे भगवान भैरव की तपस्या करने को कहा। राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान भैरव ने इसका कारण पूछा। राजा ने उनसे वरदान के रूप में संतान सुख मांगा। भैरव ने कहा मैं स्वयं पुत्र के रूप में तुम्हारे घर जन्म लूंगा, लेकिन तुम्हें आठवां विवाह करना होगा। पंच देवताओं की बहन कलिंगा से राजा का विवाह हुआ। कलिंगा और राजा झालुराई की संतान के रूप में भैरव बाबा गोलू देवता के रूप में अवतरित हुए। गोलू देवता को शिव का अवतार माना जाता है।

गोलू देवता को जन्म के समय राजा की सात रानियों ने ईर्ष्या के कारण मारने का प्रयास किया जब यह बात राजा को मालूम हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर सातों रानियों को कारावास में बंद कर दिया। यह सातों रानियां रानी कलिंगा व राजा झालुराई से क्षमा याचना मांगने लगीं। बालक गोलू देवता के कहने पर राजा ने इन सातों रानियों को माफ कर दिया। गोलू ने राजा झोलुराई से राज्य का भार सम्भाला और अपने तुरंत, सही न्याय के कारण उन्हें न्याय का देवता कहा जाने लगा। वे गोलू, गोलज्यू देवता, गोलज्यू बाला गोरिया और गौर भैरव देवता आदि नाम से प्रसिद्ध हुए।

कुमाऊंनी संस्कृति के जानकार गणेश पाठक का कहना है कि गोलू देवता या भगवान गोलू कुमाऊं क्षेत्र के पौराणिक और ऐतिहासिक भगवान हैं। अल्मोड़ा जिले में गोलू देवता गैराड मंदिर, बिंसर वन्यजीव अभ्यारण्य के मुख्य द्वार से करीब दो किमी दूर पर हैं।

गोलू देवता के जन्म को लेकर एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार गोलू देवता की उत्पत्ति को गौर भैरव (शिव) के अवतार के रूप में माना जाता है और पूरे क्षेत्र में पूजा की जाती है। ऐसा कहा जाता है कि कल्याण सिंह बिष्ट (कालबिष्ट) का जन्म एक बड़े गांव पाटिया के पास कत्युडा में हुआ था, जहां राजा के दीवान रहते थे। बहुत कम उम्र में कालबिष्ट ने कुमाऊं क्षेत्र के सभी शैतानों को पछाड़ दिया। कालबिष्ट ने हमेशा गरीबों की मदद की। कालबिष्ट का उनके अपने रिश्तेदार ने अपनी कुल्हाड़ी से सिर काट दिया था, और कालबिष्ट का शरीर डाना गोलू गैराड में गिर गया और उनका सिर अल्मोड़ा से कुछ किलोमीटर दूर कपडखान में गिर पड़ा। डाना गोलू में, गोलू देवता का मूल और सबसे प्राचीन मंदिर है। गोलू देवता भगवान शिव के रूप में देखा जाता है, उनके भाई कलवा भैरव के रूप में हैं और गर्भ देवी शक्ति का रूप है।

कुमाऊं के कई गांवों में गोलू देवता को प्रमुख देवता, कुल देवता यानी इष्ट देवता के रूप में पूजा जाता है। गोलू देवता को सफेद कपड़ों, सफेद पगड़ी और सफेद शाल के साथ पेश किया जाता है। गोलू देवता के मंदिर में भक्त अपनी इच्छा पूरी होने बाद इन के मंदिर में घंटी चढ़ाते हैं। मंदिर के परिसर में हजारों घंटियां लटकी हैं। कई भक्तों ने कई लिखित याचिकाएं दर्ज़ कराई हैं, जो मंदिर द्वारा प्राप्त की जाती हैं। दूर-दूर से लोग न्याय की आकांक्षा में गोलू देवता के मंदिर में मत्था टेकने आते है। गोलू देवता घोड़े पर विराजमान रहते हैं जो उनकी एक पहचान है।

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