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उत्तराखंड: हाई कोर्ट का निर्देश- गंगा स्वच्छता में रुकावट बनने वाले होटल, आश्रम-फैक्ट्री को कर दो सील

इससे पहले उत्‍तराखंड की नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को जीवित मानव के अधिकार देने के बात कही थी।

गंगा नदी में कचरे से कीमती सामान ढूंढ़ता एक युवक। ( Photo Source: Indian Express)

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने गंगा में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए राज्य प्रदूषण बोर्ड को निर्देश दिया है कि जो होटल, आश्रम या फैक्ट्री स्वच्छ गंगा अभियान में रुकावट बन रही हैं उन्हें सील कर दे। पिछले कुछ सप्ताह में ये दूसरी बार है जब कोर्ट ने गंगा की सफाई को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। इससे पहले उत्‍तराखंड की नैनीताल हाईकोर्ट ने गंगा नदी को जीवित मानव के अधिकार देने के बात कही थी। अदालत ने गंगा को ‘भारत के पहले जीवित तंत्र के रूप में मान्‍यता दी है। गंगा और यमुना, भारत की दोनों पौराणिक नदियों को अब एक मानव की तरह संविधान की ओर से मुहैया कराए गए सभी अधिकार मिल सकेंगे। गंगा के विषय में याचिका लगाने वाले के वकील एमसी पंत ने कहा, ”हाईकोर्ट ने गंगा को वे सभी अधिकार उपलब्‍ध कराए हैं जो इंसान को हैं। हमने अदालत के ध्‍यान में मामला लाया। न्‍यूजीलैंड ने एक नदी को ऐसे ही अधिकार दे रखे हैं।” जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने कहा है कि ‘हम तो गंगा को हमेशा से ही मां करते हैं, तो मां लिविंग पर्सन (जीवित प्राणी) ही होती हैं और हाईकोर्ट ने उसी की पुष्टि कर दी है।’

गंगा भारत की सबसे महत्‍वपूर्ण और पौराणिक दृष्टि से पूज्‍यनीय नदी है। उत्‍तराखंड में हिमालय पर्वत श्रृंखला के गंगोत्री ग्‍लेशियर से निकलने वाली गंगा भारत के मैदानी इलाकों को सींचते हुए सीधे बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गंगा को स्वच्छ रखने के लिए कुछ समय पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार को गंगा में पर्याप्त पानी छोड़ने और गंगा के आसपास पॉलीथीन को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था, लेकिन अब भी इन क्षेत्रों में पालीथीन पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया जा सका है।

 

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