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उत्तराखंडः खस्ताहाल सड़कों ने खोली सूबे के विकास की पोल

अठारह सालों में उत्तराखंड की हर राज्य सरकार के कर्ताधर्ता पहाड़ों के विकास के दावे करते रहे हैं। परंतु राज्य की खस्ताहाल सड़कें और यातायात व्यवस्था सूबे के विकास की पोल खोलकर रख देती है।

रविवार को पौड़ी गढ़वाल जिले के धूमाकोट के पास हुई बस दुर्घटना ने एक बार फिर सरकारी विकास के दावों को झुठला दिया।

अठारह सालों में उत्तराखंड की हर राज्य सरकार के कर्ताधर्ता पहाड़ों के विकास के दावे करते रहे हैं। परंतु राज्य की खस्ताहाल सड़कें और यातायात व्यवस्था सूबे के विकास की पोल खोलकर रख देती है। रविवार को पौड़ी गढ़वाल जिले के धूमाकोट के पास हुई बस दुर्घटना ने एक बार फिर सरकारी विकास के दावों को झुठला दिया। इस हादसे में 50 लोग मारे गए और कई परिवारों में कोई नामलेवा भी नहीं रहा। 16 गांवों में मातम पसरा हुआ है। मेरा गांव के 15 लोगों की मौत ने इस गांव के लोगों को हिलाकर रख दिया है। कई गांवों में दो दिनों तक चूल्हा भी नहीं जला। राज्य सरकार के परिवहन विभाग की हालत बुरी है। सूबे के पहाड़ी इलाकों में राज्य के परिवहन विभाग की बसें केवल नाममात्र के लिए चलती हैं। इन पहाड़ी सड़कों पर निजी कंपनियों की बसों का कब्जा है।

इतना ही नहीं, खटरा बसों में सवारियां भी ठूंस-ठूंसकर भर जाती हैं। खस्ताहाल सड़कें हर समय दुर्घटना को बुलावा देती नजर आती हैं। रविवार की बस दुर्घटना भी बस में क्षमता से ज्यादा सवारियां भरने और सड़क के बीचो-बीच बने गड्ढे की वजह से हुई। उत्तराखंड में नौकरशाही इतनी बुरी तरह सरकार पर हावी है कि नौकरशाहों को अपने आराम से ही फुर्सत नहीं है। गढ़वाल मंडल का पौड़ी मुख्यालय मंडलीय अधिकारियों के लिए अतिथिगृह बना हुआ है। इस मंडल के आयुक्त और पुलिस उप महानिरीक्षक (डीआइजी) पौड़ी मंडल मुख्यालय में बैठने की बजाय देहरादून में बैठना ज्यादा पसंद करते हैं। सूबे के गठन के बाद सिर्फ एक बार ही गढ़वाल मंडल को पूर्णकालिक आयुक्त मिला है। पौड़ी मंडल मुख्यालय हमेशा अधिकारीविहीन रहा है। गढ़वाल मंडल के आयुक्त और डीआइजी को अन्य विभागों का कार्यभार देकर सरकार के मुखिया देहरादून सचिवालय में ही बैठाकर रखते हैं। 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूडी ने देहरादून में गढ़वाल मंडल के आयुक्त और डीआइजी के कैंप कार्यालयों को बंद करवा दिया था। मंडलीय अधिकारियों को मंडलीय कार्यालय पौड़ी में ही बैठने के आदेश दिए थे।

धूमाकोट में हुए बस हादसे ने जिला आपदा प्रबंधन विभाग के दफ्तर की कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लगाया है। दुर्घटना की सूचना मिलने के बावजूद दोपहर तक कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अपने दफ्तर में नहीं था। जबकि 39 अधिकारी और कर्मचारी इस जिला आपदा प्रबंधन दफ्तर में नियुक्त हैं। पहाड़ों में गढ़वाल मोटर्स ऑनर्स यूनियन, कुमाऊं मोटर्स ऑनर्स यूनियन तथा बहुउद्देशीय समिति की बसें चलती हैं। सूबे के परिवहन विभाग के पास इतनी बसें नहीं हैं कि वे पहाड़ों में अपनी सेवाएं दे सकें। स्थानीय लोग कई बार परिवहन मंत्री को आपबीती बता चुके हैं। परंतु उनकी यातायात की समस्या का समाधान नहीं हुआ। जान जोखिम में डालकर पहाड़ के लोग निजी बसों में यात्रा करने पर मजबूर हैं। पौड़ी-गढ़वाल जिले के सड़क हादसे के बाद सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कई अधिकारियों के तबादले किए हैं। गढ़वाल मंडल के आयुक्त दिलीप जावलकर को हटाकर शैलेश बगोली को बनाया गया है, वहीं डीआइजी गढ़वाल पुष्पक ज्योति को हटाकर अजय रौतेला को लाया गया है। पौड़ी-गढ़वाल के आरटीओ, धूमाकोट के थानेदार को भी हटा दिया गया है।

राज्य में पहाड़ी क्षेत्रों में बसों और टैक्सी-जीपों में क्षमता से अधिक सवारियां भरने से रोकने के लिए परिवहन विभाग सख्त कदम उठाएगा। साथ ही वाहनों की फिटनेस के लिए और ज्यादा सख्ती की जाएगी। दुर्घटना संभावित क्षेत्रों को चिन्हित करने का अभियान परिवहन, पुलिस और प्रशासन संयुक्त रूप से करेंगे।
– यशपाल आर्य, परिवहन मंत्री, उत्तराखंड

18 साल, 843 बस दुर्घटनाएं, 2500 मौत, 5000 घायल

  • 20 सितंबर 1995 : गंगोत्री हाई-वे पर बड़ा हादसा हुआ था, जिसमें 70 लोगों की मौत हुई
  • 19 अप्रैल 2016 : चकरौता क्षेत्र के त्यूनी में बस हादसे में 45 लोग मारे गए
  • 6 अगस्त 2016 : त्यूनी चकरौता क्षेत्र में बस के खाई में गिरने से 9 लोगों की मौत हुई
  • 3 मई 2017 : उत्तरकाशी में गंगोत्री हाई-वे पर बस दुर्घटना में 26 लोगों की मौत
  • 4 जून 2017 : गंगोत्री हाई-वे पर भागीरथी नदी में एक बोलेरो गाड़ी गिरने से 10 लोगों की मौत हुई

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