Uttarakhand Govt Action on Madarsa: उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने राज्य के मदरसा बोर्ड खत्म कर दिया है और अल्पसंख्यकों के लिए नया शैक्षिक प्राधिकरण बनाया है। इस बड़े फैसले के लगभग दो महीने हो चुके हैं और अभी भी राज्य के गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों और शिक्षण संस्थानों के खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रशासन ने शनिवार को देहरादून और हल्द्वानी में 5 और अवैध मदरसों को बंद या सील कर दिया है।
अवैध मदरसों के मामले में हुई ताजा कार्रवाई के बाद राज्य भर में बंद या सील कराए गए मदरसों की कुल संख्या 20 तक पहुंच गई है। इसके चलते गैर-मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में हड़कंप मच गया है। राज्य सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक, इन 20 संस्थानों में से 17 को तो सीधे ही सील कर दिया गया है। इसके अलावा 3 मदरसों ने प्रबंधन खुद ही लिखित आश्वसन दिया है कि अपनी सभी गतिविधियों को पूरी तरह से बंद कर रहे है।
कानून से समझौता नहीं
राज्य में अवैध रूप से चल रहे शिक्षण संस्थानों और मदरसों को लेकर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का रुख काफी कड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा के मानकों से कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा, “राज्य में किसी भी शैक्षणिक संस्थान को निर्धारित नियमों और मान्यता संबंधी आवश्यकताओं का पालन किए बिना चलने की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
दूसरी ओर राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के सचिव डॉ. पराग मधुकर ढकाते ने भी अभियान को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई है। उन्होंने कहा, “निर्धारित मान्यता मानकों और शैक्षणिक नियमों का पालन न करने वाले मदरसों के खिलाफ राज्य सरकार की कार्रवाई बिना रुके जारी रहेगी।”
देहरादून में दो मदरसों पर एक्शन
बता दें कि राजधानी देहरादून में प्रशासन की टीम ने तीन अलग-अलग मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की। इसके तहत ही आजाद कॉलोनी स्थित ‘मदरसा जामिया-तुस-सलाम अल-इस्लामिया’ को जांच के बाद मौके पर ही सील कर दिया।
आजाद कॉलोनी के ही दूसरे मदरसे ‘मदरसा दार-ए-अरकम’ और ‘मदरसा दारुल उलूम राहूमिया’ के खिलाफ भी एक्शन ले लिया। मदरसे के प्रबंधकों ने कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए खुद ही लिखित हलफनामा दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके पास जरूरी कागजात नहीं हैं और वे तुरंत प्रभाव से संस्थान का संचालन बंद कर रहे हैं।
हल्द्वानी में भी बड़ी कार्रवाई
देहरादून की तरह ही हल्द्वानी में भी प्रशासन का बुलडोजर और सीलिंग टीम एक्शन में नजर आई। हल्द्वानी के सिटी मजिस्ट्रेट ए. बी. वाजपेयी ने बताया कि दो प्रमुख संस्थानों पर ताले जड़े गए हैं। प्रशासन ने शनि बाजार रोड पर स्थित ‘मदरसा जामिया नूरिया बरकाते अमीना’ और बनभूलपुरा के इंदिरा नगर में चल रहे एक गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को सील किया गया। दोनों के पास ही मान्यता वाले दस्तावेज नहीं थे।
पुराना मदरसा बोर्ड खत्म कर बनाया नया प्राधिकरण
बता दें कि प्रशासन की यह पूरी कार्रवाई उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा प्रणाली को आधुनिक और पारदर्शी बनाने के बड़े अभियान का हिस्सा है। इसी साल जुलाई में उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बना जिसने अपने पुराने मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
बोर्ड की जगह अब ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USAME) का गठन किया गया है। यह नया ढांचा राज्य के सभी 6 अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध द्वारा चलाए जा रहे शिक्षण संस्थानों की निगरानी करेगा।
नया कानून और 200 से अधिक मदरसों पर पहले भी कार्रवाई
सरकार ने ‘उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2016’ को खत्म कर ‘अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025’ और नया नियम लागू किया है। इसका मकसद सभी अल्पसंख्यक बच्चों को मुख्यधारा की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ना है।
बदलाव से पहले राज्य में मदरसा बोर्ड से 452 पंजीकृत मदरसे जुड़े हुए थे। लेकिन इससे पहले चले विशेष जांच अभियान में सरकार ने बिना किसी मान्यता के चल रहे 200 से भी ज्यादा गैर-कानूनी मदरसों को सील कर दिया था।
यूसीसी लागू करने वाला पहला राज्य है उत्तराखंड
उत्तराखंड सरकार का यह कदम राज्य में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद आया है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य है जहाँ यूसीसी कानून को धरातल पर उतारा गया है, जिसके तहत सभी नागरिकों के लिए समान नियम बनाए जा रहे हैं।
अल्पसंख्यक शिक्षा में यह बदलाव भी उसी नीतिगत सोच का हिस्सा माना जा रहा है, ताकि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के मानक भी हर संस्थान में लागू हों।
सुप्रीम कोर्ट का क्या था रुख?
अल्पसंख्यक संस्थानों के नियमन का यह मामला कानूनी नजरिए से भी काफी अहम है। वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मदरसा बोर्ड कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली पीठ ने तब कहा था कि राज्य सरकार के पास गुणवत्ता सुधारने के लिए नियम बनाने की पूरी शक्ति है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और आरटीई (RTE) कानून को धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों के अपने संस्थान चलाने के अधिकार के साथ संतुलन बनाकर पढ़ा जाना चाहिए।”
अधिकार और नियमन के बीच संतुलन आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान खोलने का अधिकार जरूर देता है लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है। अदालत के अनुसार राज्य सरकारें मदरसों में शिक्षा का स्तर बेहतर करने के लिए नियम-शर्तें तय कर सकती हैं। इससे बच्चे न केवल धार्मिक शिक्षा बल्कि आधुनिक दुनिया में आजीविका कमाने और समाज में बराबरी से योगदान देने के योग्य बन पाते हैं।
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