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जलवायु परिवर्तन का पड़ रहा है प्रभाव, सिर्फ 55 हजार रह गए विदेशी पक्षी

जलवायु परिवर्तन का विपरीत प्रभाव उत्तराखंड में प्रवासी पक्षियों पर भी पड़ रहा है।

Author देहरादून   | Published on: April 26, 2017 5:28 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सुनील दत्त पांडेय

जलवायु परिवर्तन का विपरीत प्रभाव उत्तराखंड में प्रवासी पक्षियों पर भी पड़ रहा है। गरम होते पहाड़ों के कारण इनकी संख्या साल-दर-साल घट रही है। इनके प्रवास समय चक्र में भी तेजी से बदलाव आ रहा है। दो विश्वविद्यालयों के एक ताजा शोध से यह जानकारी मिली है। 10 हजार पक्षी कम हुए राज्य में 76 प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां हर साल 65 से 70 हजार की संख्या में आती थीं। इनकी तादाद घटकर 50-55 हजार के आसपास रह गई है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय, श्रीनगर (पौड़ी) और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के पर्यावरण विज्ञान विभागों ने यहां के प्रवासी पक्षियों पर पर्यावरण के बदलाव के असर का शोध कार्य किया है।

इसके मुताबिक एक दशक में कुछ प्रवासी पक्षियों के शरद प्रवास पर उत्तराखंड में आने और बसंत ऋतु में अपने देश लौटन के समय चक्र में काफी परिवर्तन आया है। इस वजह से इन प्रवासी पक्षियों की प्रजनन प्रक्रिया में भी परिवर्तन और अन्य प्रजनन प्रक्रियाओं में गड़बड़ी देखने को मिल रही है। राजहंस आ रहे देरी से जहां जलवायु परिवर्तन के कारण पाइड फलाई कैचर पक्षी प्रजनन के लिए उत्तराखंड में अपने तय समयचक्र से पहले आने लगे हैं, वहीं मानसरोवर के राजहंस पक्षियों का समूह देरी से आ रहा है। छह साल बाद वर्ष 2015-16 में दिसंबर माह के आखिरी सप्ताह में राजहंस का दुर्लभ समूह उत्तराखंड की गंगा घाटी के हरिद्वार क्षेत्र में आया था। इस साल इनका  समूह जनवरी के दूसरे सप्ताह आया और मार्च के प्रथम सप्ताह में मानसरोवर लौट गया। इस बार मानसरोवर से राजहंस पक्षियों के आठ जोड़े हरिद्वार गंगा घाटी के मिस्सरपुर क्षेत्र में देखने को मिले। राजहंस अकेला ऐसा पक्षी है जो मानसरोवर झील से हिमालय को पार करके 10 से 15 दिन में गंगा घाटी के हरिद्वार क्षेत्र में आता है। ’

गरमाते पहाड़, दूर होते प्रवासी पक्षी

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के एक शोध के मुताबिक 2014 में उत्तराखंड में विदेशी पक्षियों की तादाद 62 हजार के लगभग थी। यह 2017 में घटकर 55 हजार रह गई है। ’यहां आने वाले सुरखाब, राजहंस, गढवाल, पील, पिनटेल, यूरेशियन कूट, सेवलर, टफड डक, मैलाड़, कामन पोचार्ड और रेड के्रस्टेड पोचार्ड प्रजाति के प्रवासी पक्षियों की संख्या साल-दर-साल घट रही है। ’पांच से दस साल पहले तक उत्तराखंड की गंगा-यमुना घाटी में सर्दी का आगमन अक्टूबर तथा ग्रीष्म ऋतु का आगमन अप्रैल के अंतिम सप्ताह में होता था। ’तब प्रवासी पक्षियों का आगमन उत्तराखंड में अक्टूबर के आखिरी सप्ताह या नवंबर के प्रथम सप्ताह में होता था और प्रस्थान अप्रैल के आखिरी सप्ताह या मई के पहले सप्ताह में होता था। ’एक दशक पहले प्रवासी पक्षी उत्तराखंड में पांच-छह महीने प्रवास करते थे।

कहां से आते हैं पक्षी

’ नैनीताल के रामनगर जलाशय, देहरादून के आसन बैराज, डाकपत्थर बैराज, यमुना घाटी, ऋषिकेश के पशुलोक बैराज गंगा घाटी, हरिद्वार के भीमगोड़ा गंगा बैराज, मिस्सरपुर के गंगा घाट में हर साल प्रवासी पक्षियों का आगमन शरद ऋतु में होता है और मार्च में ग्रीष्म ऋतु शुरू होने पर ये प्रवासी पक्षी उत्तराखंड से अपने-अपने देशों की ओर प्रस्थान करते हैं। ’सबसे ज्यादा प्रवासी पक्षी रामगंगा जलाशय और सबसे कम संख्या में पशुलोक गंगा बैराज ऋषिकेश में अपना डेरा डालते हैं। ’रूस के उत्तर साईबेरिया भूभाग के अलावा चीन, मंगोलिया, कजाकिस्तान, उक्रेन से प्रवासी पक्षी आते हैं। ’रूस के उत्तरी क्षेत्र से यूरेशियन करलू और मार्श सेन्ड पाइपर नामक पक्षी सबसे लंबी हवाई यात्रा तय करके उत्तराखंड में पहुंचते हैं। ’चीन और तिब्बत से सुरखाब (चकवा-चकवी) प्रजाति के पक्षियों का समूह पांच सौ किलोमीटर का हवाई मार्ग तय करके आते हैं। ’जिम कार्बेट पार्क के संरक्षित क्षेत्र के तहत आने वाले रामगंगा जलाशय इन प्रवासी पक्षियों के लिए सबसे सुरक्षित और सुकुन वाला क्षेत्र है।

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