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हिमालयी क्षेत्र में पक्षियों की एक नई प्रजाति मिली

इन पक्षियों की इस विशेषता को देखते हुए शोध टीम भी बड़ी उलझन में आ गई, तो इस टीम ने पक्षियों की इस नई प्रजाति की जैविक संरचना का गहन अध्ययन किया और इनके जैविक नमूने की समानता और विभिन्नताओं का विश्लेषण वन्य जीवन संस्थान देहरादून की फॉरेंसिक लैब में किया गया।

Author Published on: July 3, 2019 6:30 AM
यह नई पक्षी प्रजाति डाईलिनस (हेनिनस) नाम से जानी जाती है।

सुनील दत्त पांडे

उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में पक्षियों की एक नई प्रजाति की खोज की गई है। इस प्रजाति की खोज से पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में एक नया आयाम जुड़ा है। हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले इस नई प्रजाति की खोज गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग की शोध टीम ने वन्य जीव संस्थान देहरादून, शिकागो विश्वविद्यालय, स्वीडन विश्वविद्यालय और उत्तराखण्ड वन विभाग के पक्षी वैज्ञानिकों के सहयोग से की है। इस शोध टीम ने अपने संयुक्त अभियान में ‘सायोरनिस फ्लाईकैचर समूह’ की हिमालय क्षेत्र में एक नई प्रजाति और एक उपजाति का पता लगाया है।

यह नई पक्षी प्रजाति डाईलिनस (हेनिनस) नाम से जानी जाती है। क्षेत्रीय भाषा में इस नई पक्षी प्रजाति को उड़न तश्तरी कहा जाता है। यह पक्षी बहुत तेजी से उड़ता है और पल भर में ओझल हो जाता है। पक्षी विज्ञान के क्षेत्र में इस प्रजाति की खोज ने एक क्रांतिकारी काम किया है। पक्षी विज्ञानियों के मुताबिक भारतीय हिमालय क्षेत्र में सायोरनिस ‘फ्लाईकैचर’ की कई प्रजातियां प्रजनन करती हंै। इनमें प्रमुख रूप से चार प्रजातियां ‘ब्यू थ्रोटेड’, ‘पेल ब्लू’, ‘पेल चिन’, ‘लार्ज ब्लू फ्लाइकैचर’ शामिल हैं। ये सभी प्रजातियां दिखने में लगभग एक जैसी होती हंै। शोध टीम इन नए पक्षियों के फैलाव की जानकारियां जुटाने में लगी हुई है।

साथ ही यह शोध टीम पक्षियों की इस नई प्रजाति ‘फ्लाईकैचर’ के रूप रंग में समानता होने के तथ्यों की जानकारी में जुटी है और यह भी पता लगा रही है कि क्या इनके गीत-संगीत की संरचना और डीएनए में भी समानता है या नहीं। पक्षी विज्ञानियों का मानना है कि एक समान दिखने वाले पक्षी एक ही जीन्स के होने चाहिए। यह शोध टीम पक्षी विज्ञानियों की इस अवधारणा का भी पता लगाने में जुटी है।

गीत गाने की कला पर शोध
शोध टीम ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड और उत्तर पूर्वी हिमालय क्षेत्र जैसे अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मिजोरम इत्यादि हिमालयी क्षेत्र में फ्लाईकैचर्स के गीतों की रिकार्डिंग और जैविक नमूना एकत्रित किया है। इन पक्षियों के गीत गाने की कला पर भी शोध कार्य जारी है। इसके लिए पक्षी विज्ञानी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इनके गीतों के प्रत्येक नमूने को शृंखलाबद्ध तरीके से तैयार किया गया है, जिनके परिणाम अत्यंत रुचिकर हैं। साथ ही यह सामान्य पक्षियों की गीत-संगीत की प्रचलित अवधारणा से बिल्कुल अलग है।

सामान्य पक्षियों के बारे में प्रचलित अवधारणा के मुताबिक दो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में पाए जाने वाली पक्षियों की समान प्रजातियों के गीत-संगीत संरचना और क्षेत्रीय वाणी में अंतर होता है परंतु आश्चर्य की बात यह है कि दो हजार किलोमीटर दूर उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर हिमालय में रहने वाली पक्षी प्रजाति सायोरनिस फ्लाईकैचर के गीतों की संरचना और लयवद्धता में कोई खास अंतर नहीं है। पक्षी वैज्ञानियों की एक राय है कि हिमालय के वायुमंडल के संधि काल के बाद पश्चिम हिमालय में पूर्वी हिमालय से ही यह नई पक्षी प्रजातियां पहुंची। यह भी पता चला है कि प्रचलित अवधारणा के उलट हिमालय में ग्लेशियरों के निर्माण काल के प्रारंभिक दौर से अब तक के हजारों सालों के इस अंतराल में भौगोलिक रूप से प्रजातियों के अलग होने पर भी उनके गीतों की रचना और वाणी पर विशेष असर नहीं पड़ा है।

चौंकाने वाले तथ्य
इन पक्षियों की इस विशेषता को देखते हुए शोध टीम भी बड़ी उलझन में आ गई, तो इस टीम ने पक्षियों की इस नई प्रजाति की जैविक संरचना का गहन अध्ययन किया और इनके जैविक नमूने की समानता और विभिन्नताओं का विश्लेषण वन्य जीवन संस्थान देहरादून की फॉरेंसिक लैब में किया गया। इसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए और पता चला कि फ्लाईकैचर की ‘रुविकोलाइडिस’ और डाईलिनस (हेनिनस) प्रजातियां 22 लाख 80 हजार (2.28 मिलियन) वर्ष पूर्व अलग हो चुकी थीं। वैज्ञानिक थ्योरी बताती है कि ऊपर से समान दिखने वाली प्रजातियां 02 मिलियन वर्ष में अलग प्रजाति बन जाती हैं। वैसे भी ‘डाईलिनस’ और ‘हेनिनस’ प्रजातियां दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ भू-भागों में मिलती है जो आपस में प्रजनन नहीं करती।
देश में तेरह सौ प्रजातियां

भारत में पक्षियों की तेरह सौ प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 650 प्रजातियां केवल उत्तराखंड में पाई जाती हैं। भारत में अत्यधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों उत्तराखंड, हिमालय के उत्तर पूर्व क्षेत्र असम, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और दक्षिण भारत में केरल शामिल हैं।

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार की जैव विविधता लैब द्वारा यह पहली बार पता लगाया गया है कि भारतीय हिमालय में यह प्रजाति नई है। साथ ही यह भी पहली बार पता चला है कि ‘फ्लाईकैचर’ (सायरोनिस रुविकोलाईडिस) की उपजाति ‘रोजेशी’ भी केवल हिमालय में ही प्रजनन करती है। क्योंकि हिमालय का वातावरण इनके प्रजनन के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
-प्रो. दिनेश चंद्र भट्ट, पक्षी विज्ञानी

हिमालयी क्षेत्र की यह नई पक्षी प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है। इस प्रजाति पर किए गए शोध से इसके संरक्षण और संवर्धन की नई उम्मीदें जगी हैं। इससे पक्षी विज्ञानियों में एक नई आशा की किरण जगी है। -आशुतोष सिंह, शोध छात्र

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