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उत्तराखंड: पहाड़ के लिए सरकार के पास ठोस चिकित्सा नीति नहीं

नैनीताल में भवाली सेंटोरियम में राज्य सरकार ने सीटी स्केन की डेढ़-दो करोड़ रुपये की अत्याधुनिक मशीन लगाई है।

हाई ब्लडप्रेशर के मरीज को शुरुआत में चक्कर आना, सिर घूमना आदि लक्षण महसूस होते हैं।

उत्तराखंड में सरकारी अस्पतालों के हाल-बेहाल है। सभी 13 जिला मुख्यालयों तथा विभिन्न विकासखंडों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तो बने हुए हैं, परंतु उनमें स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं और चिकित्सकों तथा अन्य स्टाफ की भारी कमी है।  मैदानी जिलों देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर के सरकारी अस्पतालों में ही चिकित्सकों की भारी कमी है। सूबे के पहाड़ी जिलों उत्तरकाशी, चमोली, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, चंपावत, नैनीताल, पिथौरागढ़ और बागेश्वर में सरकारी अस्पतालों की तो हालत और भी ज्यादा खस्ता है। सरकारी अस्पतालों में कही एक्सरे की मशीन खराब है तो कहीं पैथोलॉजी लैब में सामान पूरा नहीं है।

पर्वतीय क्षेत्र के दुर्गम स्थानों में रह रहे पर्वतीय क्षेत्रों से चिकित्सा सेवा कोसों दूर है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष तथा उत्तराखंड राजकीय चिकित्सा सेवा के सेवानिवृत संयुक्त निदेशक डॉ. टीएस रौतेला का कहना है कि उत्तराखंड सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों, टैक्नीशियनों की भारी कमी है। नैनीताल में भवाली सेंटोरियम में राज्य सरकार ने सीटी स्केन की डेढ़-दो करोड़ रुपये की अत्याधुनिक मशीन लगाई है। परंतु उसके लिए टैक्नीशियन नहीं है। हल्द्वानी के सुशीला तिवारी राजकीय मेडिकल कॉलेज से कई विशेषज्ञ डाक्टर सुविधाओं के अभाव में नौकरी छोड़ चुके हैं। पिथौरागढ़ के मुन्सयारी ने प्रदेश को सबसे ज्यादा चिकित्सक दिए है। परंतु चिकित्सक सुविधाएं न मिल पाने से अपनी सेवाएं देने को तैयार नहीं है। डॉ. रौतेला के मुताबिक सूबे में चिकित्सा सेवा का ढर्रा बिगड़ा है। जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब चिकित्सकों की पहली तैनाती पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती थी। 17 साल में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक ठोस चिकित्सा नीति तक नहीं बनी है। सूबे में 50 फीसद चिकित्सकों की कमी है।

सेना से अवकाश प्राप्त चिकित्सकों को पहाड़ों पर भेजने के लिए त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार ने बहुत हल्ला मचाया, परंतु यह योजना भी अबतक सिरे नहीं चढ़ पाई है। अल्मोड़ा के हर गोविन्द बल्लभ पांडे जिला राजकीय अस्पताल में प्रमुख विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. आरसी पंत का कहना है कि अल्मोड़ा के सरकारी अस्पताल में सर्जन, ईएनटी, त्वचा चिकित्सक तथा आकस्मिक सेवा के चिकित्सकों की कमी है। उत्तराखंड में करीब 1400 चिकित्सकों की कमी है। सूबे में तेरह जिलों में स्थित जिला राजकीय अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के लिए चिकित्सकों 2700 पद सृजित किए गए हैं और केवल एक हजार चिकित्सकों की ही नियुक्ति हो पाई है। उत्तराखंड के स्वास्थ्य विभाग के महानिदेशक डॉक्टर दलबीर सिंह रावत का कहना है कि चिकित्सा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए 712 चिकित्सकों तथा 203 दंत चिकित्सकों की भर्ती के लिए उत्तराखंड चिकित्सक शिक्षा चयन आयोग को पत्र लिखा है। ब्लड बैंक की स्थापना और उनके संचालन के लिए कड़े कदम उठाए है।

 

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