उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भंग हुआ तीर्थों का मैनेजमेंट संभालने वाला देवस्थानम बोर्ड, साधु संतों की मांग के आगे झुकी धामी सरकार

देवास्थानम बोर्ड का साधु-संत लगातार विरोध कर रहे थे, जिसके बाद सरकार ने इसे भंग करने का फैसला किया है। पुरोहितों का कहना था कि इससे उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन होगा।

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भंग हुआ तीर्थों का मैनेजमेंट संभालने वाला देवस्थानम बोर्ड (फोटो- @pushkarsinghdhami)

उत्तराखंड में देवास्थानम बोर्ड पर जारी विवाद के बीच राज्य सरकार ने विधानसभा चुनाव से पहले इसे भंग करने का फैसला किया है। सीएम पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को इसकी जानकारी दी। इस बोर्ड को दो साल पहले तीर्थ स्थलों के मैनेजमेंट को संभालने के लिए बनाया गया था।

देवास्थानम बोर्ड का साधु-संत लगातार विरोध कर रहे थे, जिसके बाद सरकार ने इसे भंग कर दिया। सीएम धामी ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा- आप सभी की भावनाओं, तीर्थपुरोहितों, हक-हकूकधारियों के सम्मान और चारधाम से जुड़े सभी लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए मनोहर कांत ध्यानी जी की अध्यक्षता में गठित उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने देवस्थानम बोर्ड अधिनियम वापस लेने का फैसला किया है।’’

इससे पहले, ध्यानी समिति ने रविवार शाम को अपनी अंतिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी थी, जिस पर उन्होंने इसकी जांच कर जल्द निर्णय लेने की बात कही थी। इस विधेयक के जरिए राज्य सरकार अपने दायरे में चारों धाम – बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमनोत्री और गंगोत्री सहित राज्य के 51 मंदिरों को लाना चाहती थी।

सरकार की इस मंशा की भनक लगते ही चारों धामों के तीर्थ पुरोहितों के साथ-साथ बाकी साधु-संत भी इस बिल के विरोध में उतर आए थे। राज्य में पिछले कई महीनों से इस बोर्ड के खिलाफ आंदोलन चलाया जा रहा था। पुरोहितों का कहना था कि इस बिल से उनके पारंपरिक अधिकारों का हनन होता है। विधानसभा चुनाव से पहले संतों ने आंदोलन को और तीव्र करने की चेतावनी दी थी।

बताया जा रहा है कि राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव और आंदोलन के तीव्र होने की आशंका के कारण धामी सरकार ने इस बोर्ड को लेकर एक समिति का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता भाजपा नेता मनोहर कांत ध्यानी कर रहे थे। जिसकी रिपोर्ट के बाद ही सरकार ने इस बिल को वापस लेने का फैसला किया है।

विधेयक को पहली बार 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पेश किया था। उत्तराखंड विधानसभा ने दिसंबर 2019 में इस विधेयक को पारित कर दिया था। विधेयक के पारित होने के बाद से ही संत इसे वापस लेने की मांग कर रहे थे।


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