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हालैंड की शांता अपने पूर्वजों की तलाश में तीसरी बार आई भारत, 33 साल से पुरखों की जड़ें रही हैं तलाश

105 साल पहले अंग्रेज उनके पूर्वर्जों को बंधुआ मजदूर बनाकर लातिनी अमेरिकी देश सूरीनाम ले गए थे। बाद में शांता के पूर्वज सूरीनाम से हालैंड में जा बसे।

Author इटावा / मैनपुरी | February 28, 2017 1:32 AM
हालैंड से आईं शांता ।

दिनेश शाक्य

आजादी से पहले अंग्रेज भारत से हजारों भारतीयों को गुलाम बना कर मजदूरी के इरादे से दूर देश ले गये थे। आज उन्हीं के परिजन अपने पूर्वजों की सरजमीं को खोजने के लिए दर दर भटक रहे हैं। ऐसे ही लोगों में से एक हैं शांता। जो अपनी जड़ों की तलाश में उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले तक आ पहुंची है। शांता (55) अपने पूर्वजों की तलाश में बार बार भारत आ रही हैं। वह तीसरी दफा मैनपुरी आई हैं। 1984 से लगातार मैनपुरी आ रही शांता की तलाश पूरी नहीं हुई है मगर अभी भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। 105 साल पहले अंग्रेज उनके पूर्वर्जों को बंधुआ मजदूर बनाकर लातिनी अमेरिकी देश सूरीनाम ले गए थे। बाद में शांता के पूर्वज सूरीनाम से हालैंड में जा बसे। रविवार को मैनपुरी आई शांता सोमवार को दिल्ली चली गईं। मैनपुरी शहर के गली-गली मोहल्लों में अपने सवालों का जवाब ढूंढ रहीं शांता ने कई स्थानीय अखबारनवीसों से अपनी बात साझा करते हुए मदद की गुहार लगाई है। शांता जनसत्ता को बताती है कि उनकी कहानी 3 अप्रैल 1912 से शुरू होती है। शांता की दादी सूरजकली अपने 9 वर्षीय पुत्र रामरतन श्यामसुंदर के साथ 14 मई 1912 को सूरीनाम पहुंच गई थी। सूरजकली और उनके बेटे को गोरे लोग 3 अप्रैल 1912 को श्रीराम मंदिर घुमाने का बहाना कर कलकत्ता (अब कोलकाता) ले गए। यहां से पानी के जहाज से दोनों को गन्ने के खेतों में काम करने के लिए सूरीनाम पहुंचा दिया गया।

सूरजकली ही नहीं कई और लोगों को पानी के जहाज से सूरीनाम ले जाया गया था। वहां पहुंचने के बाद सभी से पांच सालों तक मजदूरी करने का करारनामा कराया। पांच साल बीतने के बाद सभी को हालैंड में रोजमर्रा की जिंदगी बसर करने के लिए जमीन दे दी गई और लोग वहीं रहने लगे। जब सूरजकली सूरीनाम पहुंची थीं तब उनकी उम्र महज 25 साल थी। लेकिन शांता के पास इन सवालों का जवाब नहीं है कि सूरजकली बाकी पेज 8 पर के साथ उनके पति क्यों नहीं गए और उनका नाम और जाति क्या है। शांता के मुताबिक उनके पिता रामरतन श्यामसुंदर सूरीनाम से हालैंड आ गए और यहीं बस गए।ब्रह्मानंद वर्मा के घर शांता को लगा कि वह अपनों के बीच हैं तो 33 साल से चल रही तलाश को कुछ सुकून नजर आया । शांता ने कहा कि उनकी दादी रंगून से मैनपुरी आई थीं। यहीं उनका विवाह हुआ था। रंगून का नाम आते ही वह मुस्करा उठीं और गुनगुनाने लगीं ‘मेरे पिया गए रंगून वहां से किया है टेलीफून तुम्हारी याद सताती है…’ 10 मार्च को हालैंड वापस लौट रहीं शांता ने अपनों की तलाश की उम्मीद नहीं छोड़ी है । लेकिन वह कहती हैं कि शायद हिन्दुस्तान में उनका यह आखिरी दौरा हो। 1984 से शांता पूर्वजों की तलाश में मैनपुरी आ रही हैं। वह जम्मू शहर की मूल निवासी सीमाकिरन के साथ मैनपुरी आईं।

अपने अस्तित्व की पहचान के लिए 1984 में शांता सूरीनाम पहुंची और ब्रिटिश एंबेसी जाकर जहाज से आने वाले लोगों की जानकारी निकाली। उनके पिता और दादी का नाम मिल गया। पते के रूप में मैनपुरी कोतवाली के निकट मोहल्ला छिपट्टी तो लिखा लेकिन दादी के नाम के साथ सोनकली, रामसहाय लिखा है। अब सोनकली के पति का नाम रामसहाय है या पिता का नाम यह स्पष्ट नहीं हो रहा। शांता ने शहर के कई लोगों से पूर्वर्जों के संबंध में बात की। करहल रोड निवासी ब्रह्मानंद वर्मा के घर जाकर भी पूर्वजों की पहचान के प्रयास किए लेकिन बात नहीं बन सकी।शांता के मुताबिक उनके पिता ने 1974 में निधन से पहले कई बार कहा कि वह इंडिया जाए और उनके पूर्वजों (भाई) की तलाश करे। चूंकि उनके पिता जब भारत से गए थे, तब उनकी उम्र 9 साल की थी। उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि इंडिया में उनका पता ठिकाना कहां है। पिता के निधन के बाद शांता की शादी हो गई। उनकी दो पुत्रियां और दो पुत्र हालैंड में ही जॉब करते हैं। पिता की मौत के बाद शांता के दिल में वतन और अपनों की याद हिलोरें मारने लगी।

शांता के पूरे परिवार ने हालैंड में भी हिंदी को दिल से अपनाए रखा और अपने देश के रीतिरिवाजों व धार्मिक मान्यताओं को नहीं छोड़ा। मैनपुरी में पहुंची शांता ने हिंदी में खूब बात की और कहा कि भारत आकर हिन्दी बोलना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। लगता है कि वह अपनों के बीच हैं।मैनपुरी राज्य के अभिलेखीय साक्ष्य रखने वाली संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष अभिषेक तोमर से भी शांता ने मुलाकात की। उनके पास 1901 से मैनपुरी के वाशिंदों का विवरण है। मगर शांता के पूर्वजों के नाम उस सूची में नहीं हैं। इस बात से शांता की उम्मीदों को ठेस लगी है। बावजूद इसके उन्होंने पूर्वजों की जड़ों की तलाश में कोई उम्मीद नहीं छोड़ी है।
शांता बताती हंै कि वह मैनपुरी के जिलाधिकारी से लेकर कई अन्य प्रशासनिक अफसरों से कई दफा मिल चुकी है। शांता को मदद तो सभी अफसरों से मिली लेकिन मकाम नहीं मिला। हालांकि उनका दावा है कि उन्हें कुछ ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे यह साबित होता कि उनके पुरखों की जड़ें मैनपुरी जिले की छिपैटी मुहाल मैं हंै।
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फिर वही तलाश

शांता (55) अपने पूर्वजों की तलाश में बार बार भारत आ रही हैं। वह तीसरी दफा मैनपुरी आई हैं। 1984 से लगातार मैनपुरी आ रही शांता की तलाश पूरी नहीं हुई है मगर अभी भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी है। 105 साल पहले अंग्रेज उनके पूर्वर्जों को बंधुआ मजदूर बनाकर लातिनी अमेरिकी देश सूरीनाम ले गए थे। बाद में शांता के पूर्वज सूरीनाम से हालैंड में जा बसे। रविवार को मैनपुरी आई शांता सोमवार को दिल्ली चली गईं।

 

 

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