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गाय के लिए सरकार की अंटी में पैसा नहीं

पहले आवारा घूम रही गायों को पकड़ कर कांजी हाऊस में बंद करने की व्यवस्था थी परंतु अब नगर पालिकाओं के कांजी हाउस बंद हो गए हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Express Photo)

उत्तराखंड में गोसरंक्षण और संवर्द्धन के नाम पर धरातल पर काम कम शोर ज्यादा है। भले ही राज्य सरकार गोरक्षा और गोवंश की रक्षा और उसके संवर्द्धन की बात करें परंतु सरकारी आंकड़े बताते हैं धरातल पर कम काम हुआ है। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और पर्वतीय क्षेत्रों के बाजारों में आवारा गायें सब्जियों और अनाज की दुकानों में मुंह मारती रहती हैं। पहले आवारा घूम रही गायों को पकड़ कर कांजी हाऊस में बंद करने की व्यवस्था थी परंतु अब नगर पालिकाओं के कांजी हाउस बंद हो गए हैं।

प्रमुख आश्रमों-अखाड़ों में गोसेवा
कई बड़े मठों, आश्रमों और अखाड़ों ने गोशालाएं निजी तौर पर खोल रखी हैं। इनमें गायों के लिए सभी सुविधाएं हैं। इनमें गायों के लिए एसी, कूलर और पंखे लगे हुए हैं। इन गोशालाओं में गायों का ख्याल रखने के लिए कर्मी भी हैं। ऐसी एक गोशाला हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र में स्वामी नारायण मठ और मंदिर में है। उत्तराखंड के ऋषिकेश और हरिद्वार में निर्मल आश्रम, जयराम अन्न क्षेत्र आश्रम, काली कमली आश्रम, परमार्थ निकेतन, गीता कुटीर, दूधाधारी बर्फानी आश्रम, पंतजलि योगपीठ, समन्वय कुटीर भारत माता मंदिर, रामकृष्ण मठ, कैलाश आश्रम, शांतिकुंज की गोशालाएं अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त हैं।

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स्वामी गीतानंद द्वारा 1984 में देहरादून जिले के हरिपुरकला क्षेत्र में स्थापित आदर्श गीता गो मंदिर गोशाला में गायों और गोवंशों का नामकरण तक किया गया है। गायों को यहां संतोषी, निधि, वृंदा, रत्नावली, उमा आदि नामों से पुकारा जाता है। गायों की रक्षा के लिए उत्तराखंड में सनातन धर्म प्रतिनिधि सभा के संस्थापक त्यागमूर्ति गोस्वामी गणेश दत्त, आर्य समाज के दिग्गज स्वामी श्रद्धानंद और दूधाधारी बर्फानी बाबा ने जबरदस्त आंदोलन चलाया था। देवभूमि उत्तराखंड में गोवंश के सरंक्षण के लिए सबसे पहले बाबा काली कमली वाले स्वामी विशुद्धानंद के शिष्य स्वामी बाबा रामनाथ ने काली कमली गोशाला की स्थापना ऋषिकेश में 1933 में की थी। यह गोशाला 135 बीघा में बनी हुई है।

250 से ज्यादा गोशालाएं
काली कमली गोशाला, योगगुरु स्वामी रामदेव की पतंजलि गोशाला, दूधाधारी गोशाला, स्वामी नारायण गोशाला, शांतिकुंज गोशाला और सप्तऋषि गोशाला में देसी नस्लों की गाय हैं जबकि अन्य आश्रमों में विदेशी नस्लों की गाय भी हैं। गो आंदोलन के क्षेत्र में कार्य करने वाले कांता प्रसाद बडोला के मुताबिक देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार समेत उत्तराखंड में 250 ये ज्यादा गोशालाएं है। इनमें 150 गोशालाएं केवल ऋषिकेश और हरिद्वार के विभिन्न आश्रमों, मठों और अखाड़ों में हैं। गोशालाओं के नाम पर 150 से ज्यादा गैर सरकारी संगठन चल रहे हंै। ये गो संरक्षण और संवर्द्धन के नाम पर सरकारी अनुदान पाते हैं जबकि धरातल पर गो संरक्षण के लिए कोई भी कार्य नहीं हो रहा है। कुछ आश्रम और मठ वृद्ध गायों और बछड़ों को गोशालाओं से बाहर निकाल देते हंै, जो सड़कों पर आवारा घूमते हैं। इस तरह गोशालाओं के नाम पर दुकानदारी करने वाले अत्याचार के लिए सबसे बड़े दोषी हैं।

 

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