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स्थानीय निकाय चुनाव: अपने ही गढ़ में ढेर हुए दिग्गज

13 साल से भाजपा का हरिद्वार नगर निगम में कब्जा था। इस साल यह किला ढह गया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि हरिद्वार की हार पार्टी के लिए अनपेक्षित है और इसके कारणों की जांच की जाएगी।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

उत्तराखंड में स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम आने के बाद भाजपा और कांग्रेस में हंगामा है। मतदाता ने भाजपा और कांग्रेस के दिग्गजों को उनके ही विधानसभा क्षेत्रों में सबक सिखाया है। दोनों दलों के नेता चुनाव परिणामों की समीक्षा किए जाने का बयान देकर अपने-अपने विरोधियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश में लगे हैं। भाजपा की सबसे ज्यादा दुर्गति अपने किले हरिद्वार नगर निगम में हुई है। उत्तराखंड सरकार में मंत्री मदन कौशिक हरिद्वार से 2002 के विधानसभा चुनाव में जीते थे। परंतु नगर निगम चुनाव में मेयर पद पर भाजपा उम्मीदवार अन्नू कक्कड़ कांग्रेस की उम्मीदवार अनीता शर्मा से 3467 वोटों से हार गईं है। वैसे हरिद्वार भाजपा के कई वरिष्ठ नेता अन्नू कक्कड़ को टिकट देने के खिलाफ थे लेकिन कौशिक के कहने पर उन्हें उतारा गया था। हरिद्वार में 2003 में कांग्रेस के सतपाल ब्रह्मचारी नगर पालिका के अध्यक्ष बने थे। 2008 में हरिद्वार नगर पालिका पर भाजपा ने कब्जा जमाया था। 2010 में हरिद्वार नगर पालिका निगम में तब्दील हो गई और हरिद्वार नगर निगम के पहले मेयर भाजपा के मनोज गर्ग बने। 13 साल से भाजपा का हरिद्वार नगर निगम में कब्जा था। इस साल यह किला ढह गया। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का कहना है कि हरिद्वार की हार पार्टी के लिए अनपेक्षित है और इसके कारणों की जांच की जाएगी।

मदन कौशिक का हरिद्वार का किला ध्वस्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री संजय पालीवाल की रही है। पालीवाल ने अनीता शर्मा के लिए टिकट दिलाया था। पालीवााल की रणनीति के कारण ही कांग्रेस के हरिद्वार के सभी दिग्गज नेता एक मंच पर आए और भाजपा की उम्मीदवार अनु कक्कड़ को हराने के लिए एकजुट रहे। त्रिवेंद्र सिंह रावत जहां देहरादून नगर निगम की सीट भाजपा के सुनील उनियाल गामा को जिताने में सफल रहे, वहीं उनके विधानसभा क्षेत्र डोईवाला में भाजपा के उम्मीदवार 167 वोटों से हार गए। मसूरी नगर पालिका में तो भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया। मसूरी में निर्दलीय उम्मीदवार ने नगर पालिका अध्यक्ष की सीट जीती और भाजपा तीसरे नंबर पर आई।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट अपने विधानसभा क्षेत्र रानीखेत में नगर पंचायत की चिलियानौला और रानीखेत नगर पंचायत की दोनोंं सीटें हार गए। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के गृह क्षेत्र कपकोट में भी भाजपा के उम्मीदवार निर्दलीय उम्मीदवार से हार गए । कांग्रेस की दिग्गज नेता और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश अपने बेटे सुमित को अपने विधानसभा क्षेत्र हल्द्वानी में नगर निगम का मेयर का चुनाव जिताने में नाकाम रहीं। सुमित भाजपा के उम्मीदवार डॉक्टर जोगेंद्र पाल सिंह रौतेला से करीब 11000 वोटों से हारे।

कुमाऊं मंडल में चंपावत जिले में नगर पालिका और नगर पंचायत की चार सीटों में से भाजपा एक सीट भी नहीं जीत पाई। अल्मोड़ा और नैनीताल नगर पालिका के अध्यक्ष पदों पर भी भाजपा धराशाई हो गई और कांग्रेस का लगातार दो चुनाव से इन दोनों नगर पालिका में कब्जा बरकरार रहा। उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत अपने विधानसभा क्षेत्र कोटद्वार में नगर निगम में मेयर पद पर भाजपा उम्मीदवार को नहीं जिता सके। यहां कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह नेगी की पत्नी हेमलता नेगी विजय रहीं। उत्तराखंड में नगर निगम चुनाव की 7 सीटों में से 5 पांच सीटें देहरादून, ऋषिकेश ,रुद्रपुर, काशीपुर और हल्द्वानी पर भाजपा जीती जबकि हरिद्वार और कोटद्वार की सीटों पर कांग्रेस। देहरादून नगर निगम के मेयर पद पर भाजपा के सुनील उनियाल गामा ने 35,632 वोटों से कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल को रेकॉर्ड मतों से हराया।

उत्तराखंड में निकायों की संख्या 84 है ।17 नगर निगम, 39 नगर पालिका तथा 38 नगर पंचायत हंै और 1148 पार्षद हैं। जिनके लिए 4978 उम्मीदवार मैदान में थे। सूबे के 84 नगर निकाय के अध्यक्ष और मेयर के पदों में से भाजपा ने 34, कांग्रेस, निर्दलीयों ने 23 और एक सीट पर बसपा ने कब्जा जमाया। इस तरह भाजपा सर्वाधिक 40 फीसद निकायों में जीत दर्ज करने में कामयाब रही जबकि 2013 के निकाय चुनाव में भाजपा 31 फीसद और 2008 के निकाय चुनाव में 30 फीसद सफलता हासिल कर पाई थी। इस तरह भाजपा की जीत का ग्राफ त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार के समय नगर निकाय चुनाव में दस फीसद बढ़ा है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के कार्यकाल में स्थानीय निकाय चुनाव में बीते दो चुनाव के मुकाबले कांग्रेस ने ज्यादा सफलता हासिल की है। कांग्रेस ने इस बार स्थानीय निकाय चुनाव में 25 निकायों के साथ 30 फीसद निकायों में सफलता हासिल की है जबकि 2013 के चुनाव में कांग्रेस को 29 फीसद तथा 2008 के चुनाव में 28 फीसद निकायों में कामयाबी मिली थी। इस तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल बीते तीन निकाय चुनाव में अपनी सफलता का ग्राफ बढ़ाने में सफल रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल का कहना है कि यदि प्रदेश कांग्रेस और एकजुट होकर लड़ती तो भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाता। हरीश रावत का कहना है कि उन्हें प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव प्रचार के लिए बुलाया ही नहीं। वे अपनी मर्जी से जिन स्थानों पर चुनाव प्रचार करने गए ,वहां कांग्रेस को सफलता मिली। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना है कि उन्होंने हरीश रावत सहित सभी को चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित किया था। उनका कहना है कि बीते दो निकाय चुनाव के मुकाबले इस बार निकाय चुनाव में कांग्रेस का बेहतर प्रदर्शन रहा। कांग्रेस ने भाजपा के कई गढ़ों पर कब्जा जमाया। इस तरह निकाय चुनाव ने भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की लड़ाई सड़कों पर ला दी है।

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